Saturday, 15 April 2017

Discourse - काश्मीर मुद्दा का एक ही हल है!

ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि पिछले तीन सालों में काश्मीर की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। बीबीसी हिंदी के लिए लिखते हुए राजेश जोशी काश्मीरी इंसानियत पर गंभीर सवाल उठाते हैं। पर आपको एक बात ध्यान रखना होगा कि सरकारें इंसानियत की बात तभी करती है जब जनता इंसानियत की बात करे। आप काश्मीर की जनता में इंसानियत का एक कतरा भी खोज सकते हैं?

'नहीं!'

क्योंकि अगर इंसानियत का ये दायरा बचा होता तो अपने घर से हज़ारों मील दूर पीठ पर भारी पिट्ठू लादे, एक हाथ में राइफ़ल उठाए कश्मीर के एक अजनबी मोहल्ले से गुज़रते हुए एक भारतीय जवान को सड़कों पर घूमने वाले कश्मीरी नौजवानों के हाथों अपराधियों की तरह बेइज़्ज़त नहीं किया जाता। जिसका वीडियो आज वाइरल तो हो गया है और कुछ वहीं उदारवादी-कठमुल्ला-वामपंथी जमात इसे सहनशीलता के नजरिये से पेश कर रहा है। अगर वह जवान अनुपम खेर के शब्दों में अपने बंदूक से नहीं बल्कि अपने चमाट से भी मार देता तो वह देशद्रोही काश्मीरी वहीं जमीन सूंघता नजर आता।

आप जरा सोचिए! जैसा राजेश जोशी लिखते हैं,"एक सज़ायाफ़्ता अपराधी की तरह ये वर्दीधारी जवान हाथ में राइफ़ल होने के बावजूद चुपचाप सिर झुकाकर गालियाँ, थप्पड़ और अपमान सहते हुए किसी तरह बचकर निकलने को मजबूर होता है।"

आखिर क्यों? क्या इसके हाथों और पैरों को कानून की बेड़ियों से जकड़ दिया गया है? या कोई और वजह है?

मुख्य दोष हमारी ट्रेनिंग की व्यवस्था में है। हम मैदानी और शांत इलाकों के लिए तैयार किये गए जवानों को उग्रवादी और संवेदनशील इलाकों में भेज देते हैं। ऐसे जवानों का व्यवहार सिविलियन से शांति से पेश आने का हो जाता है। उससे भी हटकर अपने ड्यूटी को ज्यादा तवज्जो देने की बात बाहरी वातावरण का परवाह किये वगैर करने को दिलो-दिमाग में बैठा दिया जाता है। हाल में काश्मीर में जो हुआ वह इसी का नतीजा है।

इसकारण काश्मीर जैसे संवेदनशील इलाकों और माओवादियों से निपटने के लिए जवानों को अलग से प्रशिक्षित करने की जरुरत है ताकि वे ऐसे सिविलियन देशद्रोही पर भी गोली चलाने से न हिचके। उसके मन में किसी तरह का संकोच नहीं हो।

वर्षों से लगभग चलता आ रहा है कि सुरक्षा बलों से चरमपंथियों की मुठभेड़ के दौरान सैकड़ों की तादाद में निहत्थे कश्मीरी ख़ुद ढाल की तरह सामने खड़े हो जाते हैं और उन्हें न अपनी जान की परवाह होती है और न अपने परिवार वालों के मारे जाने का ग़म। पकड़े गए चरमपंथियों को छुड़ाने के लिए कश्मीरी औरतें भारी हथियारों से लैस सुरक्षा बलों पर टूट पड़ती हैं।कश्मीर की सड़कों पर से गुज़र रहे सुरक्षा बल के जवानों को गाली-थप्पड़ खाने के बावजूद सिर झुकाकर चलना पड़ता है।

आखिर ऐसा क्यों होता है? क्योंकि वहाँ आज भी भारत विरोधी मानसिकता को हवा दी जा रही है। पत्थरबाजों का गर्व से प्रशंशा किया जा रहा है। ऐसे परिवेश में जहां लोगों को अंधा कर देने वाली पैलेट गनें और एके-47 राइफ़लें कम पड़ती नजर आ रही है? अगर हां तो सेना को और अधिकार देने की जरुरत है क्योंकि भारत भूमि से युद्ध किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

राजेश जोशी लगभग उदारवादी-कठमुल्ला-वामपंथी जमात के नजरिये को ही प्रतिबिंबित करते हुए लिखते हैं - 'कश्मीर के मुद्दे को इंसानियत के दायरे में सुलझाया जाएगा' - ये वाजपेयी का ऐसा वाक्य था जिसे याद कर आज भी कश्मीरी लोग भावुक हो उठते हैं क्योंकि अब कश्मीर में इंसानियत का कोई दायरा बचा नहीं है? एक तरह से यह तबका बहस को गुमराह करने का काम करता रहा है। इसी के साथ सवाल उठाया जा रहा है कि अगर कश्मीर में इंसानियत का दायरा बचा होता तो भारतीय फ़ौज या पैरामिलिट्री के जवान एक ग़रीब कश्मीरी रफ़ूगर को हरे रंग की फ़ौजी जीप के बोनट पर बाँधकर मानव ढाल की तरह इस्तेमाल नहीं कर रहे होते?

और तो और भारतीय सेना को ही कटघरे में खड़ा करने का काम शुरू कर दिया गया है और कहा जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक़ किसी इंसान को उसकी मर्ज़ी के बिना ढाल की तरह इस्तेमाल करना युद्धअपराध की श्रेणी में आता है। मतलब जिन जवानों ने उस काश्मीरी युवक को जीप पर बांधकर घुमाया वे युद्ध अपराधों के दोषी है। हद तो तब हो गयी है जब एमनेस्टी इंटरनेशनल नामक एक संस्था तो उन अधिकारियों और जवानों के खिलाफ सिविल कोर्ट में मुकदमा चलाने की बात कह डाली है जो भारतीय कानून के मुताबिक देशद्रोह के एक मुकदमे का सामना भी कर रही है जो अपने गिरेबान में नहीं झांकते हैं।

क्या उस काश्मीरी युवक को गोली मार देना चाहिए था या पैलेट गन से अंधा कर देना चाहिए था? इनसभी उपायों से बेहतर तो यहीं है कि उसे जीप के बोनट पर बैठाकर उन काश्मीरियों में डर पैदा किया जाए जो पत्थर मारने का दुःसाहस करते हैं। वोट न देने का अपील करते हैं। अगर स्थितियां खराब होती चली जाती है तो वार्त्ता कोई समाधान नहीं कर पाता और हिंसा ही एक मात्र उपाय बचता है। आखिर महान अहिंसावादी महात्मा गांधी भी आजादी के लड़ाई के दौरान एक बार हिंसा का वकालत करते नजर आये थे। इस नजीर को कौन भूल सकता है? काश्मीर आज इसी स्थिति में है।

मोदी को अब आडवाणी के सोच के अनुसार भारत को इसराइल की तरह का कड़क राष्ट्र बनाना चाहिए जो अपने दुश्मनों को पहले मटियामेट करता है और क़ानून की किताब बाद में खोलता है। ऐसा मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर 2002 में आडवाणी के इस अरमान को पूरा कर दिखाये हैं और देश के राजनीतिक विमर्श को पूरी तरह बदल डाले थे तो अब हिचकिचाहट क्यों हो रही है? क्या काश्मीर में कुछ समय के लिए क़ानून के राज को हटाने का वक्त नहीं आ गया है? मूल रूप से यहीं सवाल पूछना ज्यादा वाजिब होगा न कि मोदी आपके पास कभी-कभार अपने भाषणों में भावुक कविताई के अलावा कश्मीर के लिए क्या रोडमैप है?

अभी ऐसा वक्त है जब पूरा भारत 'हिंदू राष्ट्रवाद' का जश्न मना रहा है। एक के बाद दूसरे राज्य में मोदी को विजय पताकाएँ फहराते देख सोशल मीडिया पर,जो लोकतंत्र का ही विस्तारित रूप है भारी जनता मोदी के पीछे खड़ी है।

यह तय है और भरोसा भी है कि मुट्ठी भर 'कश्मीरी देशद्रोही' राष्ट्रवाद के इस चरम विस्फोट के आगे टिक नहीं पाएंगे और जो टिकने की कोशिश करेंगे उन्हें डंडे के बल पर ठीक कर दिया जाएगा। यह कुछ कमतर हो गया है - डंडे के बल पर नहीं बल्कि 'गोली' के बल पर ठीक किया जाएगा।

कुछ समय के लिए क़ानून के राज को काश्मीर से स्थगित करने का समय आ गया है क्योंकि नेशनल कांफ्रेंस के प्रवक्ता जिस लहजे में बात कर देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की ओर इशारा कर रहे हैं,अगर इसे और कुछ समय के लिए भी नजरअंदाज किया गया तो स्थिति और भी विस्फोटक हो सकती है!