Thursday, 4 May 2017

My diary - मोरल पुलसिंग अवश्यंभावी नजर आ रहा है!

ऐश्वर्या राय,सलमान खान और अजय देवगन की एक फिल्म का संवाद कि ये तो साबित हो गया कि ये सीढियां नीचे से ऊपर जाती है लेकिन इससे यह मालूम नहीं चलता कि यहीं सीढियां ऊपर से नीचे भी आती है! यह वकालती तर्क नहीं बल्कि कुतर्क था जिसे स्वीकार कभी भी नहीं किया जा सकता। सार्वभौमिक वक्तव्यों और तथ्यों को शब्दों के जाल में उलझाया नहीं जा सकता।

माहौल में तेजी से परिवर्तन आ रहा है और प्यार तथा आजादी के नाम पर अश्लीलता का नंगा नाच किया जा रहा है। पटना का 'इको पार्क' तो अभी उस अधोगति को नहीं पाया है जितना दिल्ली में मेट्रो स्टेशनों और कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क या अन्य पार्कों में देखने को मिल जाता है।

अभी मैं दिल्ली के सेंट्रल पार्क में अकेले दोपहर में एक छोटे पेड़ के छाँव में बमुश्किल पांच मिनट ही बैठा होगा कि एक लगभग बदसूरत सी दिखने वाली ठिगनी लड़की एक अपने से लंबे लड़के के साथ मेरे साथ लगे पेड़ की छाँव में बैठ गयी। मिनट भी नहीं गुजरा होगा,शर्म का कोई भाव तो था ही नहीं,बेहयाई तो चरम पर था-लड़का लड़की के पैरों पर सर करके लेट जाता है और लड़की उसके शरीर पर झुक जाती है-सभी के सामने ही वे निर्लज्जता उदाहरण पेश करने लगते हैं। कपड़े के ऊपर से ही चरित्रहीन लड़का उस चरित्रहीन लड़की के स्तन को मुंह में लेकर सारी हदें पार कर देता है। कई जन वहाँ से गुजरते रहते हैं लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता है और अंत में मुझे ही वहाँ से बाहर निकलना पड़ता है।

मुझे ताज्जूब तब होती है जब मैं देखता हूँ कि ऐसे घिनौने काम करने वालों में वह अकेला नहीं था बल्कि कई जोड़े इस काम में मशगूल थे और अपने परिवार और समाज की इज्जत का धज्जियाँ उड़ा रहे थे। पीछे में अपने माता-पिता को शर्मसार कर रहे थे और पश्चिमीकरण का आधुनिकता के रूप में सांकेतिक बखान कर सांस्कृतिक पतन का मिसाल पेश कर रहे थे।

जाहिर है ऐसे उदाहरण न केवल भारत के पतन का नींव खोद रहे हैं बल्कि नैतिकता रूपी महानता को भी धता बता रहे हैं!

"क्या 'मनमर्जी','स्वेक्षा','आजादी' और प्यार के नाम पर किसी भी परिप्रेक्ष्य और नजरिये से सही ठहराया जा सकता है?"

"नहीं!"

तो नारी अधिकारों की बात करने वाले क्यों नहीं पनप रही इस सड़ांध भरी मानसिकता के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं? सामाजिक कार्यकर्त्ता वास्तव में कर क्या रहे हैं? ये सामने क्यों नहीं आते जब इनकी असल में जरुरत होती है? क्या 'एंटी रोमियो स्क्वार्ड' की जरूरत दिल्ली और अन्य शहरों में भी महसूस हो रही है?

जवाब बिल्कुल 'हाँ' है क्योंकि सिविल सोसाइटी अपना काम अच्छा से नहीं कर रहा है तो क़ानून में बदौलत समाज के पतन को रोका जा सकता है। नैतिकता स्थापित की जा सकती है।

यह सब केवल और केवल एक ही तरीके से होगा और वह है - 'मोरल पुलसिंग'।

मोरल पुलसिंग को भारत में नैतिकता को लागू करने के संबंध परिभाषित किया जाता है। यह अनैतिक कार्यों और भारतीय संस्कृति के खिलाफ किये गए हरकत को निशाना बनाता है। पार्क में यहीं सब तो किया जा रहा है।

आप तय कर लें कि क्या ऐसे हरकतों को कभी भारत जैसे पवित्र भूमि पर स्वीकार किया जा सकता है? सभी की अपनी एक सीमा है। सभी प्रकार के कार्यों के लिए भारत में समय और नियत स्थान तय किये गए हैं तो हम आखिर क्यों अपने मूल्यों को भूलते जा रहे हैं?

कारण एक नहीं अनेक है लेकिन इसमें सबसे महत्वपूर्ण कारण 'व्यक्ति की परवरिश' की है। आपकी हरकतें वास्तव में बता देती है कि आप किस समाज से उठकर आये हैं और और आपके पारिवारिक मूल्यों का स्तर क्या है? भले ही कुछ अपवाद हो सकते हैं लेकिन मूल्य विकास एक अहम किरदार अदा करता है।

इसलिए हमें बहस मूल्य विकास,नैतिक उत्थान और सांस्कृतिक रक्षा जैसे साधनों पर करना चाहिए जिससे व्यक्ति के साध्य को आसानी से पाया जा सके!

संदेश साफ़ है कि हम संकट में जकड़ते जा रहे हैं - सांस्कृतिक संकट की जकड़न!