Monday, 17 April 2017

मेरी यादें - प्यार के दिन -2

लगभग बहुतों की चाहत स्कूल के दिनों में कक्षा की खुबसूरत लड़की ही हुआ करती है। मैं भी इससे अछूता नहीं रहा। पर मुझमें और अन्यों में एक ख़ास अंतर यह हो जाता है कि मैं कभी किसी के लिए भी सक्रिय रूप से प्रयास नहीं किया। न जाने क्यों? लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि मन में बहुत से विचार चलते रहते थे। दिल की गवाही कभी भी मेरे दिमाग पर हावी नहीं हो पायी,यहीं वह कारण रहा कि लड़कियाँ जब हिम्मत करके अपने प्यार का प्रस्ताव मुझतक पहुंचाया करती थी तो मैं उसे स्वीकार नहीं कर पाता था,क्योंकि दिमाग कभी भी स्वीकरोक्ति नहीं देता था। ऐसे मौकों पर मेरे दिमाग में एक ही ख्याल आते थे - इससे मैं क्या हासिल कर लूँगा?

बात दूसरी-तीसरी कक्षा की रही होगी। उससमय मैं जमशेदपुर में था। एक सांवली-सलोनी सी लड़की,जिसके बाल ज्यादा लंबे तो नहीं लेकिन बीच में झाड़कर संवारे होते थे। जब मैं पहली बार देखा था तो पहली नजर में ही आकर्षित हो गया था। मुझे याद आता है कि हँसते हुए वे कभी-कभी मेरे गालों को छू लिया करती थी। मेरे पूछने पर कि तुम ऐसा क्यों करती हो? उसका हमेशा एक ही जवाब रहता था - बहुत क्यूट लगते हो! मैं हमेशा ही शर्माकर मासूम सा चेहरा बना लेता था। स्वभाव तो बचपन से ही शर्मिला रहा है,शायद एक वजह यह भी रहता हो कि हिम्मत करके भी मैं लड़कियों से लंबे समय तक आँख नहीं मिला पाता था। कई मौकों पर मेरे अन्य दोस्तों से जो साथ में रहते थे सुनने को मिल जाता था कि लंबे समय से वो आपको देख रही है।

इसतरह के कारगुजारियाँ तो चलते रहते थे तबतक मैं जमशेदपुर से वापस आ गया और दोबारा नहीं जा पाया।

मुझे याद आता है,जब मैं बचपन के दिनों में पढ़ाई शुरू भी नहीं किया था और पिताजी के साथ कुछ दिनों के लिए पंजाब गया हुआ था। वहाँ भी ऐसा ही कुछ हुआ था और एक साधारण सी दिखने वाली लड़की अच्छी लगने लगी थी। उससे संबंधित मुझे एक घटना याद आती है कि एक दिन जोरो की बारिस हो रही थी। मैं मन ही मन सोच रहा था कि आज बारिस में नहाते हुए घर जाऊँगा। लेकिन जैसे ही मैं स्कूल के बाहर गेट पर आया,उस छोटी सी लड़की को खड़ा देखकर वहीं पर ठिठक गया,मेरी उम्र तीन या चार साल रही होगी। तभी मेरे बगल में रहने वाले एक व्यक्ति जो पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे और हमसभी बंगाली कहकर पुकारते थे,छाता लेकर आ गए क्योंकि उसी स्कूल में उनका छोटा भाई भी पढ़ता था। बीच में हाथ से हमदोनों को छाता पकड़ाकर दोनों हाथों से ऊपर उठा लिए थे। वो लड़की जो उनको भैया कहते हुए आयी थी और बोली थी - ''भैया मुझे भी ले चलिए ना।" लेकिन उनका जवाब था - 'नहीं!' हमसभी भीग जाएंगे। वो मन मसोसकर और अजीब सा मुँह बनाकर बारिस में भीगती हुई चली गयी थी। जो मुझे बिल्कुल ही अच्छा नहीं लगा था। पर मैं उससमय कुछ कर नहीं सकता था।

भले ही आज उनमें से किसी का नाम और चेहरा भी ठीक से याद नहीं है लेकिन स्मृति के एक कोने में वो कारगुजारियाँ जरूर है।

आगे के दिनों में मैं चाहकर भी इसतरह का कोई भी प्यार संबंधी हरकत और लड़कियों से बात आदि नहीं कर पाया। जब भी मौका आता तो मेरे दिमाग में एक ही सवाल आते रहते हैं - "हम ब्राह्मण हैं,नैतिकता हमारा आदर्श है और हम अपने परिवार के साथ धोखा नहीं कर सकते।"

क्योंकि बचपन से ही इसे गलत रूप में हमारे सामने परोसा जाता रहा है।