Saturday, 22 April 2017

Discourse - कैसे आपको काश्मीर को लेकर गुमराह किया जा रहा है? समाधान का एक ही उपाय है!

बिजनेस स्टैंडर्ड के एक आलेख में लिखा गया है,"क्या हमने यानी भारत ने कश्मीर गंवा दिया है? इसका स्पष्ट उत्तर तो न ही है लेकिन कुछ प्रतिवाद हैं जिन्हें ध्यान में रखना होगा। इस तर्ज पर हम सन 1947 से कई बार कश्मीर गंवा चुके हैं। दूसरी बार हमने कश्मीर 'गंवाया' सन 1965 में। सन 1962 के चीन युद्घ को देखते हुए पाकिस्तान ने हम पर लड़ाई थोपी। सन 1965 वह आखिरी मौका था जब कश्मीर हमसे छिन सकता था। इस बात को 52 वर्ष बीत चुके हैं। सन 1971 में पाकिस्तान ने पुंछ और छंब में हमला किया और सन 1999 में करगिल में लेकिन इस आधी सदी में हमने कश्मीर में कुछ गंवाया नहीं बल्कि अर्जित ही किया।"

ये लिखा गया है शेखर गुप्ता द्वारा जिनके आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं। ये आगे सवाल उठाते हैं,"तो चिंता किस बात की है?"

और जैसे ही जवाब देने का प्रयास करते हैं,इनके द्वारा और इनके जैसे कई कलमकारों द्वारा गुमराह करने की शुरुआत कर दी जाती है।

जिसका पहला नमूना है - "चिंता इस बात की है कि बीते वर्षों में कश्मीर को लेकर हमारी सोच सैन्य संचालित हो चली है। अतीत में जहां सैन्य चुनौती वास्तविक थी, वहीं अब ऐसा नहीं है। कश्मीरियों को मोटेतौर पर राष्ट्रवादी और सच्चा माना जाता है। सन 1965 की घुसपैठ का भंडाफोड़ स्थानीय लोगों ने ही किया था। आज कोई सैन्य चुनौती नहीं है। परंतु हमने अपने ही लोगों को सैन्य चुनौती मान लिया है। यही वजह है कि कश्मीर की सीमा सुरक्षित होने के बावजूद उसके मानसिक और भावनात्मक स्तर पर हमसे दूर होने का खतरा उत्पन्न हो गया है।"

मतलब इनके जैसे कई लोग मानवाधिकार आदि के नाम पर सेना को घाटी से वापस लौटाने की वकालत करते नजर आते रहते हैं। पाकिस्तान के समर्थन में लगाए गए नारों को असहमति का हक करार देते हैं। क्या इसे पाकिस्तान परस्तता नहीं कहा जाए?

अब आते हैं - काश्मीर की समस्या के समाधान कैसे हो सकता है?

पहला मुद्दा - हाल में हुए चुनाव में मात्र सात फीसदी वोट देखने को मिला। इसे लेकर पूरे देश में अफवाह फैला दिया गया कि काश्मीरी जनता का भारतीय लोकतंत्र से मन ऊब चुका है। यह मोदी के नीति का गलती है। बीबीसी हिंदी पर भी छपे एक आलेख में लिखा गया कि अब वक्त आ गया है कि मोदी से सवाल पूछने का कि आपके पास काश्मीर को लेकर रोड मैप क्या है?

पर आप ऐसे कई नमूने देखें होंगे जब भारतीय लोकतंत्र में जीत-हार का फैसला एक वोट से हो जाता है। काश्मीर के उस हिंसाग्रस्त चुनाव में तो सात फीसदी वोट हुए हैं। यह काश्मीरी लोगों का लोकतंत्र के प्रति आस्था ही है कि अलगाववादी गुटों के डर का माहौल बनाने के बाद भी लोग लोकतंत्र के लिए बाहर निकले थे। ऐसा अफवाह फैलाना ही तो इनका मुख्य साजिश का हिस्सा है कि काश्मीर भारत से छिटक रहा है।

दूसरा मुद्दा - एक ऐसे क्षेत्र में जहां एक जवान को अपमानित किया जाता है लेकिन इसपर कोई कठोर जवाब देखने को नहीं मिलता! क्यों? पर आप महसूस कर रहे होंगे कि जब एक काश्मीरी नौजवान को सेना के कार के बोनट पर बैठा कर घुमाया गया तो कई संगठनों मसलन एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा सिविल कोर्ट में केस चलाने की बात कही गयी और बीबीसी के ही एक आलेख में युद्ध अपराध के तौर पर देखा गया।

इस मामले को लेकर दूसरा विश्लेषण यह भी आ रहा है कि अगर सेना द्वारा ऐसा नहीं किया जाता तो वहाँ लाशें बिछा दी जाती क्योंकि माहौल काफी ही खराब हो चला था। डीडी न्यूज के कार्यक्रम 'चर्चा में' इस प्रश्न पर सारवान विमर्श किया गया है ।

तीसरा मुद्दा - अब एक ही विकल्प बचता है और वह है - 370 कि समाप्ति!
इसे समाप्त करने को लेकर सिर्फ एक ही तर्क काफी है कि आजादी के बाद इतने वर्षों तक हम कई तरीके अजमा लिए लेकिन आज सभी के सभी बेकार हो चुके हैं। वाजपेयी के दिल जीतने का प्रयास भी नाकामयाब हो गया है जिसका आज कोई अहमियत नहीं रह गया है क्योंकि उस दौरान पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव देखने को मिल रहा था लेकिन आज विश्व विरादरी का रुख बदल गया है। पाकिस्तान का दिखावटी हौसला बुलंद है तो वह काश्मीर मुद्दे पर शांति का बात क्यों करेगा?

हालात ऐसे भी खराब हैं तो क्यों न 370 को समाप्त कर दिया जाए जो समस्या की मूल वजहों में से एक है? 370 की समाप्ति के बाद माहौल खराब होने का डर सता रहा है तो ऐसे कौन सा वहाँ शांति है? मुझे उम्मीद है कि 370 के हटते ही घाटी भावनात्मक रूप से भारत से जुड़ पाएगा। अलगाववाद का मूल तो इसी अनुच्छेद में है!

अगर कुछ समय के लिए मान लेते हैं कि माहौल खराब होता चला गया तो हमें इजराइल जैसा कड़क राष्ट्र बनने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए और पहले अपने दुश्मनों का मटियामेट कर देना चाहिए और तब जाकर क़ानून की किताब को खोलना चाहिए। आखिर यहीं तो आडवाणी की नीति है जिसे गुजरात में मोदी ने 2002 में एक बार बखूबी अजमा कर देख लिए हैं। उसका भारतीय समाज को कितना फायदा मिला हम नजरंदाज नहीं कर सकते

और इसी के बदौलत भारतीय समाज आधुनिक रूप से समरस हो पाया।

इजराइल आज अस्तित्व में क्यों है? क्योंकि वह कई बार छापमार आंदोलनों को कुचलने में कामयाब रहा है,उसने फिलीस्तीनी आंदोलनों को खत्म किया,अंतरराष्ट्रीय दबाव की अवहेलना की,देखते ही गोली मारने के आदेश दिए,एक दीवार उठाई और अपने नागरिकों को सैन्य प्रशिक्षण दिया।

भारत की इतनी बड़ी जनसंख्या किस काम आएगी?

1. बिज़नेस स्टैंडर्ड के लेख का संदर्भ
2. बीबीसी हिंदी के आलेख का संदर्भ
3. काश्मीर में एक चुनाव में सात फीसदी वोट
4. एमनेस्टी इंटरनेशनल का प्रेस रिलीज
5. बीबीसी का युद्ध अपराध का आलेख
6. डीडी न्यूज का चर्चा में प्रोग्राम