Saturday, 8 April 2017

Discourse -गौरक्षकों को प्रशिक्षण की जरूरत तभी वेवजह का विवाद थम पाएगा!

हाल ही में एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में डाली गयी है जिसपर कोर्ट ने केंद्र और छः राज्यों से जवाब मांगा है। जस्टिस दीपक मिश्रा के बेंच ने केंद्र,राजस्थान,महाराष्ट्र,गुजरात,झारखंड,कर्नाटक और उत्तर प्रदेश को एक नोटिस जारी किया है कि क्यों न इन समूहों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई हो? हालांकि अगली सुनवाई तीन मई को होने वाली है।

ऐसे गैर-जिम्मेवार याचिका को डालने वालों में एक नाम है तहसीन एस. पूनावाला जिनका इतिहास रहा है और बजरंग दल और गौरक्षक दलों को प्रतिबंधित कराने को प्रयासरत रहे हैं।

आ रही रिपोर्ट को देखते हुए लग रहा है कि अलवर की घटना अति-उत्साह में प्रतिष्ठित गौ-रक्षकों द्वारा कर दिया गया। हो सकता है क़ानून इनको सजा दे और देना भी चाहिए लेकिन दादरी में एक मुसलमान के वध को किसी भी नजरिये से गलत नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि वध धर्मसम्मत और हत्या क़ानून के खिलाफ होता है। इसबात के पुख्ता प्रमाण है कि दादरी के मुसलमान ने गाय को मारकर खाया था और समाज इसका वध करके वेदों के अनुसार कोई गलती नहीं बल्कि गौरव का काम किया है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि तत्कालिक सरकार द्वारा किस तरह मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति वोट की लालच में अपनायी गयी थी और पैसों की बरसात कर दी गयी थी।

उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था,"गौ-रक्षक के रूप में यह असामाजिक तत्वों का जमावड़ा है।" लेकिन वे भी मूल कारण पर ध्यान इंगित नहीं कर पाए थे इसीकारण संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा इनका कटु विरोध भी देखने को मिला था। वो मूल कारण प्रशिक्षण का है।

चाहे ऊना में दलितों की पिटाई का मामला हो या ईस्ट गोदावरी का मामला जहां दलित चमड़े उतारने के अपने परंपरागत कार्यों में लगे हुए थे और रिपोर्ट कहते हैं कि वे गायें पहले से ही मरी हुई थी,ऐसे में गौरक्षकों का कार्रवाई असमाजिक ही है जो मोदी के वक्तव्य को प्रतिबिंबित करता है लेकिन समस्या के समाधान की ओर ईशारा नहीं करता।

लेकिन हमें एकबार राज्यों के क़ानून पर भी ध्यान देना चाहिए कि वे क्या कहते हैं?

गुजरात का एनिमल प्रिवेंशन एक्ट स्पष्ट रूप से कहता है,"अगर गाय को बचाने का काम किसी के द्वारा किया गया है तो उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी।" ऐसा ही महाराष्ट्र का क़ानून भी कहता है कि अगर भले नियत से कोई कार्य हुआ है तो कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा। वहीं कर्नाटक का कानून कहता गाय काटना और काटने के उद्देश्य से व्यापार करने वालों को 6 महीने की सजा हो सकती है। और कई राज्य भी इसी तरह का कानून बना रखें हैं।

आये दिन गौरक्षकों को लेकर जो तमाम विवाद शिखर पर आ जाते हैं - इनके नियत में कोई खोट नहीं बल्कि प्रशिक्षण का अभाव है। यह कोई दलितों और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न का मामला नहीं बल्कि आस्था के बचाव के लिए किया जाने वाला पवित्र काम है जिसे हर भारतीय(हिंदू) को करना चाहिए। गलती उनलोगों की है हो गाय मांस भक्षण करने और काटने में संलिप्त हैं।

अगर या तो सरकार द्वारा या कुछ गैर-लाभकारी संस्थाओं द्वारा इन गौरवमयी गौ-रक्षकों के लिए प्रशिक्षण(ट्रेनिंग) का व्यवस्था किया जाए तो जो गलती इनके द्वारा कभी-कभार हो जा रही है उसे काफी हद तक रोका जा सकता है क्योंकि ट्रेनिंग के बाद ये पहचान करने की अपनी काबिलियत में परिपक्व हो जाएंगे कि कौन वास्तविक गाय माता को खाने वाला है,काटने वाला है और अवैध व्यापार कर रहा है? साथ ही कौन मरी हुई गाय का चमड़े उतारकर अपनी परंपरागत काम कर रहा है।

इन गौ-रक्षकों के लिए एक वेबसाइट की व्यवस्था की जानी चाहिये और उसपर गौ-रक्षा से संबंधित तमाम जानकारी होना चाहिए और वो माध्यम भी बताया जाना चाहिए कि गाय के हत्यारों की पहचान का जरिया क्या हो सकता है? यह एक विकल्प हो सकता है।