Thursday, 27 April 2017

जन चर्चा में आज केजरीवाल के लिए लल्लन मियाँ का सुझाव! - 8/2

"लल्लन मिया! केजरीवाल का चुनावी राजनीति में पतन हो रहा है ठीक उसी तरह जिस तरह किसी ने एक ब्लॉग में आप द्वारा कुछ नेताओं को पार्टी से निकाले जाने के बाद लिखा था,"यह लगने लगा है कि केजरिवाल में राब्स्पियर जैसा चरित्र पनपने लगा है,जिसने फ्रांस की क्रांति (1789) के ओट में इतना कहर बरपाया था जिसमें उसमें सबसे पहले अपने साथियों को निशाना बनाया,फिर खुद बर्बाद हुआ और मारा गया। महान सपनों की क्रांति पहले आतंक और फ़िर तानाशाही में बदली।""

"हमरा नाम है लल्लन मिया! जब मैं कहता हूँ तो लोग कहते हैं ऐसा कह रहा है। आपसभी जानते ही होंगे इसी ब्लॉग में उस समय एक सवाल उठाया गया था कि आम आदमी पार्टी का प्रयोग तो राजनीतिक विचारधाराओं को तिलांजलि देकर पनपा है जहां राइट-लेफ्ट सोच है ही नहीं। तो फिर केजरिवाल अपना घर शुध्द रुप से ठीक करने के लिये क्यों सोच रहे है? केजरिवाल की सोच कैसे पूर्व की सत्ता से अलग होती है इसका इंतजार और फ़ैसला तो वाकई अब 2020 में ही होना है। लेकिन इसकी आहट तो हमसभी अभी तक के घटनाक्रमों में ही देख लिए कि लोकसभा,पंजाब,गोआ और दिल्ली MCD में क्या हश्र हुआ?"

"लल्लन मिया! आखिर क्या हो जाता है कि नैतिकता की बात करने वाले और आंदोलन से निकले तथा सामाजिक कार्यकर्त्ता से राजनेता बने राजनीतिक जीवन में असफल हो जाते हैं,परंतु केजरीवाल सरीखे कुछ लोग इत्तेफाक से सफल भी हो जाते हैं तो उसे बनाये नहीं रख पाते?"

"एक वास्तविक राजनेता वास्तव में राजनीतिक रूप से परिपक्व हो जाता है और शब्दों पर संयम रखता है। केजरीवाल सरीखों,इरोम शर्मिला और अन्य सामाजिक कार्यकर्त्ता को तत्काल नहीं तो कुछ अंतराल पर अधोगति होने का एक ही कारण है - ऐसा नहीं है कि एक सामाजिक कार्यकर्त्ता अन्य क्षेत्रों मसलन डॉक्टर,सिविल सेवा,शिक्षक,राजनेता आदि में कैरियर नहीं बना सकते लेकिन उनके द्वारा सामाजिक कार्यकर्त्ता बनने का निर्णय काफी सोच-समझकर लिया गया उसका व्यक्तिगत निर्णय होता है। समाज में सेवा की एक अलग छवि स्थापित हो जाती है और जब वो राजनीतिक रूप से सक्रियता दिखाने लगता है तो लोग पचा नहीं पाते कि इसके सामाजिक सेवा में एक महत्वाकांक्षा भी छिपा हुआ था जिसकी पूर्ती के लिए वह हमें बरगलाता रहा। पर यह तर्क केजरीवाल पर सही नहीं बैठा था और एक बार ऐतिहासिक जीत नसीब हुई थी लेकिन इनके द्वारा चलाया गया राजनीतिक मुहीम(आरोप-प्रत्यारोप) सही पैमाना स्थापित नहीं कर पाया और साथ ही अन्य राज्यों के लिए राजनीतिक महत्वाकांक्षा किसी से छुपा भी नहीं रहा।"

"कई मौकों पर केजरीवाल पर स्याही फेंका गया। एक ब्लॉग इस घटना को इनका करनी का फल बताता है। जब राजनीति का मतलब व्यक्तिगत हित साधना हो जाए तो राजनीतिक पार्टी अपने आंतरिक संस्थाओं को नेस्तानबुद कर देती है। आप में यहीं सब देखने को मिला।
यह जगजाहिर है कि 'आम आदमी पार्टी' के जन्म का आधार अन्ना आंदोलन में खोजा जा सकता है,जब देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कई आवाजें एक साथ बुलंद हुयी थी। 'आप' एक ऐसी पार्टी बनकर उभरी जिसमें बुद्धिजीवियों का एक जमावड़ा था चाहे वे योगेन्द्र यादव हों या प्रोफ़ेसर आनंद कुमार। लेकिन समय ने ऐसी पलटी मारी कि इस पार्टी से लगभग बुद्धिजीवियों का नाता तो टूट ही गया और जो लोग राजनीति को साफ़-सुथरा करने और नैतिकता की कसौटी पर कसने आये थे,साथ ही अपने लिए आप को एक बेहतरीन मंच मानते थे अपने को अलग कर लिया तो इस हार के बाद लल्लन मिया शायद अब इनको कुछ सद्बुद्धि आये!"

"हमरा नाम है लल्लन मिया! जब मैं कहता हूँ तो लोग कहते हैं ऐसा कह रहा है। यहीं तो मेरा सुझाव है - सही ही कहा गया है जब व्यक्ति की हैसियत बदलती है तो उसके कार्य करने के ढंग भी बदल जाना चाहिए नहीं तो हर स्तर पर किरकिरी होने लगती है। जब आप राजनीतिक सुधार के लिए आंदोलन कर रहे होते हैं तो आरोप लगाना एक सही विकल्प रहता है लेकिन जब आपकी हैसियत बदली और सत्ता मिली तो आपको अपने तरीके बदल लेने चाहिए थे। कोई बात नहीं अभी भी देर नहीं हुई है सत्ता के जरिये किस प्रकार सामाजिक सरोकार और विकास के काम किये जा सकते हैं,कई उदाहरण आपके सामने है उसी को विकल्प बनाइये ज्यादा फायदेमंद रहेगा।
        दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी या संगठन अपने सक्रिय कार्यकर्ताओं की तुलना में बैकग्राउंड में स्थित विचारधारात्मक समर्थन से ज्यादा धारदार और मजबूत होती है। आपने तो इस रीढ़ को ही तोड़ डाला जब विचारों के स्तर पर मुहीम चलाने वालों को बेइज्जती कर निकाल दिए तो पार्टी बिना उसूल के कैसे रह सकती है वो भी तब जब मुखौटा हटाकर असली चेहरा जनता के सामने परोस दिया गया। यह सब काम सत्ता की भीनी-भीनी खुशबु और वोटों के लिए तुष्टिकरण की नीति ने किया।"