Wednesday, 2 August 2017

एक चिट्ठी हमारे ओर से - मोदीजी अरविंद पनगढ़िया न हो जाना!

(इसे गुजरे जमाने का पोस्टकार्ड समझ लें। खत का चलन तो चला गया,पर पढ़ना तो याद रख ही सकते हैं।)

            अरविंद पनगढ़िया नीति आयोग का उपाध्यक्ष पद छोड़ चुके हैं और अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में आराम की कुर्सी पाने वाले हैं।

             बात कुछ हजम नहीं हो रही है! ब्रेन ड्रेन के खिलाफ आवाज उठाने वाला शख्स कैसे उसी के गिरफ्त में आ जाता है आप पनगढ़िया से सीख सकते हैं। 64 की उम्र में स्थायी पगार की क्या जरूरत होती है? ठेके पर काम चलाने की झंडा बुलंद करने वाले कैसे स्थायित्व की ओर चले जाते हैं कोई पनगढ़िया में देख सकता है।

             आप एक अच्छे अर्थशास्त्री हैं,इसमें कोई शक नहीं! आपको भारत के किसी विश्वविद्यालय में आराम से जॉब मिल सकती थी और कोलंबिया विश्वविद्यालय में 'भारतीय राजनीतिक अर्थशास्त्र' का जो पाठ पढ़ाते हैं उसे आप यहाँ भी पढ़ा सकते हैं लेकिन आपने नहीं किया। तब आपको कैसे माना जाए कि आप वास्तव में ब्रेन ड्रेन के खिलाफ थे/हैं?

              नीति आयोग छोड़ने का कारण भी आपका बचकाना लगता है कि मैंने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया कि कोलंबिया विश्वविद्यालय मेरे छुट्टी को बढ़ा नहीं रहा है इसलिए मुझे मुक्ति दे दी जाए। देश के खातिर इस तरह के जवाब देने से बेहतर था कि चुप रहते।

             देश की काँग्रेसवादी नाकामियों के एक प्रतीक 'योजना आयोग' को मिटाकर सरकार के थिंक टैंक के रूप में जब 'नीति आयोग' अस्तित्व में आया तो लगा कि सुपर कैबिनेट की अवधारणा नेस्तानाबूद हो चुकी है। वास्तव में ऐसा ही था लेकिन जब अप्रत्यक्ष रूप से इसका अध्यक्षता करने वाला जब अपनी नीतियों और विचारधाराओं पर अमल नहीं कर पा रहा हो तो क्या मान लें कि उपाध्यक्ष का चुनाव गलत था? या समय के साथ अपनी ही नीतियों से भरोसा उठता चला गया? या सार्वजनिक हित पर निजी हित हावी हो गया? आपसे बेहतर कौन जान सकता है?

              अपने नीतियों के कारण आप अपने ही बिरादरी में विलेन बना दिए गए। श्रम सुधार,एयर इंडिया के निजीकरण और साथ ही बीमार हो चुके सार्वजनिक क्षेत्र के कंपनियों के निजीकरण के कारण स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय मजदूर संघ द्वारा कटु आलोचना झेलने को मिला। फिर भी थिंक टैंक रूपी नीति आयोग स्वास्थ्य में निजीकरण को बढ़ावा देने का दस्तावेज जारी कर दिया।

               क्या कभी आपने सोचा कि भारत जैसे देश में बाजारोन्मुखी नीतियाँ सारे समस्याओं का हल है? निजीकरण,उदारीकरण और पूँजीवाद की तरफ आकर्षण रामबाण है? आर्थिक नीतियाँ किसी भी देश की सामाजिक स्थिति को देखकर ही निर्धारित की जाती है।

               हम कोई आर्थिक विकास का अपना मॉडल क्यों नहीं दे सकते हैं जो हमारे साथ-साथ अन्य देशों में भी उपयोगी साबित हो? आपने इस विषय पर क्यों नहीं सोचा? कहीं आपमें भी पश्चिम की चाटुकारी करने और चीटिंग करने की प्रवृत्ति विकसित नहीं हो गई है?