Saturday, 1 April 2017

मेरी यादें - विचारों का दक्षिणपंथी होना!

चौथी तक पढ़ाई अस्त-व्यस्त रही। इसी दरमियान मैं 6 महीने के लिए अपने एक रिश्तेदार के पास शहर चला गया। जब मैं जा रहा था तो मुझे याद है - कैसे मेरे भाई जो उनको पहुंचाने के लिए गाँव से 3 किलोमीटर दूर एक छोटे से बाजार पर आये थे क्योंकि ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था मेरे गाँव तक नहीं थी,चेहरे का रंग उड़ गया था लेकिन मेरी उम्र काफी कम होने के कारण मैं इस 'मनुष्यिक स्नेह वाली भावना' को समझ नहीं पाया था। इस दौरान मेरी माँ का क्या दशा हुआ होगा - आप अंदाजा लगा सकते हैं! मुझे क्यों और कैसे जाना पड़ा और इसका मेरे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा - यह जानना सभी के लिए काफी रोचक है! वहाँ परिस्थितियां तो मेरे अनुकूल नहीं रही लेकिन उन रिश्तेदार(केवल पुरुष सदस्य जो मेरे बड़े पिताजी लगते हैं) के लिए उन 6 महीनों के लिए ही मेरे मन में आज भी काफी ज्यादा श्रद्धा है,जबकि उस घटना के वर्षों गुजर गए हैं!

मेरे अपने घर से ज्यादा धार्मिक माहौल उनके यहां था। हिंदू होने के बावजूद मेरी रुची पूजा-पाठों में उनदिनों तक ज्यादा नहीं थी लेकिन भगवान आदि के लिए एक मन में एक श्रद्धा का भाव था,यह इसलिए भी कि हमें बचपन से ही एक सुप्रीम शक्ति की अवधारणा को बताया जा रहा था कि उन्हीं के बदौलत संसार की सभी घटनाएं होती है। मेरी माँ अपढ़ है जिनको अध्यात्म और धर्म के अलावा विज्ञान की जानकारी न के बराबर है,पिताजी फ़ौज में थे इसकारण बचपन का दिन कभी भी उनके साथ नहीं बिता। यहीं वह वजह है कि धर्म की मार्मिक महत्व और सीख को मेरा मासूम मन बचपन में सीख लिया और प्रभावित हो गया। विज्ञान की बढ़ती समझ ने उस बनाये सिद्धांतों को झकझोरा और तर्क की कसौटी पर कसना शुरू किया,भले ही मैं धर्म के महत्व को समझा और आज धर्म को समाज का एक अहम हिस्सा मानता हूँ लेकिन बचपन के धर्म की समझ जिसका केंद्र भगवान और व्यक्ति को एक याची के रूप में वर्णित था को तोड़-मरोड़ कर फेंक दिया। आज मेरा विश्वास अब केवल इतना है कि भगवान की अवधारणा धर्म रुपी सामाजिक यथार्थ के लिए एक माध्यम है। (आगे कभी भगवान,अध्यात्म,धर्म,समाज और व्यकि पर विस्तृत चर्चा करूँगा)

घर का धार्मिक माहौल और चौथी कक्षा में संघ के स्कूल से शिक्षा प्राप्त करने का दौर ने मुझे प्राचीन भारत की वैदिक संस्कृति की महानता को दिलों-दिमाग में बिठा दिया। वर्तमान की बुराइयों को दूर करने का एक ही तरीका बचपन के दिनों में मेरे जेहन में आया कि केवल समाज के नैतिक उत्थानों के बदौलत ही जातिगत बुराइयों और सामाजिक कुरीतियों को दूर किया जा सकता है। जब बी.ए (राजनीतिक शास्त्र) से करने के दौरान मैंने मार्क्सवाद और उदारवाद को भी बारीकी से समझा लेकिन मैंने पाया कि ये समाज को भौतिक सुख तो दे सकते हैं लेकिन व्यक्ति की व्यक्तिगत और आतंरिक सुख की पूर्ति नहीं कर सकते। इसकारण मेरे दिमाग में केवल यहीं तथ्य आया कि भारत का भविष्य 'समाज का विकास दक्षिणपंथी सोच(अतीत के गौरव को हासिल करना) के बदौलत' और 'आर्थिक उन्नति' में ही उज्जवल है क्योंकि आज पूरी दूनिया खुल चुकी है और अन्य देशों के लोगों के सोच को जानना मीडिया के फैलाव से आसान हो गया,जिसे देखकर व्यक्ति के महत्वाकांक्षा को रोका जाना असंभव है,यहीं तो व्यक्ति का वह महान रहस्य है जिसे समझा जाना अभी बाकी है?

चौथी कक्षा में संघ के स्कूल में प्रवेश मेरे उस मानसिकता को हवा दी जो अब तक कहीं भटक रही थी। मतलब स्पष्ट है कि दक्षिणपंथी होना मेरे खून में था,मैं पैदाइसी महान भारतीय संस्कृति का उपासक था। भले ही हमारे विकास के परिप्रेक्ष्य अलग हो सकते हैं - कोई वामपंथी तरीके अपना सकता है और कोई गाँधीवादी लेकिन सामाजिक विकास केवल और केवल दक्षिणपंथी तरीके से होना चाहिए,अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारत ही बुनियाद हिल सकती है। भारत की पहचान आर्थिक तरक्की से नहीं बल्कि संस्कृति से है! जिसे जिंदा रखना हर भारतीय का परम कर्तव्य बन जाता है।

हेडगेवार की जीवनी,जो मात्र 35 रूपये की किताब थी,पहली बार मैंने पढ़ा तो मेरे दिमाग में एक ही बात आया कि उस व्यक्ति में कितना त्याग भरा है कि लोग उनके जीवन से प्रभावित होकर देश और समाज के नाम पर अपना जीवन तक खपा देते हैं। ये कितने महान लोग हैं! जिनको कोई नहीं जानता लेकिन संघ के कामों से 'अपना खाओ और देश के लिए काम करो' के नीति पर 10-20-30-40 सालों तक खपा दिए हैं।

'अपना खाओ और देश के लिए काम करो' यहीं वह नीति थी जिसने अंदर तक मुझे झकझोर दिया। कॉलेज के दिनों में अनायास ही मैं कई वामपंथी सोच वाले छात्रों और प्रोफेसरों से मिला और छात्र संगठनों में सिरकत की लेकिन मैंने वहाँ किसी के बारे में जानने की कोशिश नहीं किया बल्कि नीतियों को समझने का प्रयास किया। भाकपा माले के कार्यालय ने कम्युनिस्टों को मेरे सामने खोल दिया। मुझे याद है कि एकबार जब मैं उनके ऑफिस गया था तो शराब की गिलास सामने मेज पर रखा हुआ था,उसमें माले के एक वरिष्ठ नेता भी थे(नाम नहीं बता रहा हूँ।) जो मुझे देखकर शराब में बिस्कुट को डुबाने का नाटक करने लगे,मेरा ध्यान बार-बार उसी तरफ चला जा रहा था। यह मुझे कतई अच्छा नहीं लगा था। जाहिर है - एक भौतिकवादी सोच समाज की नैतिक उन्नति कैसे कर सकती है? बिना नैतिकता का समाज मरे हुए लोगों के जमघट के अलावा कुछ नहीं है!

'अपना खाओ और देश के लिए काम करो' की नीति इसकारण भी सर्वोत्तम हो जाती है कि पहले ये आपको सिखाती है कि व्यक्ति कैसे सशक्त होगा और दूसरे शब्दों में यह लोगों पर नैतिक जिम्मेवारी डालकर परिवार जैसी संस्था को मजबूत करता है जिससे समाज मजबूत होता और अंततः देश क्योंकि एक रोजगारपरक व्यक्ति ही सशक्त हो सकता है और अपने को सृष्टि में सरवाइव कर सकता है। जरा सोचिए वामपंथियों की तरह पूरे जीवन कंधे पर प्लास्टिक या कपड़े की झोला ढोकर आप समाज को क्या दे सकते हैं और संदेश क्या दे सकते हैं? आज वामपंथी राष्ट्रों का राष्ट्राध्यक्ष या वामपंथियों के कुछ लोकप्रिय नेता भी पश्चिमी तरीके के कोर्ट-टाई पहनना शुरू कर दिए हैं,यहीं तो विरोधाभास है! जो मुझे अंदर तक प्रभावित किया।

बचपन के दिनों में आसाराम के साहित्यों को पढ़ने के बाद समाज के प्रति मेरी जिम्मेवारी को उकेरा। उनकी एक किताब 'शंखनाद' ने तो मेरे में उत्साह ही भर दिया था जो खासकर छात्रों के लिए लिखी गयी थी। अपने इस सामाजिक उत्थान से संबंधित विचारों के समकक्ष मुझे संघ से बेहतर और उम्दा कोई भी संगठन नहीं मिला जो व्यक्ति के अंदर समाज सेवा के साथ नैतिक मूल्यों को भी पिरोता हो। भले ही आज आसाराम के साथ कई विवाद जुड़ गए हैं लेकिन बचपन के दिनों में इनके साहित्य शिक्षाप्रद तो थे ही।