Friday, 14 April 2017

Media - राहुल कंवल पत्रकार नहीं बल्कि पत्रकार के भेष में वास्तविक गुंडा है!

राहुल कँवल के मिजाज की आज तारीफ हो रही है। पत्रकारिता की नैतिकता जहां शांत और मेहमानों से तहजीब से पेश आने की वकालत करता है,ऐसे दृष्टिकोण में गुंडागर्दी का एक नमूना कँवल और स्क्रीन काला करने वाला पत्रकार जैसे एंकर पेश कर रहे हैं। क्या आप संपादक हैं और आपको खबर दिखाने का लाइसेंस है तो आप जनता को कुछ भी दिखाएंगे(जैसे-स्क्रीन काला करना और चुना लगे जोकरों को बैठाना आदि)? बुलाये मेहमानों और पैनलिस्टों का बेईज्जती करेंगे(जैसा कँवल द्वारा किया गया है और कुछ समय पहले न्यूज नेशन के एक शो में बिग बॉस प्रतिभागी स्वामी ओम के साथ किया गया था)?



आपसभी अपने स्टूडियो में बैठकर कभी युवा वाहिनी को गुंडा और कभी संघ के छात्र संगठन की देशविरोधियों के खिलाफ आवाज उठाने के कारण गुंडागर्दी वाला हरकत कहते हैं तो उपर्युक्त घटनाओं में आप क्या कर रहे हैं? कँवल आप तो इतने गुस्से में अंगुली दिखा रहे हैं कि आप बस,अब तो मार ही देंगे। इस घटना में आपकी तनती हुई नशों को शायद पूरा देश ने देखा है। शुक्र मनाइये कि वहां मौजूद पैनलिस्ट ने अपना आपा नहीं खोया और संयम बनाकर रखा नहीं तो इस हाल में आप किसी अस्पताल में पड़े होते। मानते हैं आपको खबर दिखाने का लाइसेंस है लेकिन आपको जज की भूमिका निभाने का अधिकार तो नहीं? आप केवल हर पक्ष के बातों को जनता और देश के सामने परोस सकते हैं। सही-गलत का निर्णय आप कैसे कर सकते हैं? जब आप किसी को गलत कहेंगे तो वह बचाव तो करेगा ही या प्रमाण तो मांगेगा ही,तो आप गुस्से में आकर बदतमीज़ों जैसा अंगुली कैसे दिखा सकते हैं? क्या आप जैसे एंकरों को 'पत्रकार के भेष में छिपे हुए गुंडा' कहना गलत होगा?

हद तो तब हो गयी है जब राहुल कँवल वाले शो के विडियो को प्रगतिशील, समाजवादी, एंटी-बीजेपी, एंटी-आरएसएस विचार रखने वाले खूब शेयर कर रहे हैं। उसे शेयर करते हुए राहुल कँवल की खूब तारीफ कर रहे हैं। आखिर क्यों?

पर शायद किसी ने एंकर के एटीच्यूड पर शायद ही चर्चा किया? मीडियाविजिल वेबसाइट पर छपे एक लेख में लिखा गया है कि आज कँवल को पसंद क्यों किया जा रहा है? शायद क्योंकि कँवल आज इनके ‘अपने’ पाले में खड़ा दिखता है। विडंबना है कि एक ऐंकर की गुंडई इन्हें पसंद आ रही है। ऐसे ही तो न्यूज़रूम की गुंडई को वैधता मिलती है।