Monday, 31 July 2017

Political commentary - महागठबंधन टूटने का मुख्य वजह - गरिमा का टकराव!

              भाजपा-जदयू गठबंधन पर विश्लेषण की विद्वता की तो बाढ़ आ गयी है! पर सियासी पंडितों के लिए बिहार की राजनीति समझना उतना भी आसान नहीं रहा है। नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में सर्वमान्य राजनीतिक नेता कभी नहीं रहे जिसका प्रमाण हम गठबंधन के उनके सरकार के रूप में देखते रहे हैं। वे NDA का हिस्सा रहकर ही सत्ता भोग करते रहे और जब इससे अलग होकर दोबारा सत्ता में आये तो वो भी अपने बदौलत नहीं बल्कि इसके केंद्र में महागठबंधन था। आज फिर से उनकी 'घर वापसी' हो गई है। इस शब्द को मीडिया द्वारा या कुछ लोगों द्वारा एक सार्थक राजनीतिक विश्लेषण के सूखापन के कारण गढ़ा गया। जिसका कोई मतलब नहीं है बल्कि इसका ढंग मजाकिया ही है।

              अगर आप मीडिया के हेडलाइन्स पढ़ेंगे तो ताज्जूब हो जाएंगे कि कैसे-कैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है। मसलन 'नीतीश कुमार पलटी मारने में चैंपियन हैं','नीतीश का ह्रदय परिवर्तन','नीतीश का घर वापसी','सत्ता का भूख' वगैरह....वगैरह...!

               पर हैरानी तब होती है जब ऐसी बातों को मेन स्ट्रीम मीडिया अपने लेखों में जगह देती है और गंभीरता से लेती है। बीबीसी के लिए एक पत्रकार लिखते हैं,"नीतीश कुमार ने सियासी पंडितों को चौंका दिया कि 2019 में नरेंद्र मोदी अपराजेय हैं। धुर मोदी विरोध की राजनीति से मोदी समर्थक राजनेता बने नीतीश का हृदय परिवर्तन एक बार फिर से चर्चा में है।"

                गड़े मुर्दे किसप्रकार उखाड़े जाते है? आज की पीढ़ी शायद भविष्य में कभी न देख पाए! पर हम यह भूल जाते हैं कि राजनीतिक नेता विश्वासपात्र नहीं होते। उनकी अपनी राजनीतिक मजबूरी होती है। आखिर सत्ता पाने की ललक ही तो राजनीतिक पार्टियों को दबाव समूह से अलग करता है। भारतीय फिल्म 'राजनीति' अपने एक संवाद में कहता है कि राजनीति में मुर्दे गाड़े नहीं जाते लेकिन क्या उस राजनीतिक बयान को आज का भारतीय सिविल सोसाइटी अपने जेहन में उतार लिया है?

                 इन दिनों टीवी डिबेट के बहस और अखबारों में छप रहे आलेखों को देखकर लगता है कि गठबंधन टूटने का एक मुख्य वजह को नजरअंदाज कर दिया गया है और वह है - गरिमा का टकराव(conflict of dignity)।

जरा सोचिये!

                 एक ऐसा व्यक्ति जो बिहार की सत्ता पर कई सालों तक काबिज रहा हो और उसे अदालत दोषी ठहरा दिया हो कि आप राजनीतिक रूप से योग्य नहीं है। पर जब वहीं व्यक्ति पूरी ताकत से फिर से उभर कर आता हो तो वह अपनी पुरानी कुर्सी का रौब,कार्य करने का तरीका आदि को क्या कोई भूल सकता है?

                 बिहार में लालू के साथ यहीं हुआ है। भले ही गठबंधन की मजबूरी के चलते प्रारंभिक दिनों में एक कामचलाऊ समझौता हो गया हो पर यह कितना मजबूत था? कोई अंदाजा नहीं लगा सकता जब तक कि नेताओं के मनोवृत्ति को समझने का प्रयास न किया जाए।

                बिहार में दोनों लालू और नीतीश पहले मुख्यमंत्री रह चुके थे। दोनों की कार्यशैली अलग थी। जाहिर सी बात है गैर-जरूरी हस्तक्षेप पूर्व-सरकार में हो रहा होगा जो किसी को भी नामंजूर होगा।