Friday, 28 April 2017

Political commentary - दिल्ली MCD चुनाव में भाजपा की जीत : जुदा नजरिये!

मैं इस बात पर चर्चा बिल्कुल नहीं करूँगा कि किसको कितना सीट और कितना वोट मिले। एक पार्टी की जीत और दूसरे की हार तो लोकतंत्र के चुनावी खेल में चलते रहते हैं। सियासी पंडित अपना विश्लेषण पेश करते रहते हैं। यह सब तो ठीक है लेकिन इस चुनाव में भाजपा की जीत ने कुछ लोगों में गजब की बेचैनी पैदा कर दिया है। अपूर्वानंद अपने एक लेख में लिखते हैं,"अब हम पटना या जयपुर या जबलपुर जैसे शहर में नहीं रहते, हमेशा भारत नामक राष्ट्र में रहते हैं। बुधवार को दिल्ली के म्यूनिसिपैलिटी के चुनाव नतीजों से यह बात साफ़ हो गई है। यह कि भारत में कम से कम आज के दिन कुछ भी स्थानीय नहीं रहा, हर कुछ राष्ट्रीय हो चुका है।"

मैं हमेशा से अवगत कराते रहा हूँ कि भारत में एक ख़ास विचारधारा के लिए आदर्श का मतलब तभी तक है जब तक उनकी हित पूर्ति होते रहे। दादरी में एक मुसलमान का वध और दिल्ली में कुछ लफंगों द्वारा चर्च पर पत्थर फेंका जाना आदि वास्तव में कोई विचारधारात्मक मामला था ही नहीं बल्कि कानूनी मामला था,इस तरह के स्थानीय मामलों से कानून के बदौलत आसानी से निपटा जा सकता था लेकिन बीते घटनाक्रम गवाह है कि किस तरह इसे सियासी रंग देकर उस मुसलमान पर पैसों की बरसात कर दी गयी और छद्म सेकुलरिज्म का नमूना पेश कर घटना को राष्ट्रीय बना दिया गया। उस समय पुरस्कार वापसी गैंग काफी सक्रिय हो गया था। उनके निजी हित आकांक्षा का अंदाजा सस्ती लोकप्रियता पाने की घटिया चाहत से ही लगाया जा सकता है कि जिन मामलों का असहिष्णुता से कोई मतलब ही नहीं था उसे इतना हवा दिया गया कि उस दौरान हुए मसलन दो चुनावों में एक पार्टी को भारी खामियाजा भुगतना पड़ा। हम मान लेते उसमें सच्चाई था जब बिहार चुनाव के बाद वह क्रम जारी रहता लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

आज जब ऐसे लोगों की राजनीतिक हित पूर्ति करने वाले किसी दल की चुनावी जंग में हार नसीब हो रही है तो उन्हें हर चीज में राष्ट्रीयता ही दिखाई दे रही है। यहीं इनकी सोच की विकृति है जो इनके बौखलाहट को स्पष्ट करती है।

यहीं आगे लिखते हैं," इसलिए दिल्ली के 10 साल के नकारेपन के कचरे और गंदगी के बीच अगर कमल खिला है तो यह एक धोखाधड़ी से भरे राष्ट्रवादी प्रचार की जीत है और यह बात सबसे पहले कही जानी चाहिए। राष्ट्रवाद आक्रामक विजयपथ पर है, लेकिन इस रास्ते इस राष्ट्र की पराजय निश्चित है, यह चेतावनी देने में क्यों हमारा गला रुँध रहा है?"

इसतरह के घड़ियाली आँसू बहाने वाले सुविधा के विश्लेषक होते हैं। वास्तव में वामपंथी भारत को कोई राष्ट्र नहीं बल्कि किताब 'कहानी कम्युनिस्टों की' के अनुसार 'राष्ट्रों का राष्ट्र' मानते हैं और जब वे यह कहते हैं कि इस रास्ते भारत राष्ट्र की पराजय निश्चित है तो किसी को भी हंसी आना लाजमी ही हो जाता है। जिन लोगों को 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' के नारे 'असहमति का हक' नजर आता है वे भारत राष्ट्र की बात न ही करें तो बेहतर होगा!

इनदिनों ऐसे ही कई आलेख छपे हैं जिसमें कहा गया है कि यह भाजपा की जीत वास्तव में फर्जी राष्ट्रवाद की जीत है। पर ये भी सच्चाई है कि आज केजरीवाल की 'नई राजनीति' हारी हुई दिखाई पड़ रही है। साल 2015 में उसे सिर पर बिठाने वाली दिल्ली ने इस बार उसे धूल चटा दी है। जैसी ऐतिहासिक वो जीत थी वैसी ही ऐतिहासिक ये हार भी है। दरअसल 'आप' से वोटर का मोहभंग हुआ है क्योंकि पार्टी जिस स्वच्छ छवि और 'नैतिक आभा मंडल' के साथ दिल्ली में जीतकर आई थी, वही उसपर भारी पड़ा। नैतिकता और शुचिता की जो अपेक्षाएं वोटर ने उससे रखीं, वो पूरी नहीं हो पाईं। उसका दिल्ली से बाहर निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में तेजी से हस्तक्षेप करना भी बचकाना साबित हुआ। वोटर उसे अलग रंगो-रूप की पार्टी मानकर चल रहा था। उसका मोहभंग हुआ है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा की जीत का मूल वजहों में से एक है उत्तर प्रदेश में हाल में मिली जीत जिसने कार्यकर्ताओं के उत्साह को बढ़ाया। बीजेपी ने शहर की साज-सफाई, कूड़े के ढेर और नगर निगम के दफ्तरों में भ्रष्टाचार पर से ध्यान हटाकर वोटर को राजनीति के ज़्यादा बड़े सवालों से जोड़ा। इसमें मोदी के नाम ने काम किया। वस्तुतः यह चुनाव नगरपालिका के चुनाव जैसा लगा ही नहीं। जैसा कि अपूर्वानंद जिस नकारात्मक तरीके से राष्ट्रीयता को व्यक्त किये हैं वो तो है ही नहीं भले ही यह चुनाव अपने केंद्र में राष्ट्रीय चरित्र को धारण किया हुआ था! रहे भी क्यों नहीं? दिल्ली की गलियां जो राष्ट्र को संदेश देती है और पूरे भारत समेत दुनिया की नजर दिल्ली की राजनीति पर बारीकी से रहती है। ऐसे भी मुकाबला त्रिकोणीय होना बीजेपी के हक में गया। बीजेपी के विरोधी वोट कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच बँटे। इस तिकोने संग्राम में बीएसपी और जेडीयू जैसी पार्टियाँ लगभग गायब हो गईं।

वहीं वृंदा करात जो माकपा पोलित के ब्यूरो सदस्य हैं लिखती हैं,"पहले कई राज्यों के स्थानीय और नगर निगम के चुनाव, फिर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में पूर्ण बहुमत की जीत और अब दिल्ली नगर निगम चुनाव में बीजेपी को मिली भारी जीत ने भारत के सामने आज़ादी के बाद के शुरुआती दशकों वाले एक पार्टी शासन जैसी हालत पैदा कर दी है।"

ये रजनी कोठारी के उस शोध को दोहराती नजर आ रही है जो आजादी के शुरुआती वर्षों में एक पार्टी शासन व्यवस्था को लोकतंत्र में स्थापित कर दिया था। जब कोई वामपंथी कुछ कहे या लिखे तो वे संघ का नाम लिए बगैर कैसे रह सकते हैं,"फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि आज़ादी के बाद के शुरुआती दशकों में कांग्रेस ने अपने सभी राजनीतिक विरोधियों को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया था, लेकिन आज बीजेपी सत्ता में ज़रुर है लेकिन वो शासन करने वाली अकेली पार्टी नहीं है। उसके साथ आरएसएस भी है, जिसके प्रचारक प्रधानमंत्री हैं जिन राज्यों में बीजेपी जीती है वहां मुख्यमंत्री भी आरएसएस के मनोनीत लोग हैं। ये आरएसएस और बीजेपी की जोड़ी है, जो मिलकर इस देश का भाग्य तय कर रहे है।"

जो भी हो! भारत के भविष्य को जिस रूप में भी पेश किया जाए लेकिन यह तय है कि भारत पहले की तुलना में और मजबूत ही होगा और अतीत के गौरव को स्थापित किया जा सकेगा। हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारत तभी तक है जब तक भारतीय वैदिक संस्कृति जिंदा है।

भले ही कई लोग इस दौर को भाजपा का स्वर्णिम काल बता रहे हों लेकिन वर्तमान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के अनुसार,"भाजपा का स्वर्णिम काल आना अभी बाकी है।"

संदर्भ -
1. वृंदा करात,माकपा पोलित ब्यूरो सदस्य का लेख
2. प्रमोद जोशी,वरिष्ठ पत्रकार का लेख
3. भाजपा का स्वर्णिम काल आना बाकी
4. अपूर्वानंद का लेख
5. कहानी कम्युनिस्टों की - संदीप देव
6. भारत में राजनीति - रजनी कोठारी