Sunday, 30 April 2017

जन चर्चा में आज बेबाक नजरिया - दलित छात्रों का टॉपर होना!

          हालांकि छात्रों को खेमों में बांटने का एक खतरनाक षडयंत्र कुछ दलित चिंतकों और कई वामपंथी लोगों द्वारा किया जा रहा है खासकर तब जब दलित छात्र मेहनत से प्रतिष्ठित परीक्षाओं में अव्वल आ रहे हैं। हाल में ही आये एक खबर के मुताबिक राजस्थान के 17 साल के एक दलित छात्र ने आईआईटी जेईई के मेन्स में पहला स्थान पाया है।

          दलित चिंतक कांचा इलैया ने इसे देश की अहम परीक्षाओं में हाशिए के समुदाय के छात्रों के टॉप आने पर कहा कि आने वाले वक़्त में ओबीसी और दलित समुदाय के छात्र ब्राह्मणों और बनियों के बच्चों पर भारी पड़ने वाले हैं। इन्होंने आगे कहा,"दलित और ओबीसी छात्रों में समझ का स्तर सवर्णों से कहीं ज़्यादा है। उनका दृष्टिकोण ज़्यादा गहरा होता है। इन्हें मौका मिला तो वे सवर्णों की बराबरी नहीं बल्कि उन्हें पीछे छोड़ देंगे। वह वक़्त दूर नहीं जब किसी दलित को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।"

          ऐसे बयान क्या हैं? इसका मूल मकसद वामपंथियों की सोच की तरह खेमों में बांटकर आपस में समाज को लड़ाना है। आखिर आपने कभी सोचा है कि दलितों का रुझान वामपंथी षडयंत्र के साथ कदमताल मिलाकर क्यों चल रहा है? कभी सोचा है आपने कि एक पाकिस्तानी ने इस्लाम,वामपंथी और दलित एकता की बात किया था,उसी को सही साबित तो नहीं किया जा रहा है?

           अभी कुछ साल पहले आईएएस परीक्षा में भी एक लड़की टॉपरों में से एक थी और वे भी दलित समुदाय से ही हैं। और भूषण अहीर नामक व्यक्ति भी महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग की परीक्षा में टॉप आए थे जो भी दलित समुदाय से ही हैं।

            लेकिन आखिर क्या कारण है कि इनमें से एक अपने समाज को छोड़कर गैर-धर्म से निकाह करने वाली है। यह क्या है? यहीं तो 'लव जिहाद' है! जो दलित विचारक उस दिन चीख-चीखकर हल्ला मचा रहे थे कि एक दलित लड़की ने पहली बार सिविल सेवा परीक्षा टॉप की और गर्व महसूस कर रहे थे लेकिन ताज्जूब तब हो गयी जब यहीं दलित समाज इन्हें एक अच्छा लड़का नहीं दे पाया! शायद समाज को उम्मीद है कि बाकी टॉपर को इस समस्या से नहीं जूझना पड़ेगा और दलित समाज उस घटना से कुछ सीख हासिल कर पाएगा!

             छात्र केवल छात्र होते हैं जिन्हें जातियों में बांटना तो घठिया सोच का परिचायक है। इनलोगों को समझना चाहिए कि ऐसी बातें आपको ही समाज से हासिये पर कर सकता है लेकिन अब वक्त आ गया है और समय की भी मांग है कि ऐसे दलित छात्र जिनकी आर्थिक हैसियत काफी सुदृढ़ हो उनके आरक्षण का विरोध इन दलितों द्वारा ही किया जाना चाहिए ताकि इसका फायदा उनके ही गरीब बच्चों को मिल सके और अंत में आरक्षण विरोधी मुहीम में शामिल होकर समरस समाज के निर्माण में योगदान देकर जीवन को सार्थक बना सकें।