Monday, 17 April 2017

जन चर्चा में आज ब्लॉगर की अदालत - क्या पत्थरबाज देशद्रोहियों को गोली मार देना चाहिए? -5/1

आये दिनों शांति के कामों में लगी सेना के ऊपर पत्थर से सुनियोजित तरीके से हमले किये जा रहे है। यह न केवल संविधान पर हमला है बल्कि देश की संप्रभुता पर भी हमला है। काश्मीर की ताजा स्थितियों के मध्यनजर मैं मांग करता हूँ कि अफ्स्पा जैसे क़ानून को विस्तारित कर सेना के अधिकार में और बढ़ोतरी किया जाए जिसमें पत्थरबाजों से सहानुभूति रखने वाले लोगों को भी गिरफ्तार किया जा सके और पत्थर फेंकने वालों को सरेआम गोली से उड़ा दिया जाए। आज हम मानवाधिकार की बातें कर रहे हैं और कल कहीं हमारे ही मानवाधिकारों पर हमला इन पाकिस्तानपरस्त देशद्रोहियों द्वारा न हो जाए!

यह बहुत ही बेबुनियाद तर्क है कि विरोध करने वालों का कत्लेआम कर दिया जाए। क्या हम इसे वार्ता से नहीं सुलझा सकते हैं?

मैं आपके सुझाव को मानता हूँ लेकिन क्या आपको लगता है कि जिस क्षेत्र की मानसिकता किसी दूसरे देश के साथ सहानुभूति रखने को लेकर हो गयी है। अलगाववाद मुख्य पहचान बन गया हो वे भारतीय संप्रभुता और एकता को ध्यान में रखकर बात करेंगे?

ये भी तो सही नहीं है कि जिनलोगों का आत्मा पाकिस्तान में हो और शरीर भारत में,उनपर जबरजस्ती कब्जा करके रखा जाए?

ये आप कैसे कह सकते हैं? मैंने किस मुद्दे को सामने लाने का कोशिश किया और आप उन अलगाववादियों के पक्ष में ही अपनी बात को पेश करने लगे। किस प्रकार के वकील हैं आप जो भारत का नमक खाते हैं और देशद्रोही मानसिकता का वकालत करते हैं?

किसने तय कर दिया कि वे देशद्रोही हैं? आपको किसने अधिकार दिया? मेरा मानना है अन्य देशों की भांति काश्मीर में भी जनमत संग्रह कराना चाहिए।

..... कोई भी गाली दे ................. क्या लाजवाब तर्क दिया आपने?

मीलॉर्ड! ये मुझे गाली दे रहे हैं।

आपने कैसे तय कर लिया कि मैंने गाली दिया है? ये अधिकार आपको किसने दिया?

ये तो सामान्य बात है और आसानी से तय किया जा सकता है....

तो देश की सेना पर पत्थर फेंकने वाले और देश के खिलाफ बोलने और नारेबाजी करने वालों को समाज आसानी से नहीं समझ सकता कि ये देशद्रोह वाली हरकत है और देश के खिलाफ युद्ध है? ये तो हर व्यक्ति की नैतिक कर्तव्य है जिसे जन्म लेने के साथ ही प्राप्त हो जाता है।

जब सब कुछ समाज और आप जैसे वकील ही तय कर लेंगे तो 'ब्लॉगर की अदालत' का क्या काम है?

आपको इतना भी नहीं मालूम कि अदालतें सामाजिक मान्यताएं और समाज के विचारों को कई परिप्रेक्ष्य से तौलकर उसको वैधता प्रदान करती है? समाज में देश-विरोधी हरकत करने वालों का हम तो विरोध करेंगे ही और इनको बचाने का वकालत भी करेंगे। अगर आपको गलत लगता है तो आप अदालत जा सकते हैं,देखते हैं किसके वैधता पर मुहर लगता है?

आप विषय से भटक रहे हैं। हम बहस अन्य मुद्दों पर कर रहे हैं। जनमत संग्रह कराने में सरकार को क्या दिक्कत है?

नहीं! हम बहस कर रहे हैं कि उनलोगों को सरेआम क्यों न मारा जाए? आप अगर इसपर तर्क पेश करेंगे तो अदालत को फैसला सुनाने में ज्यादा सहलूयित होगी।

वास्तव में ये पत्थरबाज भटके हुए नौजवान है...

खामोश! भटके हुए नौजवान हैं और दिल्ली के एक विश्वविद्यालय में देश-विरोधी नारे लगाने वालों को असहमति का हक़ है और साथ ही अभी कुछ देर में कहेंगे कि माओवाद एक विचारधारा है। कितना गिरेंगे? देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की वकालत करने वालों को भटके हुए,असहमति का हक और विरोध करने वालों देशभक्तों को गुंडा और फासीवादी कहते हैं। जनमत संग्रह तो कभी होने वाला है ही नहीं। कोई भी देशभक्त इसे स्वीकार नहीं करेगा इसलिए हम बहुसंख्यक जनता के भावना सा सम्मान करेंगे। आपके पास इसके अलावा कोई रोडमैप है क्या?

आप फिर से भटक रहे हैं।

अच्छा मैं भटक रहा हूँ तो सही रास्ते पर रहते हुए आपके पास काश्मीर में शांति स्थापित करने का कोई रोडमैप है क्या?

अदालत का माहौल एकदम से चुप हो जाता है!

मैं जानता हूँ - आपलोग शांति चाहते हैं ही नहीं। बिना मतलब का हल्ला मचाते रहते हैं।
मीलॉर्ड! सरकार द्वारा जीडीपी का इतना बड़ा हिस्सा खर्च करने के बाद भी और रोजगार के कई मौके उपलब्ध कराने के बावजूद ये अपनी देशद्रोह वाली हरकत को छोड़ने को तैयार नहीं है। नित्यदिन देश तोड़ने के मुहीम में शामिल होते हैं,सक्रिय होते हैं। वार्त्ता से शांति स्थापित करने के कई प्रयास किये गए लेकिन सब असफल सिद्ध हुआ तो क्यों न एक बार कड़क तरीके से समाधान निकालने का प्रयास किया जाए? क्यों न पहले दुश्मनों को मटियामेट किया जाए और इजराइल की तरह क़ानून की किताब बाद में खोला जाए?
मीलॉर्ड! शायद आपको सुनकर ताज्जूब हो सकता है कि वर्षों से लगभग चलता आ रहा है कि सुरक्षा बलों से चरमपंथियों की मुठभेड़ के दौरान सैकड़ों की तादाद में निहत्थे कश्मीरी ख़ुद ढाल की तरह सामने खड़े हो जाते हैं और उन्हें न अपनी जान की परवाह होती है और न अपने परिवार वालों के मारे जाने का ग़म। पकड़े गए चरमपंथियों को छुड़ाने के लिए कश्मीरी औरतें भारी हथियारों से लैस सुरक्षा बलों पर टूट पड़ती हैं। कश्मीर की सड़कों पर से गुज़र रहे सुरक्षा बल के जवानों को गाली-थप्पड़ खाने के बावजूद सिर झुकाकर चलना पड़ता है।

ऐसी स्थति में हम बातचीत कैसे कर सकते हैं? इसलिए मैं मांग करता हूँ कि अदालत द्वारा देशद्रोही काश्मीरियों को गोली मारने की घटना को वैधता प्रदान किया जाए और सेना को आदेश दिया जाए कि उनको खुली छूट है कि देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।

ब्लॉगर की अदालत का फैसला - दोनों पक्ष के तर्कों को सुनने के बाद अदालत इस स्थिति पर पहुंची है कि काश्मीर की स्थिति बद से बदतर हो गयी है। वहाँ की परिदृश्य का सही अवलोकन करने के लिए सरकार को एक निष्पक्ष कमिटी का गठन करना चाहिए और जब तक यह काम हो नहीं जाता तब तक सेना वहाँ शांति स्थापित करने के लिए और देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकती है जो जांच से परे होगा और जरुरत पड़ने पर सैन्य अदालत द्वारा जांच किया जाएगा।

Court is adjourned!