Wednesday, 12 April 2017

Hindu Nation - कुलभूषण जाधव और राष्ट्रवाद!

अतीत में रह चुका और भविष्य में 'अखंड भारत' का हिस्सा बनने वाला पाकिस्तान आज अपने ही भारत भूमि के नागरिक को गलत जासूसी के आरोप में मौत का सजा सुना दिया है। इसका एकही कारण है कि परिस्थितियों ने पाकिस्तानी लोगों का मानसिकता बदल कर रख दिया है। इनके मानसिकता की घर वापसी में वर्षों लग सकते हैं,लेकिन हमारे पास उतना संयम नहीं कि आये दिनों पाकिस्तान द्वारा भारत पर हो रहे अत्याचार को सहते रहें। बदले परिदृश्य में आज 'युद्ध' से पाकिस्तान के समूल नाश करके भारत के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोगों के साथ बेगाना हो गए पाकिस्तानी भूमि को भारत में मिलाना अवश्यंभावी नजर आने लगा है।

वास्तव में भारत का राष्ट्रवाद भी सिकुड़ता जा रहा है। अधिकांश जनमानस में आज राष्ट्रवाद मतलब गाय,मुसलमान और पाकिस्तान छाया हुआ है। गाय को न मारने के लिए एक राष्ट्रीय कानून लाकर,मुसलमानों में महान हिंदू संस्कृति को पिरोकर वास्तविक घर वापसी कराकर और पाकिस्तान परस्त लोगों जो भारत में रहते हैं और पाकिस्तान में रहने वाले भारत विरोधी लोगों को समझाकर या युद्ध के बदौलत समूल नाश करके हम भारत के प्राचीन गौरव को पा सकते हैं। साथ ही राष्ट्रवाद की जो दायरा सिमटती नजर आ रही है उसका व्यापक फैलाव कर सकते हैं। आज यहीं एक मात्र विकल्प बचा है।

ताजा मामला कुलभूषण जाधव का है। जिन्हें पाकिस्तान द्वारा जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया और कथित इकबालिया बयान का एक वीडियो जारी किया गया। वीडियो में कुलभूषण को ये कहते हुए बताया गया कि वो 1991 में भारतीय नौसेना में शामिल हुए थे और उन्होंने 1987 में नेशनल डिफेंस अकैडमी ज्वॉइन किया था। छह मिनट के इस वीडियो में कुलभूषण ने ये बताया कि उन्होंने साल 2013 में रॉ के लिए काम करना शुरू किया था। बात यहीं नहीं रुकी और पाकिस्तान ने कुलभूषण जाधव की गिरफ्तारी का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में भी उठाया। पर वीडियो की प्रामाणिकता पर गंभीर सवाल उठाये पूरे विश्व में उठाये जा रहे हैं।

अब मुख्य सवाल यह हो गया है कि जाधव को कैसे बचाया जाए?

पहला उपाय - बीबीसी के रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तानी कानून के मुताबिक कुलभूषण के पास आर्मी एक्ट के तहत फौजी कोर्ट में अपील करने के लिए 40 दिन का वक्त है। इसमें जो भी फैसला होता है उसके खिलाफ वह रहम की अपील आर्मी चीफ़ जनरल कमर जावेद बाजवा और पाकिस्तान के राष्ट्रपति ममनून हुसैन को कर सकते हैं।

इससे यह बात स्पष्ट हो गयी है कि फिलहाल तो उन्हें फौरन सजा दिए जाने की संभावना नहीं है लेकिन उनके बचने की संभावना भी बहुत कम है। यह भी सच्चाई है कि अगर उनकी सजा पर जल्दी तामील नहीं भी की गई तो उन्हें जेल में कई साल रहना पड़ सकता है और ये बात भी निश्चित है।

दूसरा उपाय - कुलभूषण के बारे में एक बात ये भी चल रही है कि क्या किसी समझौते के तहत उसे भारत के हवाले किया जा सकता है? हालांकि इसकी भी संभावना बहुत कम दिखाई दे रही है। 'द हिंदू' में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट कर्नल रह चुके हबीब जहीर पर यह सुझाव दिया गया है कि ये एक पूर्व ISI अधिकारी रह चुके हैं और भारत-नेपाल सीमा पर भारत विरोधी अभियान चलाने के लिए भारत ने उन्हें गिरफ्तार किया हुआ है,पर इसकी कोई सुराख नहीं है और वह व्यक्ति कहां है फिलहाल गुमसुदगी का शिकार है,के लिए समझौता। क्या इसपर बात चल सकती है? अगर ऐसा होता है तो भारत के साख के लिए सही नहीं है। अब यह तय है कि सोचने वाली बात मुख्य रूप से यह हो गयी है कि ऐसा क्या है जो भारत पाकिस्तान को कुलभूषण के बदले में देने की पेशकश कर सकता है, ऐसा कुछ भी साफ नहीं है। यह लगभग नामुमकिन है क्योंकि विमान हाईजैक के समय की शर्मिंदगी हम आज तक झेल रहे हैं।

तीसरा उपाय - भारत अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप से पाकिस्तान पर दबाव बनाने को कह सकता है जो किसी भी नजरिये से उचित नहीं है। हालांकि कुछ विशेषज्ञ इस पर भी जोर दे रहे हैं।

चौथा उपाय - क्या भारत को अंतर्राष्ट्रीय न्यायलय जाना चाहिए? या इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में को उठाना चाहिए?
'नहीं'! पहले इस बात को समझना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय न्यायलय में कोई भी मामला तभी जा सकता है जब दोनों पक्ष की मंजूरी हो। दूसरा सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या हम द्विपक्षीय मुद्दों का अंतर्राष्ट्रीयकरण करके दोबारा नेहरू जैसा शर्मिंदगी झेलना चाहते हैं जब वे काश्मीर मुद्दे को अज्ञानवश संयुक्त राष्ट्र लेकर चले गए थे? आये दिनों संयुक्त राष्ट्र में हो रहे घटनाओं और परिणामों को देखकर तो यहीं लगता है कि विश्व विरादरी लगभग हमेशा कमजोर और छोटे देश का ही साथ देती है गलती चाहे जिसकी भी हो। हम काश्मीर मुद्दे पर भी देख चुके हैं। कुल मिलाकर इसपर भी नकारात्मक ही जवाब है।

पाँचवा उपाय - उपर्युक्त उपायों को देखने के बाद अब एक ही उपाय बचा रह जाता है जो राष्ट्रवाद को संकीर्णता से व्यापकता की ओर लाएगा और अखंड भारत की बुनियाद को मजबूत करेगा। वह उपाय है - "केवल और केवल युद्ध।"

क्योंकि यह सर्वमान्य बात है कि युद्ध का माहौल शांति स्थापित करने का सबसे बड़ा औजार है। यहीं वह तरीका है जिससे भारत-पाकिस्तान जैसे संवेदनशील रिश्ते को हल किया जा सकेगा। ऐसे भी युद्ध को लेकर इतना उत्साह भारत में अभी के तुलना में कभी नहीं देखा गया है। लगभग हर आम आदमी के जुबान पर युद्ध का नशा ही चढ़ा हुआ है। खासकर तब से जब भारत द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक का साहसी कदम उठाया गया। प्रधानमंत्री को जनता की इस भावना को समझना चाहिए और करोड़ों युवकों को सैन्य प्रशिक्षण देकर सेना की मदद के लिए तैयार करना चाहिए,इसके साथ ही अनिवार्य सैन्य सेवा भी लागू कर देना चाहिए।

युद्ध हमारे अस्तित्व के लिए जरूरी है। कभी-कभी दूसरे से भी सीखना चाहिए। कुछ दिन पहले लिखे मैं एक उदाहरण को दे रहा हूँ -

बात उस समय की है जब चीन के पास परमाणु हथियार नहीं थे। एक चीनी नेता पैंग ने 22 अगस्त 1956 को एक भाषण में कहा था,"अमेरिका के पास परमाणु हथियार हैं और वह हमें उनका डर दिखा रहा है। पर हम परमाणु युद्ध से नहीं डरते। क्यों ?
क्योंकि चीन की आबादी 60 करोड़ है। अगर परमाणु हथियार से 20 करोड़ भी लोग मर गए तो भी 40 करोड़ बाकी रहेंगे। अगर 40 करोड़ भी मर गए तो भी 20 करोड़ बाकी रहेंगे। अगर 20 करोड़ चीनी बाकी रहे तो चीन दुनिया का सबसे बड़ा देश रहेगा। और फिर,ये 20 करोड़ लोग किसी भी हालत में समर्पण नहीं करेंगे। इसलिए अंततः युद्ध में हार अमेरिका की होगी।"

फरवरी,1965 में माओ-त्से-तुंग ने एडगर स्नो से भी एक भेंट में कहा था कि चीन युद्ध से नहीं डरता। उन्होंने यह भी कहा कि  वह इस बात को नहीं मानते कि परमाणु युद्ध से सर्वनाश हो जाएगा।

अमेरिका में भी हर्मन काहन जैसे लोग हैं जिनका काफी अर्से तक दावा रहा है कि अमेरिका परमाणु युद्ध में भी जीत सकता है और अमेरिकी सभ्यता परमाणु युद्ध के बाद भी जिंदा रहेगी।
(ऐसे तो यह लंबी चर्चा का विषय है जो यहां संभव नहीं)

तो अब आपसभी समझ ही गए होंगे कि युद्ध से डरने वाला कुछ नहीं कर पाता। चीन की शक्ति आज ऊंचाइयों पर है,भारत के डरपोक हुक्मरानों को चीन से सीख लेनी चाहिए। कभी-कभी दुश्मन भी बहुत कुछ सीखा देते हैं। दूसरा उदाहरण इजराइल का है जिसके चारों ओर दुश्मन हैं,आतंकी खतरा है लेकिन फिर भी आज तक वह टिका हुआ है,बस केवल और केवल आक्रामक तेवर और युद्ध से कभी भी पीछे न हटने के कारण।

चीन उस समय भी नहीं डरा, जब उसके पास परमाणु हथियार भी नहीं थे। आज भारत के पास परमाणु हथियार भी है और काफी जनसंख्या भी तो डर किस बात का ?
लगता है मोदी के इर्द-गिर्द चापलूस और अदूरदर्शी नीति-निर्माता जमा हो गए हैं जो गलत सलाह देकर गुमराह कर रहे हैं।

इसलिए सुब्रमण्यम स्वामी का बयान कि 10 करोड़ लोग मरने के लिए तैयार रहें(मैं इसकी प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता, स्वामी का बयान जनसत्ता में छपी एक खबर के आधार पर)काबिलेतारीफ है क्योंकि कोई तो हिम्मत जुटा पाया यह बात कहने को।

(पैंग,काहन और माओ के बातों की प्रामाणिकता के लिए महेंद्र कुमार द्वारा लिखी किताब 'Theoritical aspects of international politics' का पेज नंबर-26 देखें।)