Wednesday, 26 July 2017

Political Commentary - राजनीति वाकई संभावनाओं का खेल है?

             "बिहार में लालू और नीतीश के बीच क्या चल रहा है? क्या आपको लगता है कि गठबंधन बच पाएगा?" यहीं सवाल मुझसे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मॉस कम्युनिकेशन (IIMC,Delhi) में इंटरव्यू के दौरान पूछा गया था। दिन था-30 जून,2017 का जिससे मात्र कुछ दिन पहले ही जांच एजेंसियों द्वारा लालू के अवैध ठिकानों पर छापा मारा गया था और बिहार की राजनीति में बयानबाजी का बाजार गर्म था।

              उससमय तक मुझे तनिक भी अंदाजा नहीं था कि मात्र 20-25 दिनों में ही राजनीति इसतरह करवट लेगी और सत्ता अपना एक भिन्न रूप दिखाना शुरू कर देगा।

               2015 में हुए बिहार विधान सभा चुनाव के दौरान और उसके तत्काल बाद मैंने कई ब्लॉग लिखे थे जिसे आप यहाँ, यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं। उससमय मैंने साबित किया था कि बिहार चुनाव परिणाम अवसरवादिता और संकीर्ण जातीय सोच की जीत थी। साथ ही यह सवाल उठाया था,"बिहार में यह बदलाव का संकेत है या पुन: जंगलराज की वापसी का?" इतने दिनों तक हुए घटनाक्रमों से सब समझ ही गए होंगे कि बिहार किस तरफ अग्रसर था।

              फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बिहार एक ऐसा प्रदेश रहा है जो शैक्षणिक रुप से पीछे रहने के बाद भी राजनीतिक रुप से सशक्त माना जाता है इसका मुख्य कारण रहा है वहां का सामाजिक पिछड़ापन! पर यह अलग तरह का पिछड़ापन है।

              बुद्ध,महावीर से लेकर चाणक्य,मौर्य सम्राज्य और अशोक सभी ने समाज को रास्ता दिखाने का काम किये हैं। आजादी की लड़ाई में चंपारण से लेकर जेपी का आंदोलन सभी ने देश को रास्ता दिखाने का काम हमेशा किये हैं,पर ये तो अब वक्त बतायेगा कि 2015 के विधान सभा चुनाव परिणाम क्या निर्देश लेकर आयेगा?

               साथ ही इसी ब्लॉग के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया था कि अगर नीतीश कुमार राजद पर नियंत्रण कर लेंगे तो वे अपने विकासवादी मॉडल के जरिये बिहार में बदलाव ला पाएंगे। अगर ऐसा नहीं होता है तो तथाकथित 'जंगलराज-2' दोबारा अपना पैर पसारने में कोई गुरेज नहीं करेगा। फलस्वरूप मध्यावधि चुनाव अवश्यंभावी हो जाएगा या बिहार फिर से संक्रमण काल में चला जायेगा। 

               मतलब साफ है कि नीतीश के प्रयास लालू और राजद पर नियंत्रण नहीं कर पाए जिसकी झलक हमें उनके बयान से मिल जाती है जो बुधवार को लालू प्रसाद यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस के कुछ घंटों बाद नीतीश ने यह कहते हुए कि "इस माहौल में काम करना मुमकिन नहीं" और मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था।

               इसी दौरान इन्होंने कहा था कि मैंने कौन सा प्रयत्न नहीं किया। मैंने नोटबंदी का समर्थन किया। उसके लिए मेरे बारे में क्या-क्या नहीं कहा गया।

               इन्होंने सबसे महत्वपूर्ण बात जो कही वह कि धन-संपत्ति ग़लत तरीक़े से अर्जित करने का कोई मतलब नहीं है। कफ़न में कोई जेब नहीं होती है। कोई लेकर नहीं जाता है। विपक्षी एकता का समर्थक रहा हूं। लेकिन किस बात के लिए विपक्षी एकता। हमारे बारे में क्या-क्या नहीं कहा गया। मैं इन सारी चीज़ों को झेलता रहा हूं। हम इस परिस्थिति में क्या कर सकते हैं। सिर्फ़ प्रतिक्रियावादी एजेंडा से काम नहीं चलने वाला है।

               मैंने अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर इस्तीफा दे दिया। देखा कि कोई रास्ता नहीं है तो नमस्कार किया। लगा कि काम नहीं कर सकते हैं तो ख़ुद को सत्ता से अलग कर लिया। मैंने त्यागपत्र दे दिया है। आगे क्या होगा, कब होगा, कैसा होगा सब भविष्य पर छोड़ दिया जाए।

               पर अब भविष्य सामने आ गया है और भाजपा के समर्थन से नीतीश कुमार छठी बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले चुके हैं।

               वास्तव में यह कोई गठबंधन थी ही नहीं बल्कि एक उम्दा अवसरवादिता थी। एकतरफ ऐसे-ऐसे शख्स थे जो अपने निजी हित की पूर्ति को गठबंधन धर्म समझ बैठे थे और साथ ही जिन्होंने कभी संघ,संविधान और धर्मनिरपेक्षता को अच्छे से समझ नहीं पाया वो सेकुलर संघ बनाकर भारत बचाने निकले थे। हद तो तब हो जाती है जब ऐसे भ्रष्टाचारियों का लोग समर्थन करते हैं और चुनावी पर्व में वोट देने की गलती कर बैठते हैं। आखिर इतिहास और अतीत किसलिए होती है कि हम सिख ही नहीं पाए। जिस लालू ने पूरे बिहार को गर्त बना दिया वहीं लालू जब दोबारा सत्ता में आते हैं तो बिहारी जनता की समझ पर सवाल उठाना लाजिमी हो जाता कि कैसे लालू के अनपढ़ बेटों की जिंदगी बनाने के लिए अपने बेटों की जिंदगी दांव पर लगा देते हैं?

                परंतु अब देखना काफी महत्वपूर्ण हो गया है कि भाजपा के सहयोग से नीतीश के सत्ता में आने से उनके रुख में क्या परिवर्तन होता है?

                 क्या वे गौरक्षकों का समर्थन करेंगे? क्या वे आरक्षण पर संघ के समीक्षा वाले बयान के पक्ष में खड़े होंगे? साथ ही क्या वे देशभक्ति को बिहार में बढ़ावा देंगे और भाजपा का सहयोग करेंगे? और हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि क्या वे JNU के एक देशद्रोही छात्रनेता जिसका ताल्लुक बिहार से ही है का अब भी समर्थन करेंगे या जम्मू-काश्मीर में पीडीपी की भांति भाजपा राष्ट्रवाद पर नीतीश को प्रभावित कर पाएगी?