Monday, 24 April 2017

History/Hindu nation - गोरक्षा को लेकर विचारों का विवाद - समझिए सावधानी से!

        बहस की शुरुआत इतिहासकार डीएन झा के हाल में छपे एक लेख से करते हैं जिसमें उन्होंने कहा है," रहा सवाल इतिहास का, तो मैंने प्राचीन, मध्यकालीन और समकालीन इतिहास का अध्ययन करने पर पाया कि कहीं भी गोहत्या करने पर मृत्युदंड का प्रावधान नहीं मिलता। चाहे शास्त्र हों, चाहे वेद-पुराण हों या किसी दूसरे धर्म की ग्रंथियां हों।"

         इस दावे में खोखलता और मजबूती कितनी है? हम बाद में देखेंगे! इससे पहले इन इतिहासकार महोदय और इनके एक समर्थक इतिहासकार की कारगुजारियों से अवगत कराना जरूरी है।

        कुछ दिन पहले मैंने एक 'ब्लॉग-प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था,अगर कुछ देर के लिए सही भी मान लिया जाए, तो क्या हो गया?' लिखा था जिसमें इशारा किया गया है कि डी.एन. झा अपनी किताब 'ANCIENT INDIA : AN INTRODUCTORY OUTLINE',मनोहर,नई दिल्ली,1977 में लिखते हैं,"प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था। यह बात उन्होंने बड़ी चालाकी से लिख डाली है कि अभी तक उसे(गाय को) पूज्य नहीं माना जाने लगा था। गायों और बैलों को आहार के लिए ह्त्या को जाती थी,और मेहमानों को खाद्य के लिए पेश किया जाता था।"

        फिर यहीं लेखक आगे स्वीकार करते हैं कि ऋग्वेद में एक-दो स्थानों पर गाय के बारे में उल्लेख मिलता है कि वह 'अघन्या' है अर्थात उसकी ह्त्या नहीं की जा सकती। पर यह बात उनके लिए मायने नहीं रखी है। वे आगे घोषित करते हैं,'गाय का अपना एक आर्थिक महत्त्व जरूर रहा होगा।' (पेज - 9)

         पांचजन्य में छपे एक लेख में कहा गया है कि अनेक वेद मन्त्रों में स्पष्ट रूप से किसी भी प्राणी को मारकर खाने का स्पष्ट निषेध किया गया है। प्रमाण स्वरुप कई श्लोक भी दिए गए हैं जैसे-हे मनुष्यो! जो गो आदि पशु हैं वे कभी भी हिंसा करने योग्य नहीं हैं-यजुर्वेद 1/1 और जो लोग परमात्मा के सहचरी प्राणी मात्र को अपनी आत्मा के तुल्य जानते हैं अर्थात जैसे अपना हित चाहते हैं वैसे ही अन्यों में भी व्रतते हैं-यजुर्वेद 40/7 और एक अन्य हे दांतो, तुम चावल खाओ, जौ खाओ, उड़द खाओ और तिल खाओ। तुम्हारे लिए यही रमणीय भोज्य पदार्थों का भाग हैं। तुम किसी भी नर और मादा की कभी हिंसा मत करो। अथर्ववेद6/140/2!

         तो समस्या कहां है? समस्या की कई वजहें हैं।

         1. दरअसल वेदों में क्या है, इसे स्वयं पढ़कर जानने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है।

         2. भाषा की कुंजी सबसे बड़ी समस्या है। क्योंकि अनुवाद तो अनुवाद ही होता है। जब आप मूल पाठ का अनुवाद अथवा टीका पढ़ते हैं, तो स्वाभाविक रूप से अनुवादक या टीकाकार के विचारों को ग्रहण करने के लिए बाध्य होते हैं। इसलिए भ्रम फैल सकता है या फैलाया जा सकता है।

         3. इसलिए जब-जब गोरक्षा का प्रश्न उठता है तब-तब तथाकथित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग अपनी विशिष्ट पोथियां ,वेदों की अपनी व्याख्याएं खोल कर बैठ जाता है और फिर ये लोग जान लड़ा देते हैं कि वेदों में गो-ह्त्या और गोमांस भक्षण का विधान है। मौके के अनुसार सेकुलर राजनीति के सूरमा भी कूद पड़ते हैं।

          4. टीवी बहसों में भी किसी वेद के जानकार या संस्कृत विद्वान को नहीं बुलाया जाता, बल्कि वामपंथी डेरों से पकड़कर लाए गए कलमनवीस मैक्समूलर और ग्रिफ्फिथ जैसे विदेशियों के उदाहरण देकर हमें वेद समझाते हैं।

          5. साथ ही एक और षड्यंत्र जारी है-गोरक्षा के प्रश्न को हिन्दू समाज में अगड़ा बनाम पिछड़ा का मुद्दा बनाकर प्रस्तुत करने का।

           मूल रूप से भ्रम पैदा हुआ वेदों में वर्णित अश्वमेध, नरमेध, अजमेध, गोमेध जैसे शब्दों से। क्योंकि मेध शब्द का एक अर्थ है मारना। इस एकमात्र अर्थ को मान लिया जाए तो फिर इसका अर्थ हुआ अश्व, नर, गो, अज (बकरा) आदि की हिंसा।

           परंतु ध्यान रहे मेध शब्द के दो अर्थ और हैं। एक, मेधा अथवा शुद्ध बुद्घि और दूसरा एकत्व का भाव। यदि मेध का अर्थ केवल हिंसा होता तो ‘मेधावी बालक’ का अर्थ ‘हिंसक बालक’होता। किसी लड़की का नाम ‘मेधा’ अथवा ‘सुमेधा’ भी न रखा जाता।

          ऐसे ही गोमेध का अर्थ यज्ञ में गो की बलि देना कतई नहीं है।

          कोई यदि ये कुतर्क करना चाहे कि मेध का अर्थ मारने से भी क्यों न लिया जाए तो उसका भी उत्तर वेदों में है जहां गाय को ‘अघन्या’अर्थात वध न करने योग्य कहा गया है। जिसे वामपंथी इतिहासकार भी स्वीकार करते हैं जिसका वर्णन मैंने ऊपर किया है।

          कुतर्क करने वालों द्वारा ‘गोघ्न’ शब्द को गायों के वध करने का संकेत बतलाया जा रहा है। लेकिन ये भी अधूरा अर्थ है। गोघ्न शब्द में हन धातु प्रयुक्त हुई है। इसके दो अर्थ हैं। एक, हिंसा और दूसरा, गति। अब एक तरफ गाय को अवध्य बतलाकर दूसरी ओर हिंसा की बात तो नहीं की गई होगी न? गोघ्न से आशय गति अथवा ज्ञान के अर्थ में है। वेदों में ‘हन्’ का प्रयोग किसी के निकट जाने लिए भी किया गया है। जैसे-अथर्ववेद में पति को पत्नी के पास जाने का उपदेश है। वहां भी ‘हन्’ धातु का उपयोग हुआ है। अब इसका अर्थ क्या करेंगे? पति को पत्नी की हिंसा करने को कहा जा रहा है?

          इसी प्रकार मीडिया में एक तर्क खूब उछाला जा रहा है कि वैदिक काल में जब कोई विशेष अतिथि, जैसे कि राजा, दामाद वगैरह किसी के घर आता था तो गृहस्वामी अपने सर्वश्रेष्ठ गाय-बैल आदि को मारकर-पकाकर उसे खिलाता था। ये भी एक मिथ्या अवधारणा है। ऋग्वेद के मंत्र 10/68/3 में अतिथिनीर्गा का अर्थ अतिथियों के लिए गोहत्या बतलाया जा रहा है। जबकि अतिथिनी शब्द का अर्थ ऐसी गायों से है जिन्हें अतिथि को दान किया जाए। ऐसे ही गाय की तरह बैल को भी अवध्य बतलाया गया है। जैसे गाय के लिए अघन्या अर्थात न मारने योग्य शब्द प्रयुक्त हुआ है उसी प्रकार से बैल के लिए ‘अघ्न्य’ शब्द का प्रयोग हुआ है। (पांचजन्य में प्रकाशित लेख का साभार)

           अब तो आप समझ ही गए होंगे कि वामपंथी विचारों ने कैसे गलत व्याख्या करके समाज को गुमराह करने का काम किया। इसे आप एक और उदाहरण से समझ सकते हैं जिसका मैंने अपने एक ब्लॉग में चित्रण किया था।

            बात उस समय की है जब जाने-माने पत्रकार अरुण शौरी ज़ी टीवी के एक कार्यक्रम 'आपकी अदालत,आपका फैसला' का जिक्र करते हैं,जिसका संचालन मनोज रघुवंशी द्वारा किया गया था। इस चर्चा में मशहूर इतिहासकार श्री के.एम. श्रीमाली और वे खुद मौजूद रहे थे। जब श्रीमाली से रघुवंशी ने पूछा कि आपके पास क्या प्रमाण है या कहाँ लिखा है कि प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था ?(श्रीमाली,डी.एन. झा के प्रबल समर्थक थे।)

       श्रीमाली जी ने गर्व से कहा - "इस बारे में सैकड़ों लिखित प्रमाण मौजूद है।"
       "किस वेद में,किस ग्रन्थ के किस श्लोक में यह लिखा है ?" - रघुवंशी ने पूछा।
       इसपर श्रीमाली जी बोले - "मैं पुस्तकें तो नहीं लाया हूँ लेकिन हर कहीं प्रमाण मिल जाता है।"
       "लेकिन आप एक श्लोक तो बता दीजिये।" - रघुवंशी ने दोबारा पूछा।

       श्रीमाली जी एक श्लोक भी नहीं बता पाए,ग्रन्थ तो दूर।

       इसी बीच दर्शक दीर्घा से एक व्यक्ति बोला कि ये हैं,चारों वेद,इसमें कहाँ लिखा है,आप पढ़ के दिखाइये।
श्रीमाली जी ने उसे पढने से इनकार कर दिया और वे ठिठक गए।

       जाहिर सी बात थी कि ऐसी कोई प्रमाण ही नहीं है कि प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था। यह सब इन वामपंथी इतिहासकारों का अटकलवाजी और षडयंत्र था/है - हिंदुओं के खिलाफ। लेकिन यह तो स्पष्ट था कि श्रीमाली अच्छा प्रभाव नहीं छोड़ पाए।

       लेकिन आप कुछ देर के लिए मान लीजिये कि 5000 वर्ष पूर्व गोमांस खाया जाता था। लेकिन इस तथ्य को कोई दबाना क्यों चाहेगा ? जब द्रोणाचार्य-एकलव्य की घटना को इतिहास में अंकित कर दिया गया,जो सामाजिक सरोकार के कदम से कतई मेल नहीं खाता है,जबकि यह तो मामूली बात थी।

        अगर प्राचीन भारत में गोमांस खाया भी जाता था तो भी उससे इस सच्चाई में कौन सी कमीं आ जाती है कि आज हिन्दू गाय के प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं।

       विश्व में कई आदिम जातियां नरभक्षी थीं। लेकिन आज वे नहीं है,मानव का खोपड़ी नहीं खाते हैं। अगर आज वे नहीं हैं तो सच्चाई में कमी आ गयी क्या ? क्या इन्हें खाने की अनुमति दी जानी चाहिए?

         महात्मा गांधी हिंद स्वराज में लिखते हैं,"गाय कई तरह से उपयोगी जानवर है। वह उपयोगी जानवर है इसे मुसलमान भाई भी कबूल करेंगे। लेकिन जैसे मैं गाय को पूजता हूं, वैसे मैं मनुष्य को भी पूजता हूं। जैसे गाय उपयोगी है वैसे ही मनुष्य भी फिर चाहे वह मुसलमान हो या हिंदू, उपयोगी है।

         तब क्या गाय को बचाने के लिए मैं मुसलमान से लड़ूंगा? क्या मैं उसे मारूंगा? ऐसा करने से मैं मुसलमान और गाय दोनों का दुश्मन हो जाऊंगा। इसलिए मैं कहूंगा कि गाय की रक्षा करने का एक ही उपाय है कि मुझे अपने मुसलमान भाई के सामने हाथ जोड़ने चाहिए और उसे देश की ख़ातिर गाय को बचाने के लिए समझाना चाहिए।

          अगर वह न समझे तो मुझे गाय को मरने देना चाहिए, क्योंकि वह मेरे बस की बात नहीं है। अगर मुझे गाय पर अत्यंत दया आती है तो अपनी जान दे देनी चाहिए, लेकिन मुसलमान की जान नहीं लेनी चाहिए। यही धार्मिक क़ानून है, ऐसा मैं तो मानता हूं।"

           पर आज मीडिया में गौहत्या के लिए नरवध किये जाने के विरोध में ऐसे ही उदाहरण पेश किये जा रहे हैं। वे वेदों की गलत व्याख्या को लेकर कुतर्क करेंगे। गांधीजी और विनोबा भावे के नाम की दुहाई देंगे लेकिन इस बात को छिपा जाएंगे कि किस प्रकार इन दोनों ने गोरक्षा को अपना जीवन ध्येय बनाया हुआ था। वे अपनी विद्वत्ता की शेखी बघारेंगे लेकिन आदि शंकराचार्य की गो के प्रति भावना को लेकर चुप रहेंगे। समाज के वंचित-पिछड़े तबके की बात करेंगे लेकिन महर्षि वेदव्यास (जिनकी माता धीवर कन्या थीं) को बिसरा देंगे जिन्होंने गाय-बैल को जरा सा कष्ट देने को भी महान पाप कहा है।

           गोहत्या जैसे गंभीर विषय पर पाखंड का आचरण कर रहे ऐसे सारे तथाकथित बुद्धिजीवियों को खुली चुनौती है कि वे गोसंरक्षण विषय पर दशम् गुरु गोविन्द सिंह जी, समर्थ गुरु रामदास, संत नामदेव, स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, विनोबा भावे, मदनमोहन मालवीय, महर्षि अरविंद, भाईश्री हनुमान प्रसाद पोद्दार, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, पुरुषोत्तमदास टंडन आदि को भी उद्घृत करके दिखाएं।

           पर ये नहीं करेंगे! गौरक्षक आज के सेनानी हैं! समस्या की जड़ इनके पास प्रशिक्षण की कमी है। जिसे मैंने अपने एक ब्लॉग में लिखा है,"या तो सरकार द्वारा या कुछ गैर-लाभकारी संस्थाओं द्वारा इन गौरवमयी गौ-रक्षकों के लिए प्रशिक्षण(ट्रेनिंग) का व्यवस्था किया जाए तो जो गलती इनके द्वारा कभी-कभार हो जा रही है उसे काफी हद तक रोका जा सकता है क्योंकि ट्रेनिंग के बाद ये पहचान करने की अपनी काबिलियत में परिपक्व हो जाएंगे कि कौन वास्तविक गाय माता को खाने वाला है,काटने वाला है और अवैध व्यापार कर रहा है? साथ ही कौन मरी हुई गाय का चमड़े उतारकर अपनी परंपरागत काम कर रहा है।

           इन गौ-रक्षकों के लिए एक वेबसाइट की व्यवस्था की जानी चाहिये और उसपर गौ-रक्षा से संबंधित तमाम जानकारी होना चाहिए और वो माध्यम भी बताया जाना चाहिए कि गाय के हत्यारों की पहचान का जरिया क्या हो सकता है? यह एक विकल्प हो सकता है।"

संदर्भ -
1. डीएन झा का लेख
2. ANCIENT INDIA : AN INTRODUCTORY OUTLINE',मनोहर,नई दिल्ली,1977 - डीएन झा।
3. पांचजन्य का लेख
4. हिंद स्वराज - महात्मा गांधी
5. 'ब्लॉग-प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था,अगर कुछ देर के लिए सही भी मान लिया जाए, तो क्या हो गया?'
6. Discourse -गौरक्षकों को प्रशिक्षण की जरूरत तभी वेवजह का विवाद थम पाएगा!
7. EMINENT HISTORIANS : THEIR TECHNOLOGY,THEIR LINE,THEIR FRAUD - ARUN SHOURIE (PAGE - 50.51,52)