Sunday, 30 April 2017

जन चर्चा में आज बेबाक नजरिया - दलित छात्रों का टॉपर होना!

          हालांकि छात्रों को खेमों में बांटने का एक खतरनाक षडयंत्र कुछ दलित चिंतकों और कई वामपंथी लोगों द्वारा किया जा रहा है खासकर तब जब दलित छात्र मेहनत से प्रतिष्ठित परीक्षाओं में अव्वल आ रहे हैं। हाल में ही आये एक खबर के मुताबिक राजस्थान के 17 साल के एक दलित छात्र ने आईआईटी जेईई के मेन्स में पहला स्थान पाया है।

          दलित चिंतक कांचा इलैया ने इसे देश की अहम परीक्षाओं में हाशिए के समुदाय के छात्रों के टॉप आने पर कहा कि आने वाले वक़्त में ओबीसी और दलित समुदाय के छात्र ब्राह्मणों और बनियों के बच्चों पर भारी पड़ने वाले हैं। इन्होंने आगे कहा,"दलित और ओबीसी छात्रों में समझ का स्तर सवर्णों से कहीं ज़्यादा है। उनका दृष्टिकोण ज़्यादा गहरा होता है। इन्हें मौका मिला तो वे सवर्णों की बराबरी नहीं बल्कि उन्हें पीछे छोड़ देंगे। वह वक़्त दूर नहीं जब किसी दलित को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।"

          ऐसे बयान क्या हैं? इसका मूल मकसद वामपंथियों की सोच की तरह खेमों में बांटकर आपस में समाज को लड़ाना है। आखिर आपने कभी सोचा है कि दलितों का रुझान वामपंथी षडयंत्र के साथ कदमताल मिलाकर क्यों चल रहा है? कभी सोचा है आपने कि एक पाकिस्तानी ने इस्लाम,वामपंथी और दलित एकता की बात किया था,उसी को सही साबित तो नहीं किया जा रहा है?

           अभी कुछ साल पहले आईएएस परीक्षा में भी एक लड़की टॉपरों में से एक थी और वे भी दलित समुदाय से ही हैं। और भूषण अहीर नामक व्यक्ति भी महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग की परीक्षा में टॉप आए थे जो भी दलित समुदाय से ही हैं।

            लेकिन आखिर क्या कारण है कि इनमें से एक अपने समाज को छोड़कर गैर-धर्म से निकाह करने वाली है। यह क्या है? यहीं तो 'लव जिहाद' है! जो दलित विचारक उस दिन चीख-चीखकर हल्ला मचा रहे थे कि एक दलित लड़की ने पहली बार सिविल सेवा परीक्षा टॉप की और गर्व महसूस कर रहे थे लेकिन ताज्जूब तब हो गयी जब यहीं दलित समाज इन्हें एक अच्छा लड़का नहीं दे पाया! शायद समाज को उम्मीद है कि बाकी टॉपर को इस समस्या से नहीं जूझना पड़ेगा और दलित समाज उस घटना से कुछ सीख हासिल कर पाएगा!

             छात्र केवल छात्र होते हैं जिन्हें जातियों में बांटना तो घठिया सोच का परिचायक है। इनलोगों को समझना चाहिए कि ऐसी बातें आपको ही समाज से हासिये पर कर सकता है लेकिन अब वक्त आ गया है और समय की भी मांग है कि ऐसे दलित छात्र जिनकी आर्थिक हैसियत काफी सुदृढ़ हो उनके आरक्षण का विरोध इन दलितों द्वारा ही किया जाना चाहिए ताकि इसका फायदा उनके ही गरीब बच्चों को मिल सके और अंत में आरक्षण विरोधी मुहीम में शामिल होकर समरस समाज के निर्माण में योगदान देकर जीवन को सार्थक बना सकें।

Friday, 28 April 2017

Political commentary - दिल्ली MCD चुनाव में भाजपा की जीत : जुदा नजरिये!

मैं इस बात पर चर्चा बिल्कुल नहीं करूँगा कि किसको कितना सीट और कितना वोट मिले। एक पार्टी की जीत और दूसरे की हार तो लोकतंत्र के चुनावी खेल में चलते रहते हैं। सियासी पंडित अपना विश्लेषण पेश करते रहते हैं। यह सब तो ठीक है लेकिन इस चुनाव में भाजपा की जीत ने कुछ लोगों में गजब की बेचैनी पैदा कर दिया है। अपूर्वानंद अपने एक लेख में लिखते हैं,"अब हम पटना या जयपुर या जबलपुर जैसे शहर में नहीं रहते, हमेशा भारत नामक राष्ट्र में रहते हैं। बुधवार को दिल्ली के म्यूनिसिपैलिटी के चुनाव नतीजों से यह बात साफ़ हो गई है। यह कि भारत में कम से कम आज के दिन कुछ भी स्थानीय नहीं रहा, हर कुछ राष्ट्रीय हो चुका है।"

मैं हमेशा से अवगत कराते रहा हूँ कि भारत में एक ख़ास विचारधारा के लिए आदर्श का मतलब तभी तक है जब तक उनकी हित पूर्ति होते रहे। दादरी में एक मुसलमान का वध और दिल्ली में कुछ लफंगों द्वारा चर्च पर पत्थर फेंका जाना आदि वास्तव में कोई विचारधारात्मक मामला था ही नहीं बल्कि कानूनी मामला था,इस तरह के स्थानीय मामलों से कानून के बदौलत आसानी से निपटा जा सकता था लेकिन बीते घटनाक्रम गवाह है कि किस तरह इसे सियासी रंग देकर उस मुसलमान पर पैसों की बरसात कर दी गयी और छद्म सेकुलरिज्म का नमूना पेश कर घटना को राष्ट्रीय बना दिया गया। उस समय पुरस्कार वापसी गैंग काफी सक्रिय हो गया था। उनके निजी हित आकांक्षा का अंदाजा सस्ती लोकप्रियता पाने की घटिया चाहत से ही लगाया जा सकता है कि जिन मामलों का असहिष्णुता से कोई मतलब ही नहीं था उसे इतना हवा दिया गया कि उस दौरान हुए मसलन दो चुनावों में एक पार्टी को भारी खामियाजा भुगतना पड़ा। हम मान लेते उसमें सच्चाई था जब बिहार चुनाव के बाद वह क्रम जारी रहता लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

आज जब ऐसे लोगों की राजनीतिक हित पूर्ति करने वाले किसी दल की चुनावी जंग में हार नसीब हो रही है तो उन्हें हर चीज में राष्ट्रीयता ही दिखाई दे रही है। यहीं इनकी सोच की विकृति है जो इनके बौखलाहट को स्पष्ट करती है।

यहीं आगे लिखते हैं," इसलिए दिल्ली के 10 साल के नकारेपन के कचरे और गंदगी के बीच अगर कमल खिला है तो यह एक धोखाधड़ी से भरे राष्ट्रवादी प्रचार की जीत है और यह बात सबसे पहले कही जानी चाहिए। राष्ट्रवाद आक्रामक विजयपथ पर है, लेकिन इस रास्ते इस राष्ट्र की पराजय निश्चित है, यह चेतावनी देने में क्यों हमारा गला रुँध रहा है?"

इसतरह के घड़ियाली आँसू बहाने वाले सुविधा के विश्लेषक होते हैं। वास्तव में वामपंथी भारत को कोई राष्ट्र नहीं बल्कि किताब 'कहानी कम्युनिस्टों की' के अनुसार 'राष्ट्रों का राष्ट्र' मानते हैं और जब वे यह कहते हैं कि इस रास्ते भारत राष्ट्र की पराजय निश्चित है तो किसी को भी हंसी आना लाजमी ही हो जाता है। जिन लोगों को 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' के नारे 'असहमति का हक' नजर आता है वे भारत राष्ट्र की बात न ही करें तो बेहतर होगा!

इनदिनों ऐसे ही कई आलेख छपे हैं जिसमें कहा गया है कि यह भाजपा की जीत वास्तव में फर्जी राष्ट्रवाद की जीत है। पर ये भी सच्चाई है कि आज केजरीवाल की 'नई राजनीति' हारी हुई दिखाई पड़ रही है। साल 2015 में उसे सिर पर बिठाने वाली दिल्ली ने इस बार उसे धूल चटा दी है। जैसी ऐतिहासिक वो जीत थी वैसी ही ऐतिहासिक ये हार भी है। दरअसल 'आप' से वोटर का मोहभंग हुआ है क्योंकि पार्टी जिस स्वच्छ छवि और 'नैतिक आभा मंडल' के साथ दिल्ली में जीतकर आई थी, वही उसपर भारी पड़ा। नैतिकता और शुचिता की जो अपेक्षाएं वोटर ने उससे रखीं, वो पूरी नहीं हो पाईं। उसका दिल्ली से बाहर निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में तेजी से हस्तक्षेप करना भी बचकाना साबित हुआ। वोटर उसे अलग रंगो-रूप की पार्टी मानकर चल रहा था। उसका मोहभंग हुआ है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा की जीत का मूल वजहों में से एक है उत्तर प्रदेश में हाल में मिली जीत जिसने कार्यकर्ताओं के उत्साह को बढ़ाया। बीजेपी ने शहर की साज-सफाई, कूड़े के ढेर और नगर निगम के दफ्तरों में भ्रष्टाचार पर से ध्यान हटाकर वोटर को राजनीति के ज़्यादा बड़े सवालों से जोड़ा। इसमें मोदी के नाम ने काम किया। वस्तुतः यह चुनाव नगरपालिका के चुनाव जैसा लगा ही नहीं। जैसा कि अपूर्वानंद जिस नकारात्मक तरीके से राष्ट्रीयता को व्यक्त किये हैं वो तो है ही नहीं भले ही यह चुनाव अपने केंद्र में राष्ट्रीय चरित्र को धारण किया हुआ था! रहे भी क्यों नहीं? दिल्ली की गलियां जो राष्ट्र को संदेश देती है और पूरे भारत समेत दुनिया की नजर दिल्ली की राजनीति पर बारीकी से रहती है। ऐसे भी मुकाबला त्रिकोणीय होना बीजेपी के हक में गया। बीजेपी के विरोधी वोट कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच बँटे। इस तिकोने संग्राम में बीएसपी और जेडीयू जैसी पार्टियाँ लगभग गायब हो गईं।

वहीं वृंदा करात जो माकपा पोलित के ब्यूरो सदस्य हैं लिखती हैं,"पहले कई राज्यों के स्थानीय और नगर निगम के चुनाव, फिर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में पूर्ण बहुमत की जीत और अब दिल्ली नगर निगम चुनाव में बीजेपी को मिली भारी जीत ने भारत के सामने आज़ादी के बाद के शुरुआती दशकों वाले एक पार्टी शासन जैसी हालत पैदा कर दी है।"

ये रजनी कोठारी के उस शोध को दोहराती नजर आ रही है जो आजादी के शुरुआती वर्षों में एक पार्टी शासन व्यवस्था को लोकतंत्र में स्थापित कर दिया था। जब कोई वामपंथी कुछ कहे या लिखे तो वे संघ का नाम लिए बगैर कैसे रह सकते हैं,"फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि आज़ादी के बाद के शुरुआती दशकों में कांग्रेस ने अपने सभी राजनीतिक विरोधियों को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया था, लेकिन आज बीजेपी सत्ता में ज़रुर है लेकिन वो शासन करने वाली अकेली पार्टी नहीं है। उसके साथ आरएसएस भी है, जिसके प्रचारक प्रधानमंत्री हैं जिन राज्यों में बीजेपी जीती है वहां मुख्यमंत्री भी आरएसएस के मनोनीत लोग हैं। ये आरएसएस और बीजेपी की जोड़ी है, जो मिलकर इस देश का भाग्य तय कर रहे है।"

जो भी हो! भारत के भविष्य को जिस रूप में भी पेश किया जाए लेकिन यह तय है कि भारत पहले की तुलना में और मजबूत ही होगा और अतीत के गौरव को स्थापित किया जा सकेगा। हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारत तभी तक है जब तक भारतीय वैदिक संस्कृति जिंदा है।

भले ही कई लोग इस दौर को भाजपा का स्वर्णिम काल बता रहे हों लेकिन वर्तमान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के अनुसार,"भाजपा का स्वर्णिम काल आना अभी बाकी है।"

संदर्भ -
1. वृंदा करात,माकपा पोलित ब्यूरो सदस्य का लेख
2. प्रमोद जोशी,वरिष्ठ पत्रकार का लेख
3. भाजपा का स्वर्णिम काल आना बाकी
4. अपूर्वानंद का लेख
5. कहानी कम्युनिस्टों की - संदीप देव
6. भारत में राजनीति - रजनी कोठारी

Thursday, 27 April 2017

जन चर्चा में आज केजरीवाल के लिए लल्लन मियाँ का सुझाव! - 8/2

"लल्लन मिया! केजरीवाल का चुनावी राजनीति में पतन हो रहा है ठीक उसी तरह जिस तरह किसी ने एक ब्लॉग में आप द्वारा कुछ नेताओं को पार्टी से निकाले जाने के बाद लिखा था,"यह लगने लगा है कि केजरिवाल में राब्स्पियर जैसा चरित्र पनपने लगा है,जिसने फ्रांस की क्रांति (1789) के ओट में इतना कहर बरपाया था जिसमें उसमें सबसे पहले अपने साथियों को निशाना बनाया,फिर खुद बर्बाद हुआ और मारा गया। महान सपनों की क्रांति पहले आतंक और फ़िर तानाशाही में बदली।""

"हमरा नाम है लल्लन मिया! जब मैं कहता हूँ तो लोग कहते हैं ऐसा कह रहा है। आपसभी जानते ही होंगे इसी ब्लॉग में उस समय एक सवाल उठाया गया था कि आम आदमी पार्टी का प्रयोग तो राजनीतिक विचारधाराओं को तिलांजलि देकर पनपा है जहां राइट-लेफ्ट सोच है ही नहीं। तो फिर केजरिवाल अपना घर शुध्द रुप से ठीक करने के लिये क्यों सोच रहे है? केजरिवाल की सोच कैसे पूर्व की सत्ता से अलग होती है इसका इंतजार और फ़ैसला तो वाकई अब 2020 में ही होना है। लेकिन इसकी आहट तो हमसभी अभी तक के घटनाक्रमों में ही देख लिए कि लोकसभा,पंजाब,गोआ और दिल्ली MCD में क्या हश्र हुआ?"

"लल्लन मिया! आखिर क्या हो जाता है कि नैतिकता की बात करने वाले और आंदोलन से निकले तथा सामाजिक कार्यकर्त्ता से राजनेता बने राजनीतिक जीवन में असफल हो जाते हैं,परंतु केजरीवाल सरीखे कुछ लोग इत्तेफाक से सफल भी हो जाते हैं तो उसे बनाये नहीं रख पाते?"

"एक वास्तविक राजनेता वास्तव में राजनीतिक रूप से परिपक्व हो जाता है और शब्दों पर संयम रखता है। केजरीवाल सरीखों,इरोम शर्मिला और अन्य सामाजिक कार्यकर्त्ता को तत्काल नहीं तो कुछ अंतराल पर अधोगति होने का एक ही कारण है - ऐसा नहीं है कि एक सामाजिक कार्यकर्त्ता अन्य क्षेत्रों मसलन डॉक्टर,सिविल सेवा,शिक्षक,राजनेता आदि में कैरियर नहीं बना सकते लेकिन उनके द्वारा सामाजिक कार्यकर्त्ता बनने का निर्णय काफी सोच-समझकर लिया गया उसका व्यक्तिगत निर्णय होता है। समाज में सेवा की एक अलग छवि स्थापित हो जाती है और जब वो राजनीतिक रूप से सक्रियता दिखाने लगता है तो लोग पचा नहीं पाते कि इसके सामाजिक सेवा में एक महत्वाकांक्षा भी छिपा हुआ था जिसकी पूर्ती के लिए वह हमें बरगलाता रहा। पर यह तर्क केजरीवाल पर सही नहीं बैठा था और एक बार ऐतिहासिक जीत नसीब हुई थी लेकिन इनके द्वारा चलाया गया राजनीतिक मुहीम(आरोप-प्रत्यारोप) सही पैमाना स्थापित नहीं कर पाया और साथ ही अन्य राज्यों के लिए राजनीतिक महत्वाकांक्षा किसी से छुपा भी नहीं रहा।"

"कई मौकों पर केजरीवाल पर स्याही फेंका गया। एक ब्लॉग इस घटना को इनका करनी का फल बताता है। जब राजनीति का मतलब व्यक्तिगत हित साधना हो जाए तो राजनीतिक पार्टी अपने आंतरिक संस्थाओं को नेस्तानबुद कर देती है। आप में यहीं सब देखने को मिला।
यह जगजाहिर है कि 'आम आदमी पार्टी' के जन्म का आधार अन्ना आंदोलन में खोजा जा सकता है,जब देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कई आवाजें एक साथ बुलंद हुयी थी। 'आप' एक ऐसी पार्टी बनकर उभरी जिसमें बुद्धिजीवियों का एक जमावड़ा था चाहे वे योगेन्द्र यादव हों या प्रोफ़ेसर आनंद कुमार। लेकिन समय ने ऐसी पलटी मारी कि इस पार्टी से लगभग बुद्धिजीवियों का नाता तो टूट ही गया और जो लोग राजनीति को साफ़-सुथरा करने और नैतिकता की कसौटी पर कसने आये थे,साथ ही अपने लिए आप को एक बेहतरीन मंच मानते थे अपने को अलग कर लिया तो इस हार के बाद लल्लन मिया शायद अब इनको कुछ सद्बुद्धि आये!"

"हमरा नाम है लल्लन मिया! जब मैं कहता हूँ तो लोग कहते हैं ऐसा कह रहा है। यहीं तो मेरा सुझाव है - सही ही कहा गया है जब व्यक्ति की हैसियत बदलती है तो उसके कार्य करने के ढंग भी बदल जाना चाहिए नहीं तो हर स्तर पर किरकिरी होने लगती है। जब आप राजनीतिक सुधार के लिए आंदोलन कर रहे होते हैं तो आरोप लगाना एक सही विकल्प रहता है लेकिन जब आपकी हैसियत बदली और सत्ता मिली तो आपको अपने तरीके बदल लेने चाहिए थे। कोई बात नहीं अभी भी देर नहीं हुई है सत्ता के जरिये किस प्रकार सामाजिक सरोकार और विकास के काम किये जा सकते हैं,कई उदाहरण आपके सामने है उसी को विकल्प बनाइये ज्यादा फायदेमंद रहेगा।
        दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी या संगठन अपने सक्रिय कार्यकर्ताओं की तुलना में बैकग्राउंड में स्थित विचारधारात्मक समर्थन से ज्यादा धारदार और मजबूत होती है। आपने तो इस रीढ़ को ही तोड़ डाला जब विचारों के स्तर पर मुहीम चलाने वालों को बेइज्जती कर निकाल दिए तो पार्टी बिना उसूल के कैसे रह सकती है वो भी तब जब मुखौटा हटाकर असली चेहरा जनता के सामने परोस दिया गया। यह सब काम सत्ता की भीनी-भीनी खुशबु और वोटों के लिए तुष्टिकरण की नीति ने किया।"

Wednesday, 26 April 2017

जन चर्चा के बारे में

        'जन चर्चा' ब्लॉग 'एक सोच जो अलग हो' का एक खास पहल है जिसके बदौलत समाज की परिदृश्यों का कई माध्यमों से समझने का प्रयास किया जाता है। बहसें तो बहुत होती है लेकिन साध्य पाने की कोशिश हमेशा से ही कई मामलों में धूमिल नजर आती है। ऐसे भी भारतीय समाज का विमर्श का स्तर अतीत की गौरवमयी 'पब्लिक डिस्कोर्स' से भटककर अभिजात्य वर्गीय कल्पित समूह ने ले लिया है जो मूल रूप से जाम से जाम टकराकर आपस में ही अपनी पीठ थपथपा लेते हैं।

        इस पहल का मूल मकसद समाज की उसी चर्चा,बहस और विश्लेषण को साकार करना है जिससे हम वास्तविक भारत को समझ सकें कि भारत क्या सोचता है और भारत की क्या मांग है? यह पहल कई दृष्टिकोणों मसलन 'लल्लन मियाँ का सुझाव','ब्लॉगर की अदालत','बातें गलियों से','रजिया की नजाकत' और FAQ आदि के बदौलत समस्याओं को समझने का प्रयास करता है।

रजिया की नजाकत
                                                                                                
बातें गलियों से                                                                                                          
पत्रकारिता का गिरता साख! - 1/1
नोटबंदी पर एक चित्रण!- 2/2
भक्त का दुरुपयोग और विमर्श का गिरता स्तर! - 3/3
मोदी आलोचना का सही चित्रण! - 4/4

Tuesday, 25 April 2017

My diary - मोदी जी! अब व्यापक नीतिगत बदलाव की जरुरत है!

आजकल खबरों में एक नहीं कई सरकार पर और देश पर धब्बा लगाने वाले हरकत छाए हुए हैं।

1. नक्सलियों ने कई जवानों को मार गिराया है। आप केवल कह रहे हैं कि शहादत बेकार नहीं जाएगी। डैमेज कंट्रोल के लिए केवल "अब तक जो कार्रवाई की गई उसके कारण जो बौखलाहट है उनके अंदर, ये उसी का परिणाम है।" इतना कहने से काम नहीं चलेगा।

मूल समस्या प्रकाश सिंह के अनुसार," केंद्रीय बलों और राज्य पुलिस में जो समन्वय होना चाहिए का नहीं होना है। राज्य पुलिस को केंद्रीय बलों के साथ जितना मिल-जुलकर काम करना चाहिए वो भी वो नहीं कर रहे हैं।" ये तो हमलों के कारण की ओर इशारा कर रहा है। पर एक व्यापक नीतिगत बदलाव की जरूरत है।

जब श्रीलंका जैसा मामूली सा देश लिट्टे का सफाया कर और इजराइल जैसा देश अपना साख बचा सकता है तो भारत क्यों नहीं?
कहीं हमारी राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी तो नहीं? भाजपा को किस बात का डर है? किसके वोट का डर है? आखिर विचारधारा के स्तर पर तो हम इन देशद्रोही हरकतों का सख्त विरोध करते हैं लेकिन व्यवहार में पिछड़ क्यों जा रहे हैं?

कहीं भाजपा और संघ के कथनी और करनी में अंतर तो नहीं आ रहा है? अगर नहीं तो जमीनी स्तर पर लड़ाई शुरू किया जाए। थोड़ा सा भी शक पर गोलियों से भून दिया जाए या बीच चौराहे पर फांसी पर लटका दिया जाए। हमारे घर के बच्चे सैकड़ों किलोमीटर दूर देश की रक्षा करने को जा रहे हैं और बेमौत मारे जा रहे है लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल बयानबाजी?

2. दूसरा मुद्दा है - गौरक्षकों को लेकर होने वाला वेवजह का विवाद!
इससे निपटने का सिर्फ एक ही तरीका है कि राष्ट्रीय स्तर पर गौहत्या रोकने का एक व्यापक क़ानून बनाया जाए और गौरक्षकों को लाइसेंस दिया जाए। इन गौरक्षकों को किसी भी प्रकार के कानूनी कार्रवाई से परे रखा जाए। यह दूसरा व्यापक नीतिगत बदलाव का हिस्सा है।

3. काश्मीर में पत्थरबाजों की संख्या बढ़ रही है। हाल में आयी एक खबर के मुताबिक कुछ 'पत्थरबाज लडकियां' भी देखी गयी हैं। ऐसे हालात में काश्मीर के कुछ विकृत मानसिकता वाले लोगों को बुलाकर स्क्रीन काला करने वाला एक चैनल नजरिया समझने के नाम पर मंच दे रहा है। मीडिया संस्थानों के सख्त निर्देश देने की भी जरुरत है कि किन मुद्दों का रिपोर्टिंग किस तरह करना है। ऐसे निर्देशों का उल्लंघन करने पर ऐसे संस्थानों और पत्रकारों को जेल की हवा खिलाना अवश्यंभावी हो गया है। पठानकोट की देश विरोधी रिपोर्टिंग और दिल्ली के एक विश्वविद्यालय में लगे देश-विरोधी नारे को असहमति का हक करार देने वालों को छोड़ना अब भारत का भविष्य खतरे से खाली नहीं रह गया है।

4. भगवा आतंकवाद का जुमला गढ़ने वालों और साध्वी ठाकुर और कर्नल पुरोहित जैसे देशभक्त नागरिकों को झूठे मुकदमे में फंसाने वालों को भी पाठ पढ़ाना चाहिए कि राजनीति के लिए इतने घिनौने काम नहीं किया जाना चाहिए। इनका जांच कर बड़े पार्टी के बड़े नेता को भी दोषी पाए जाने पर जेल भेजने से नहीं हिचकना चाहिए। अभी भले ही बॉम्बे हाई कोर्ट ने मालेगांव धमाका केस में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को जमानत दे दी है। लेकिन दुनिया के सामने हिंदुत्व की छवि की जो बदनामी हुयी है उसका भरपाई कैसे होगा? दक्षिण कोरिया जैसा हमें भी भ्रष्टाचार और सरकारी झूठ के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस को अपनाना चाहिए।

मोदी जी! ये सब कुछ व्यापक नीतिगत बदलाव है जिसे हरहाल में लागू करना ही केवल और केवल एक मात्र उपाय है।
हम उबल रहे हैं! जनता का खून खौल रहा है! राष्ट्रवादी शौर्य परवान पर है! फिर मौका नहीं मिलेगा इसलिए अनिवार्य सैन्य सेवा लागू करके प्रशिक्षण देकर जंगलों में रह रहे नक्सलवादियों और शहरों के माओवादी गुरिल्ला,पाकिस्तान परस्तों और देशद्रोहियों का और यहां तक कि पाकिस्तान का भी समूल नाश करने का सही समय आ गया है।

Monday, 24 April 2017

जन चर्चा में आज लल्लन मियाँ का काश्मीर और पाकिस्तान परस्तों पर सुझाव! - 6/1

"लल्लन मिया! कल 'स्क्रीन काला करने वाले' को देखे? कुछ काश्मीरी छात्रों को बैठाके नजरिया समझने का प्रयास कर रहे थे।"

"हाँ!"

"याद ही होगा कि कैसे जब एक देशद्रोही कह रहा था कि जब फुटबॉल में हम जर्मनी और ब्राजील का समर्थन कर सकते हैं तो क्रिकेट में पाकिस्तान का क्यों नहीं? यह हमारा अभव्यक्ति है।"

"हमरा नाम है लल्लन मिया! जब मैं कहता हूँ तो लोग कहते हैं ऐसा कह रहा है। उस काले स्क्रीन वाले पर तो मुझे शर्म आ रही है जो कह रहे थे कि अच्छा तर्क है। पर आपको किसी देश के समर्थन से नहीं रोका जा रहा है बशर्ते कि माहौल दोस्ताना हो। चीन और पाकिस्तान से रिश्ते हमारे सामान्य नहीं है। पाकिस्तान के काश्मीर में अपने हित हैं,अगर इस परिस्थिति में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम का समर्थन करेंगे तो नियत पर शक होगा ही। आप श्रीलंका,नेपाल और बांग्लादेश का समर्थन कीजिये कौन रोका है और कौन विरोध कर रहा है? भारतीय कानून तो शत्रु देश का समर्थन करने को गुनाह मानता ही है।"

"इतना ही नहीं उन विकृत मानसिकता वाले लोगों को नजरिया समझने के नाम पर इतना बड़ा मंच भी दे दिया गया। इस स्क्रीन काला करने वाले ने कभी काश्मीरी पंडितों को इतने बड़े पैमाने पर बुलाये? यह तो वैसा ही सबकुछ हो रहा है जैसा कुछ दिन पहले दिल्ली के एक विश्वविद्यालय में देश-विरोधी नारे लगाने वालों को असहमति का हक करार दिया जा रहा था।"

"हमरा नाम है लल्लन मिया! लेकिन मैं अब कुछ नहीं बोलूंगा!"

"इतना ही नहीं कुछ तो काश्मीर में पत्थरबाजों को भटके हुए नौजवान कह रहे हैं। बातचीत करने को लॉबिंग कर रहे हैं।"

"स्पष्ट है ये लोग अपनी नियत को उजागर कर रहे हैं कि भारत के संविधान में हमारी कोई आस्था नहीं है। चुनाव के दिन डर का माहौल बनाना इसी का हिस्सा था।"

"लल्लन मिया! ये तो आप जान ही रहे होंगे कि वहां की मुख्यमंत्री भी दिल्ली आयी थी और कह रही थी वाजपेयी के प्रयासों की डोर जहां छूट गयी थी वहीं से पकड़ना चाहिए। मतलब अलगाववादियों से भी वार्त्ता करना चाहिए।"

"हमरा नाम है लल्लन मिया! ये लोग समझ क्यों नहीं रहे हैं कि वाजपेयी के समय का परिदृश्य बदल गया है। उस समय शांति के लिए पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव था। पर आज पाकिस्तान का चीन के एक प्रोजेक्ट(CPEC) के कारण दिखावटी हौसला बुलंद है। आखिर अलगाववादियों के पास संसाधन तो कहीं से आता ही होगा जिसकी पूरी संभावना है कि वह पाकिस्तान ही है तो वह 'आजाद काश्मीर' के अलावा किसी पर समझौता पर सहमत क्यों होगा? भाजपा ने भी कह दिया है कि जिनकी भारत के संविधान में कोई आस्था नहीं है उनसे कोई वार्त्ता नहीं होगी जो एक सही रुख है।"

"ये तो मालूम ही होगा आपको आज कई पत्रकार और बुद्धिजीवी उन पत्थरबाजों और पाकिस्तान से भी सहानुभूति रख रहे हैं और वार्त्ता को ही हल बता रहे हैं।"

"अब वो समय चला गया है। अगर आज कोई वार्त्ता की बात करता है तो उसे भारतीय संप्रभुता पर हमला के रूप में लिया जाना चाहिए। ऐसे मेरे पास एक सुझाव है।"

"लल्लन मिया! इसी सुझाव का तो इंतजार रहता है।"

"हमरा नाम है लल्लन मिया! मैं कहता हूँ तो लोग कहते हैं ऐसा कह रहा है। पहले इन्हें एक मौका दिया जाये कि भारत में रहने वाले वे लोग जिनकी आत्मा पाकिस्तान में बसती है और पत्थरबाजों से सहानुभूति रखते हैं और साथ ही जो देश विरोधी नारों को असहमति का हक कहते हैं,वे पाकिस्तान चले जाएं! इसके लिए दिल्ली से इस्लामाबाद तक एक 'वन वे ट्रेन' चलाना चाहिए वो भी मुफ्त!
अगर ये चले जाते हैं और जो नहीं जाते हैं और इनकी भारत के संविधान में कोई आस्था नहीं है और भारतीय संप्रभुता के लिए कोई इज्जत नहीं है तो ऐसे दुश्मन देशदोहियों का समूल नाश कर देना चाहिए और तब क़ानून की किताब को खोलना चाहिए। तभी हम मजबूत होंगे,नहीं तो ये दीमक की भांति हमें खोखला कर देंगे।"