Thursday, 27 July 2017

Political Commentary - भाजपा को बिहार में भी जम्मू-काश्मीर को दोहराना चाहिए!

            सेकुलर जमात को गंभीर दौरा पड़ गया है। आखिर इन्हीं वामपंथी,छद्म उदारवादी और कठमुल्ला जमात द्वारा गढ़ा गया तथाकथित संप्रदायिक भगवा ब्रिगेड अपने थिंक टैंक का उम्दा कमाल जो दिखा दिया है। राजनीति में लंबे-लंबे दावे किसतरह मिटते रहते हैं आज के दिनों में हमसभी एक शानदार अनुभव कर रहे हैं। 'अटूट रिश्ता'(महागठबंधन) कितना क्षणभंगुर था जो उसके मुखिया पर एक आरोप भी सहन नहीं कर पाया और अधोगति को पा गया,हम देख ही चुके हैं।

             इस महागठबंधन में एक से बढ़कर एक नमूने भरे पड़े थे। एक वो जो अध्यादेश को खुलेआम फाड़कर अपनी कद बढ़ाने के जुगत में थे और एक वो जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करके राजनीति में आये थे,आज के दिन में भ्रष्टाचार के नए आइकॉन बन गए हैं।

             'भ्रष्टाचार विरोधी छवि वाला व्यक्तित्व,एक भ्रष्टाचारी जिसे अदालत ने दोषी ठहरा दिया है और एक अन्य जो आज तक युवा ही है' का तालमेल बिठा तो लिया गया लेकिन कब तक? युवा युवराज की पार्टी जो अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है और आज ढ़लान पर है वो कैसे महागठबंधन को बचा सकती थी जिसे बचाने की जिम्मेदारी दी गई थी।

              जम्मू-काश्मीर की भाँति भाजपा और संघ-परिवार बिहार में भी कमाल दिखा सकती है। जो पीडीपी कभी काश्मीर में पत्थरबाजों से सहानुभूति रखती थी वो आज राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ चुकी है और कदम से कदम मिलाकर भाजपाई नीतियों का समर्थन कर रही है। एक ऐसा प्रदेश जो आतंकवाद प्रभावित रहा है और कई तरह की समस्याओं से ग्रस्त है,आखिर जब वहाँ अपने से ठीक विपरीत विचारधारा वाले से गठबंधन कर विचारों पर काबू पा लिया गया तो बिहार में क्यों नहीं हो सकता है?

               राजनीति से परे जाकर संघ परिवार के थिंक टैंक को गंभीरता से सोचना चाहिए कि किसतरह कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर बिहार के नेताओं की सोच को बदला जाए। इनदिनों घटित हो रही घटनाएं समय की कालचक्र की वो नायाब उदाहरण है जिसपर ध्यान केंद्रित करने का ऐतिहासिक अवसर है।

               संघ के जिस आरक्षण की समीक्षा वाले बयान को 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव के दौरान नकार दिया गया था उसे बिहारी जनमानस के मन में नीतीश कुमार के बदौलत डालने का सही वक्त है। इस साध्य को पाने के लिए जी-जान से लग जाना चाहिए क्योंकि आरक्षण अपने लक्ष्य को पा नहीं पाया है। इसने समाज में समरसता लाने के बजाय अलगाव पैदा कर दिया है। जातियाँ मजबूत हो रही है और एक-दूसरे के खून के प्यासे होती जा रही है।

               गौरक्षकों पर किसी भी तरह बिहार की धरती पर होने वाली आलोचना को अंकुश लगाने की जरूरत है। वास्तव में गाय की महत्ता को हम समझ नहीं पा रहे हैं। भारत में यह राष्ट्रवाद को बढ़ावा देती है और एकता-अखंडता की रक्षा करती है।

               तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि राष्ट्रवाद पर किसी भी तरह का समझैता स्वीकार नहीं किया जाए। बिहार के एक देशद्रोही छात्र नेता के समर्थन में नीतीश कुमार द्वारा किये गए बयानबाजी पर माफी मांगने का दबाव बनाया जाए क्योंकि 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' जैसे नारे कभी बर्दास्त नहीं किये जा सकते। यह तो वामपंथियों की फितरत है जो इसे 'असहमति का हक' करार दे रहे हैं नीतीश कुमार का नहीं!