Wednesday, 12 April 2017

Discourse - संघ और शिक्षा : प्रज्ञा प्रवाह द्वारा वास्तविक समाज-निर्माण!

(बिजनेस स्टैंडर्ड में छपी रााधिका रामशेषन के रिपोर्ट पर आधारित।)

आज कई सवाल तैरते हैं! अधिकांश लोगों के मन में यह कौंध भी रहा होगा कि आखिर क्यों ऐसा हो गया है?

नेपोलियन को 'फ्रांस का समुद्रगुप्त' क्यों नहीं कहा जाता है? समुद्रगुप्त को ही 'भारत का नेपोलियन' क्यों कहा जाता है?
इसी तरह चाणक्य को 'भारत का मैकियावेली' क्यों कहा जाता है? इसका उल्टा क्यों नहीं हो सकता?
जब दूसरी तलवारें (खासकर टीपू सुल्तान की तलवार) किस्से कहानियों में शुमार हो गई हैं तो पेशवा बाजीराव के दंडपट्ट से दुनिया को रूबरू कराने के लिए बॉलीवुड फिल्म की जरूरत क्यों पड़ी? इस दंडपट्ट से उन्होंने मुगलों से लोहा लिया था।
आखिर ऐसा क्यों है कि भारत के इतिहास की किताबों में स्वामी विवेकानंद किसी कोने में दब गए हैं, जबकि कार्ल मार्क्स के विचारों से हजारों पन्ने काले कर दिए गए हैं?

इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वैचारिक संगठन 'प्रज्ञा प्रवाह' द्वारा 25 और 26 मार्च को दिल्ली के बाहरी इलाके में एक कार्यक्रम में इस तरह के सवालों पर लंबी चर्चा की गई। इस कार्यक्रम में करीब 700 बुद्घिजीवियों ने हिस्सा लिया। इसमें आरएसएस के सरसंघचालक मोहनराव भागवत भी शामिल हुए। इस सम्मेलन के साथ ही 'ज्ञान संगम' नाम की महत्त्वाकांक्षी परियोजना भी शुरू हो गई।

इस संगम का लक्ष्य तय था। वह लक्ष्य जिससे हमें गुमराह कर दिया गया है। लक्ष्य था - देश की शिक्षा को औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकालना। यह काम शिक्षाविद करेंगे और अंग्रेजों की विरासत की बेडिय़ां तोड़ेंगे, जिन्हें संघ 'मानसिक दासता' मानता है।

आज इसी दासता को तोड़ने की जरूरत है। प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे नंदकुमार ने कहा, 'यहीं हमारा सबसे बड़ा मिशन है। क्योंकि आज जो भी संस्कृत में बात करता है उसे तुरंत कट्टरपंथी और रूढि़वादी मान लिया जाता है।'

वहीं संघ की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के राष्ट्रीय संगठन मंत्री सुनील आंबेकर का कहना है कि यह मिशन विरोध का ही एक रूप है। उन्होंने कहा, 'जो औपनिवेशिक मानसिकता और पहचान आजादी के कई दशकों बाद भी सत्ता के साथ चिपकी रही, वह ऐसी हरेक चीज को हेय दृष्टि से देखती है, जिसमें भारतीयता होती है। हम आम आदमी को विभिन्न मुद्दों पर विरोध करने का मंच देना चाहते हैं, जैसे स्कूलों में संस्कृत की मान्यता खत्म करना, साधु-संतों का मजाक उड़ाना और यह बात नहीं मानना कि विदेशी आक्रमणों से पहले भारत संपन्न देश था और उसकी अनूठी आर्थिक व्यवस्था थी।'

संघ के मुख्य प्रवक्ता मनमोहन वैद्य पूछते हैं, 'हम हमेशा एक ही तरह के व्यक्ति रहे हैं, हमारा धर्म, जीवनशैली और पहचान एक ही है। हमारे लिए राष्ट्र की परिभाषा यही है। अगर दक्षिणी राज्यों के लोग खुद को हिंदू नहीं मानते तो वे चार धाम यात्रा (यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ) पर क्यों जाते?'

शिक्षा को औपनिवेशिक काल से बाहर निकालने के मुद्दे पर हुई चर्चा में मध्यकालीन इस्लामी शासन और मुगलों की जगह अंग्रेजों को ज्यादा कोसा गया। आंबेकर ने कहा, 'मुगलों ने तक्षशिला और नालंदा के शिक्षा केंद्रों को नष्ट किया, लेकिन उनका ध्यान शिक्षा पर नहीं था। उन्होंने राजनीतिक लड़ाई लड़ी। अंग्रेजों ने हमें मानसिक गुलाम बनाने की लड़ाई लड़ी और इसकी शुरुआत स्कूलों से की।'
इनसब के बीच राकेश सिन्हा मानते हैं कि संघ के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती अपनी विचारधारा को व्यापक स्वीकार्यता दिलाने की है। उन्होंने कहा, 'सरकार से संरक्षण प्राप्त करने वाले संघ विरोधी बुद्घिजीवी उसे सांप्रदायिक और फासीवादी बताते हैं। 2014 का जनादेश बदलाव का प्रतीक है। यह जनादेश एक विचारधारा के लिए है जहां आप प्रधानमंत्री और संघ में भेद नहीं कर सकते। संघ एक राष्ट्रवादी और तुष्टिकरण विरोधी संगठन है। मोदी ने तुष्टिकरण की जड़ों पर हमला किया था।'

उन्होंने कहा कि लोकसभा के जनादेश ने सरकार के साथ संघ के दशकों पुराने टकराव को खत्म कर दिया है। अब संघ प्रतिक्रियावादी होने के बजाय एजेंडा तय करने की भूमिका में है। सिन्हा ने कहा, 'खासकर शिक्षण संस्थानों की बात करें तो वहां अब डराने धमकाने का माहौल नहीं है। बहस खुली और समावेशी होती है। ऐसे शिक्षक हैं जो छात्रों को संघ से जुड़े विषयों पर गाइड करने को तैयार हैं। मुझे याद है कि जब मैं संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार पर शोध लिख रहा था तो मुझसे कहा गया था कि विषय बदल दूं वरना किसी लायक नहीं रहूंगा।'

हालांकि कई आरोप भी लगाए जा रहे हैं। आज इस बात की हवा दी जा रही है संघ शिक्षण संस्थानों का भगवाकरण कर रहा है।

यहां एक सवाल निकलकर सामने आ रही है कि क्या संघ को उम्मीद है कि शिक्षण संस्थानों पर दशकों से चढ़े वामपंथी रंग को हटाने में उसे राजनीतिक संरक्षण से मदद मिलेगी?

इसका उत्तर कुछ इसप्रकार निकलकर सामने आया।  संघ के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर के संपादक और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र के छात्र रहे प्रफुल्ल केतकर ने कहा, 'संघ राजनीतिक संरक्षण के खिलाफ है क्योंकि उसका मानना है कि शिक्षा स्वायत्त होनी चाहिए।'

सिन्हा का इसका उत्तर सधा हुआ दिया। उन्होंने कहा, 'गांधी की हत्या के बाद सरकार और निजी ताकतों ने संघ को शैक्षिक और बौद्घिक बहसों से बाहर रखने का भरपूर प्रयास किया। संघ ने जमीन पर आम लोगों के बीच काम किया लेकिन अपनी विचारधारा को थोपने की कोशिश नहीं की।' उन्होंने संकेत दिया कि संघ की छवि को जो नुकसान पहुंचा है वह उसकी सोच से कहीं ज्यादा हो सकता है।

संघ के हस्तक्षेप को लेकर नंदकुमार ने कहा कि ज्ञान संगम का सरकार से कोई लेनादेना नहीं था। हालांकि इसके समापन सत्र में पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी मौजूद थे। मौजूदा मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने जनवरी में जम्मू-कश्मीर में संवाद सही करने पर संघ के एक कार्यक्रम को संबोधित किया था। जावड़ेकर से पहले जब स्मृति ईरानी ने मंत्रालय की कमान संभाली थी तो संघ की उन पर करीबी नजर थी। शिक्षाविदों के साथ जब भी वह बैठक करती तो उसमें संघ के प्रतिनिधि मौजूद रहते थे। संघ के एक नेता ने कहा, 'हमें सरकारी संरक्षण स्वीकार करने के लिए लचीला रुख अपनाना चाहिए।'

हालांकि भाजपा शासित कुछ राज्यों में पाठ्यक्रमों में हुए कुछ बदलावों से पता चलता है कि संघ संरक्षक का काम कर रहा है। संघ की पाठशाला से निकले हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने संघ परिवार से जुड़े दीनानाथ बत्रा की अगुआई में एक सलाहकार समिति गठित की है, जो शिक्षकों का मार्गदर्शन करेगी और स्कूली पाठ्यक्रम में बदलाव के लिए सुझाव देगी। राजस्थान में राज्य विश्वविद्यालय के कर्ताधर्ताओं में संघ समर्थित राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के दो सदस्य शामिल हैं। अलबत्ता मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे संघ के हस्तक्षेप से इनकार करती हैं।

Discourse - शिक्षा से जुड़े संघ के संगठन और संस्थाएं - ABVP - भारत में रहना है तो वंदेमातरम कहना है।