Thursday, 13 April 2017

Media - राष्ट्रवादी पत्रकार सुरेश चव्हाणके की गिरफ्तारी पर नागरिक समाज की चुप्पी गंभीर षडयंत्र की ओर इशारा करता है?

मुझे याद है कि कैसे एक चैनल जिसने देश की सुरक्षा से संबंधित संवेदनशील जानकारी की संवेदनहीन रिपोर्टिंग करके देश के खिलाफ ही लगभग युद्ध छेड़ दिया था। पूरा का पूरा वामपंथी-उदारवादी-कठमुल्ला जमात पक्ष में मुहीम तब खड़ा कर दिया था जब सरकार ने कार्रवाई करते हुए एकदिनी प्रतिबंध लगा दी थी। स्क्रीन काला करके और स्टूडियो में एक दिन तो चुना लगे दो लोगों को बैठाकर तो चैनल अपने शर्मिंदगी को ही उजागर कर दिया था। पर इनके दोहरेपन का अंदाजा हम कई मौकों पर देख सकते हैं। आपको याद होगा कि चैनल ने बलात्कार के आरोपी चैनल के एक एंकर के भाई का खबर तक भी नहीं दिखाया था और ABVP द्वारा देशद्रोहियों का किया जाने वाला विरोध गुंडागर्दी और देश-विरोधी नारा अहमति का हक के रूप में पेश किया था।

पर कुछ दिन पहले जब जी न्यूज के कुछ पत्रकारों पर बंगाल सरकार द्वारा मुकदमा किया गया तो सिविल सोसाइटी का एक भाग जो उस स्क्रीन काला करने वाले चैनल के पक्ष में खड़ा था और अपने को निष्पक्ष मान रहे थे,वे उस वक्त खामोश हो गए थे। तो आप कैसे अनुमान लगा सकते हैं कि सुरेश चव्हाणके के पक्ष में ये लोग खड़े होंगे?

क्या अनुमान लगा लिया जाए कि अब समाज सीधे-सीधे दो खेमों में बंट गया है। एक ओर वो हैं जो देश-विरोधी नारों को असहमति का हक करार देते हैं और उनके पक्ष में खड़े नजर आते हैं और दूसरे तरफ हैं राष्ट्रवादी लोग और पत्रकार? देश का खिलाफत करने वालों के पक्ष में खड़े होकर वास्तव में अपने को निष्पक्ष कहना ही देश के खिलाफ सबसे बड़ा षडयंत्र है।

अभी हाल में ही सुदर्शन न्यूज चैनल के संपादक और चीफ मैनेजिंग डायरेक्ट सुरेश चव्हाणके को बुधवार को गिरफ्तार कर लिया गया है। सुरेश पर आरोप है कि उन्होंने अपने चैनल ‘सुदर्शन’ पर यूपी के संभल में धार्मिक स्थल की झूठी खबरें प्रसारित कर सांप्रदायिक माहौल को बिगाड़ने की कोशिश की है। संभल के पुलिस अधीक्षक रवि शंकर छवि के अनुसार चव्हाणके की गिरफ़्तारी भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए, 259ए और 505 (1ए) के तहत हुयी है।

कई रिपोर्ट्स के मुताबिक सुरेश चव्हाणके ने 13 अप्रैल को संभल के एक धार्मिक स्थल में जल चढ़ाकर जलाभिषेक करने की घोषणा की थी जिसके बाद एक स्थानीय कांग्रेसी नेता इतरत हुसैन बाबर ने चव्हाणके के संभल पहुंचने की स्थिति में उन पर हमला करने की धमकी दी थी।

यह प्रकरण एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारत का सिविल सोसाइटी अभी भी प्रौढ़ नहीं हुई है,साथ ही वह आरोप जो लगातार लगते रहे हैं कि ये फंडेड लोग हैं और मात्र फ्रेम के हिस्सा भर हैं,अधिकाँश तो भाई-भतीजावाद से पीड़ित बेकार हो चुके जमात का भाग भर है,को सही प्रतीत करता है।

सवाल यहीं है कि वो लोग जो उस एक निजी चैनल(स्क्रीन काला करने वाला) के पक्ष में खड़े हुए थे और चिल्ला-चिल्लाकर बार-बार यहीं कह रहे थे कि हम तो निष्पक्ष हैं,अभिव्यक्ति के आजादी के साथ हैं और मीडिया पर लगे किसी भी प्रकार के सेंसर के खिलाफ हैं,लेकिन वो आवाज उनदिनों जी न्यूज पर हुए मुकदमे के खिलाफ क्यों नहीं उठ रहे थे और आज सुरेश के पक्ष में क्यों नहीं उठ रहे हैं? जाहिर है उनकी अपनी स्वामीभक्ति थी,उस विरोध का कोई भी किसी भी कोण से संबंध अभिव्यक्ति,सेंसर आदि से नहीं था क्योंकि निष्पक्ष आवाज किसी के लिए भी उठते हैं।

अब भारतीय जनमानस को समझ जाना चाहिए कि इन वामपंथियों बुद्धिजीवियों का विरोध चाहे हैदराबाद दलित आत्यहत्या को लेकर हो या अखलाख वध को लेकर हो या अकादमी पुरस्कार का लौटाया जाना हो,सभी के सभी बनावटी और विचारधारा से प्रेरित फर्जी और स्वामीभक्तिपूर्ण था जो मात्र विरोध के फ्रेम का हिस्सा भर था और कुछ नहीं।