Monday, 8 May 2017

International/global issues - फ्रांस में दक्षिणपंथ की हार : एक भिन्न नजरिया!

        आज नहीं बल्कि भारत में मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवारी मिलने और आम चुनाव में जीत के बाद से सुन रहा हूँ,"बेरोजगारी,आतंकवाद और राष्ट्रवाद आदि वो मुख्य वजहें हैं जो राष्ट्रवाद की उभार में सहायक होती है।" इन वजहों को भारत लोकसभा चुनाव,अमेरिका में ट्रंप की जीत,ब्रिटेन का ईयू से अलग होना और हॉलैंड तथा फ्रांस में दक्षिणपंथी रुझान की बढ़ती लोकप्रियता को आधार मानकर कुछ स्वयंभू पत्रकारों और पूर्वाग्रहग्रस्त इलीट द्वारा प्रमाणित भी कर दिया गया। लेकिन......

         इस सवाल का जवाब देने की जोहमत किसी ने नहीं दिखाई कि अगर दक्षिणपंथ के उभार की वजहें उपर्युक्त साधन है तो वामपंथ के लिए क्या है? यहीं पर संतुलित और निष्पक्ष पत्रकारिता की पोल खुल जाती है।

         कल एक हिंदी चैनल(स्क्रीन काला करने वाला) के प्राइम टाइम का इंट्रो सुनने के बाद ऐसा लगा कि भारत में हिंदी टीवी पत्रकारों के बुद्धि का स्तर क्या है?(1) धारा के साथ सामंजस्य बैठाने की एक कबाड़ प्रवृति का विकास तेजी से ऐसे पत्रकारों में हो चला है। दूसरे का नाम देकर,संदर्भित करके अपने मन की बात को उजागर करने का नायाब तरीका ईजाद कर लिया गया है। खैर.......

         फ्रांस में मैक्रों की जीत भारत के केजरीवाल जैसा तो नहीं!

         कहा जा रहा है कि महज कुछ ही वर्षों में फ्रांस की राजनीति में आये इस बैंकर ने अपने उदार-मध्यमार्गी छवि से अपनी साख बना ली और नेपोलियन के बाद सबसे कम उम्र में फ्रांसीसी गणराज्य के नए शासक के रूप में काबिज हो गए। यह कुछ ऐसा ही हुआ जैसा कुछ साल पहले हम दिल्ली में राजस्व अधिकारी से नेता बने केजरीवाल में देख चुके हैं। दिल्ली तो इस बात की भी गवाही है कि महान सपनों का आंदोलन किसतरह एक धोखा में परिवर्तित होकर रह गया है। फ्रांसीसी गणराज्य को कौन भूल सकता है जहां राब्स्पियर जैसा चरित्र भी पनपा था,जिसने फ्रांस की क्रांति (1789) के ओट में इतना कहर बरपाया था जिसमें उसने सबसे पहले अपने साथियों को निशाना बनाया,फिर खुद बर्बाद हुआ और मारा गया। महान सपनों की क्रांति पहले आतंक और फ़िर तानाशाही में बदली थी।(2)

          इमैनुअल मैक्रों के जीत के कारण!

          मैक्रों को चुनाव में 66.06 फ़ीसदी वोट मिले और उनकी धुर दक्षिणपंथी प्रतिद्वंद्वी मरी ल पेन को 33.94 फ़ीसदी वोटों से ही संतोष करना पड़ा है। इनके जीत के पांच कारण को बीबीसी अपने एक रिपोर्ट में इस प्रकार बताता है-1.किस्मत का कमाल,2.चतुराई,3.फ्रांस में एक नई शुरुआत की,4.सकारात्मक संदेश,5.वो मरी ल पेन के ख़िलाफ़ खड़े थे जिनमें नकारात्मकता झलका रहीं थी। वो अप्रवासन, यूरोपीय संघ और सिस्टम के ख़िलाफ़ खड़ी थीं। (3)

          पर इनके जीत के कारण के मुख्य वजह को नजरअंदाज कर दिया गया जो कई नकारात्मक संदेश धाफ़ं किये हुए है। द हिंदू में छपे एक आलेख में कहा गया है कि मैक्रों के विचारों पर वास्तव में गहराई से चर्चा नहीं किया गया।(4)(5) यहीं वह मुख्य वजह है! इसे नजरअंदाज करना फ्रांस में भी दिल्ली के विधानसभा चुनाव वाली गलती को दोहराना होगा।

          दक्षिणपंथी रुझान वाली मरी ल पेन की उपलब्धि!

          इनकी पार्टी नेशनल फ्रंट की शुरुआत 1972 में छोटे स्तर से हुयी थी। कई वर्षों तक तीखी आलोचना को नजरअंदाज करने के बाद इनको वास्तविक सफलता तब मिली जब यह राष्ट्रीय बहस को प्रभाव डालना शुरू कर दिया। 2002 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में पेन के जीत के उम्मीद को उस समय धक्का लगा जब तथाकथित रिपब्लिकन फ्रंट जो मुख्य धारा के पार्टियों का एक महागठबंधन था इनके खिलाफ लामबंद हो गए।

         पर पंद्रह साल बाद पेन ने उस फ्रंट को नेस्तानाबूद कर डाली और फ्रांस के इतिहास में दक्षिणपंथी रुझान वाले किसी भी संगठन द्वारा 30 प्रतिशत से ज्यादा मत पाकर मुकाम हासिल कर ली और अपने लक्ष्य की तरह एक और कदम बढ़ा दिया। फ्रांस में यह दक्षिणपंथ की हार नहीं बल्कि अमेरिका और भारत के बाद एक ऐसा प्रयोगशाला है है जिसका भविष्य उज्जवलमयी है।(6)

          इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी अगर फिर से लिबरल,लेफ्ट,छद्म सेकुलर और कठमुल्ला जमात हिटलर को विमर्श में वापसी करा दें और दक्षिणपंथ को बदनाम करने का सतही प्रमाणों को पेश करना शुरू कर दे। पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इतिहास ने जितना अन्याय हिटलर के साथ किया है उतना किसी भी राष्ट्रावादी के साथ नहीं। खैर....(7)

         इसलिए आप सावधान हो जाइये! राष्ट्रवाद समाज और व्यक्ति की आत्मा है और दक्षिणपंथ आपके भावनाओं का क़द्र करता है। भले ही चुनावी राजनीति में सीटों के लिहाज से यह पिछड़ता नजर आये लेकिन हर शख्स के दिलो-दिमाग पर यह राज करता है और साथ ही अपनी उपस्थिति हर जगह दर्ज कराता है!

संदर्भ -

1. NDTV प्राइम टाइम का इंट्रो
2. ब्लॉग
3. बीबीसी हिंदी
4. द हिंदू
5. द हिंदू(the centre holds)
6. Same
7. ब्लॉग
8. The guardian