Saturday, 1 April 2017

मेरी यादें - प्यार के दिन! -1

"हैलो सुरेश जी!"

फोन की घंटी सुनकर अचानक ही रात के करीब दो बजे मेरी नींद खुल जाती है और अर्द्धनिंद्रा की स्थिति में मेरे हैलो बोलने के साथ ही यहीं तीन शब्द सुनाई देते हैं। शुरुआत में तो मैं समझ नहीं पाता कि इतनी रात को कौन लड़की मुझे याद कर रही है। तभी मेरे दिमाग में एक संचार का प्रवाह होता है - अरे,यह तो वो है!

"हाँ!"

"मैं पिछले दो दिन से ट्राइ कर रही हूँ। कहाँ थे? बात किये हुए महीनों हो गए। नींद नहीं आ रही है।"

"सोने की कोशिश करो,बाद में बात करता हूँ। कल तुमको बैंक भी जाना होगा!"

"नहीं कल अंतिम शनिवार है और बैंक बंद रहता है,इतना भी मालूम नहीं आपको?"

"ठीक है तुम सो जाओ,मुझे भी सोना है,कल बहुत सारे काम हैं।"

"आप मुझे बहुत दिनों से इग्नोर क्यों कर रहे हैं? खासकर तब से जब मैंने आपको अपनी जाति के बारे में बताया।"

"नहीं! ऐसी बात नहीं है।"

"एक बात आपको ध्यान रखना चाहिए कि बैंक में काम करने वाली लड़की को कोई भी लड़का इस तरह इग्नोर नहीं करता वो भी तब जब लड़की सामने से पहल कर रही हो।"

"तो मैं क्या करूँ?"

"आपको ये भी बता दूँ कि बैंक में कई मेरे बालों और चेहरे से आकर्षित है और आगे-पीछे घुमते रहते हैं,मैं अपनी बड़ाई नहीं कर रही हूँ लेकिन बता रही हूँ कि लड़कों का हालत कैसा हो गया है?"

"मुझे कोई बहस नहीं करना है।"

"मुझे भी! इसलिए मैं जो बोल रही हूँ उसे सुनिए।"

"ठीक है,बोलो!"

"बैंक द्वारा मुझे लैपटॉप मिला हुआ है लेकिन कोई काम नहीं है,अगर कभी काम पड़ा तो मैं खरीद लूंगी। दो रूम के कमरे में अकेले रहने से मन ऊब जाता है,आप दूसरे शहर में है फोन लगाती हूँ तो लगता ही नहीं है। शायद आपको इस लैपटॉप का जरुरत पड़े, मैं आपको पार्शल कर दूँगी।"

इतना निःस्वार्थ त्याग मैंने कभी नहीं देखा था। उसदिन से लगभग साल भर पहले मैंने केवल चर्चा की थी कि इंटरनेट का इस्तेमाल बहुत ज्यादा हो गया है और स्मार्ट फोन से होता नहीं है।

आखिर क्या कारण था कि एक दलित लड़की जिसे मैं छोड़ चुका था,वो उस जलील भरी घटना के बाद भी बिना कहे मदद करने को तैयार रहती थी। न जाने कैसे उसको भनक लग ही जाती थी और जब मैं कभी अपार परेशानी में होता तो कॉल आ ही जाते थे/हैं।

मुझे याद आते हैं कैसे जब मैं उसके बारे में उसके जाति से अंजान था तो उसकी अच्छी न लगने वाली सब्जी से भी प्रेम की खुशबू आती थी लेकिन जैसे ही मुझे वास्तविकता मालूम चली उसकी अच्छी सब्जी को भी खाने का हिम्मत नहीं हो पा रहा था। जब मैं इसे आज सोचता हूँ तो मेरे लिए वो मामूली सी घटना केवल इसलिए तिल का ताड़ बन गयी क्योंकि काफी दिनों तक वो इस सामाजिक सच्चाई को छुपाई रही। और बाद में तो मेरे लिए यह गरिमा का सवाल बन गया कि गुस्से में जिन शब्दों का इस्तेमाल मैं उसके सामने कर दिया था,अब वापस जाना मुश्किल था। यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि झूठ के आधार पर रिश्ते को ज्यादा टिकाऊ नहीं बनाया रखा जा सकता। खासकर यह मेरे लिए वापस जाना डिग्निटी का मुद्दा हो गया।

मुझे याद आता है कि इसके लिए जिम्मेवार कम से कम दो वजहें होगी - मेरा बेबाकीपन जैसे कि किसी दिन पिट जाओगी,इसलिए जो मैं कह रहा हूँ उसे मानो और दूसरा मौका होते हुए भी किसी भी आपत्तिजनक काम को उसके साथ नहीं करना,मुझे यह भी याद आता है कि वह कैसे बैठे-बैठे बेसुध सी हो जाती थी।

(ज्यादा लिखना उसके निजी मामले के साथ खिलवाड़ होगा! ऐसे भी इसका वास्तविकता/व्यावहारिकता से कोई संबंध नहीं,इसके रचनात्मकता पर गौर फरमाइये।)