Monday, 24 April 2017

जन चर्चा में आज लल्लन मियाँ का काश्मीर और पाकिस्तान परस्तों पर सुझाव! - 6/1

"लल्लन मिया! कल 'स्क्रीन काला करने वाले' को देखे? कुछ काश्मीरी छात्रों को बैठाके नजरिया समझने का प्रयास कर रहे थे।"

"हाँ!"

"याद ही होगा कि कैसे जब एक देशद्रोही कह रहा था कि जब फुटबॉल में हम जर्मनी और ब्राजील का समर्थन कर सकते हैं तो क्रिकेट में पाकिस्तान का क्यों नहीं? यह हमारा अभव्यक्ति है।"

"हमरा नाम है लल्लन मिया! जब मैं कहता हूँ तो लोग कहते हैं ऐसा कह रहा है। उस काले स्क्रीन वाले पर तो मुझे शर्म आ रही है जो कह रहे थे कि अच्छा तर्क है। पर आपको किसी देश के समर्थन से नहीं रोका जा रहा है बशर्ते कि माहौल दोस्ताना हो। चीन और पाकिस्तान से रिश्ते हमारे सामान्य नहीं है। पाकिस्तान के काश्मीर में अपने हित हैं,अगर इस परिस्थिति में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम का समर्थन करेंगे तो नियत पर शक होगा ही। आप श्रीलंका,नेपाल और बांग्लादेश का समर्थन कीजिये कौन रोका है और कौन विरोध कर रहा है? भारतीय कानून तो शत्रु देश का समर्थन करने को गुनाह मानता ही है।"

"इतना ही नहीं उन विकृत मानसिकता वाले लोगों को नजरिया समझने के नाम पर इतना बड़ा मंच भी दे दिया गया। इस स्क्रीन काला करने वाले ने कभी काश्मीरी पंडितों को इतने बड़े पैमाने पर बुलाये? यह तो वैसा ही सबकुछ हो रहा है जैसा कुछ दिन पहले दिल्ली के एक विश्वविद्यालय में देश-विरोधी नारे लगाने वालों को असहमति का हक करार दिया जा रहा था।"

"हमरा नाम है लल्लन मिया! लेकिन मैं अब कुछ नहीं बोलूंगा!"

"इतना ही नहीं कुछ तो काश्मीर में पत्थरबाजों को भटके हुए नौजवान कह रहे हैं। बातचीत करने को लॉबिंग कर रहे हैं।"

"स्पष्ट है ये लोग अपनी नियत को उजागर कर रहे हैं कि भारत के संविधान में हमारी कोई आस्था नहीं है। चुनाव के दिन डर का माहौल बनाना इसी का हिस्सा था।"

"लल्लन मिया! ये तो आप जान ही रहे होंगे कि वहां की मुख्यमंत्री भी दिल्ली आयी थी और कह रही थी वाजपेयी के प्रयासों की डोर जहां छूट गयी थी वहीं से पकड़ना चाहिए। मतलब अलगाववादियों से भी वार्त्ता करना चाहिए।"

"हमरा नाम है लल्लन मिया! ये लोग समझ क्यों नहीं रहे हैं कि वाजपेयी के समय का परिदृश्य बदल गया है। उस समय शांति के लिए पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव था। पर आज पाकिस्तान का चीन के एक प्रोजेक्ट(CPEC) के कारण दिखावटी हौसला बुलंद है। आखिर अलगाववादियों के पास संसाधन तो कहीं से आता ही होगा जिसकी पूरी संभावना है कि वह पाकिस्तान ही है तो वह 'आजाद काश्मीर' के अलावा किसी पर समझौता पर सहमत क्यों होगा? भाजपा ने भी कह दिया है कि जिनकी भारत के संविधान में कोई आस्था नहीं है उनसे कोई वार्त्ता नहीं होगी जो एक सही रुख है।"

"ये तो मालूम ही होगा आपको आज कई पत्रकार और बुद्धिजीवी उन पत्थरबाजों और पाकिस्तान से भी सहानुभूति रख रहे हैं और वार्त्ता को ही हल बता रहे हैं।"

"अब वो समय चला गया है। अगर आज कोई वार्त्ता की बात करता है तो उसे भारतीय संप्रभुता पर हमला के रूप में लिया जाना चाहिए। ऐसे मेरे पास एक सुझाव है।"

"लल्लन मिया! इसी सुझाव का तो इंतजार रहता है।"

"हमरा नाम है लल्लन मिया! मैं कहता हूँ तो लोग कहते हैं ऐसा कह रहा है। पहले इन्हें एक मौका दिया जाये कि भारत में रहने वाले वे लोग जिनकी आत्मा पाकिस्तान में बसती है और पत्थरबाजों से सहानुभूति रखते हैं और साथ ही जो देश विरोधी नारों को असहमति का हक कहते हैं,वे पाकिस्तान चले जाएं! इसके लिए दिल्ली से इस्लामाबाद तक एक 'वन वे ट्रेन' चलाना चाहिए वो भी मुफ्त!
अगर ये चले जाते हैं और जो नहीं जाते हैं और इनकी भारत के संविधान में कोई आस्था नहीं है और भारतीय संप्रभुता के लिए कोई इज्जत नहीं है तो ऐसे दुश्मन देशदोहियों का समूल नाश कर देना चाहिए और तब क़ानून की किताब को खोलना चाहिए। तभी हम मजबूत होंगे,नहीं तो ये दीमक की भांति हमें खोखला कर देंगे।"