Thursday, 23 March 2017

Media - आदित्यनाथ का चुनाव खतरनाक है? - द हिंदू का षडयंत्र!

यह कहना है वाल्टर एंडरसन का जिनका एक इंटरव्यू अंग्रेजी समाचारपत्र 'द हिंदू' में छपा है। वास्तव में यह पत्र इस मामले में अपने पूर्वाग्रह को झलका दिया है। वाल्टर ने कई अहम बातें कही है। संघ और भाजपा के संबंध में कई सकारात्मक बातें हैं लेकिन पत्र ने मात्र एक नकारात्मक बात को शीर्षक बना दिया है। मालूम नहीं ये क्या साबित करना चाहते हैं? जबकि वाल्टर एंडरसन यह भी कहते हैं,"वे एक प्रखर वक्ता हैं और प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री मोदी के तरह एक लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध हैं। वे भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी के खिलाफ भी लड़ने को प्रतिबद्ध हैं - यूपी के लिए एक स्वागतयोग्य राहत है। हालांकि वे भड़काऊ बयान दिए हैं,व्यक्तिगत भ्रष्टाचार से मुक्त हैं।"

आप सभी इसे पढ़ सकते हैं जिसका हिंदी अनुवाद मैंने कर दिया है और नीचे उस पत्र का लिंक और स्क्रिप्ट भी संलग्न है।

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा के जीत के बाद,द हिंदू नामक समाचार पत्र ने वाल्टर एंडरसन का साक्षात्कार ई-मेल के माध्यम से किया जो जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय के दक्षिण एशिया अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक और 'द ब्रदरहुड इन सैफ्रॉन'(भगवा में भाईचारा) के सहायक लेखक हैं।



द हिंदू का सवाल - भाजपा के राष्ट्रीय विस्तार और कांग्रेस के राष्ट्रीय विस्तार के बीच तुलना की गयी है। इसपर आपका क्या विचार है?
वाल्टर एंडरसन - यद्यपि ऐसे कई क्षेत्र हैं,जहां अभी भी भाजपा कमजोर है,ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस एक समय जैसी थी वैसी ही भाजपा केवल एक वास्तविक पार्टी और स्थानीय राजनीतिक सौदों के मध्यस्थ हो रही है। यह मजबूत राज्य स्तरीय नेताओं को विकसित कर रही है जैसा कि कांग्रेस के पास एक समय थे,जबकि एक साथ राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत नेता(नेहरू जैसा) है जो दोनों अर्थात राज्य इकाइयों को मजबूत करना चाहता है ताकि अपने आप को इन नेताओं का CEO कहे। इस प्रयास के सहयोगी संघ परिवार के हजारों कार्यकर्त्ता हैं,इसका शायद ही कभी विश्लेषण किया गया हो लेकिन सच है। मैं कहा था,"संघ और संघ परिवार के कार्यकर्त्ता लोगों को वोट देने के लिए कह रहे हैं,जिसकी सुगंध यूपी दे रही थी।" इसपर,यह कांग्रेस से बहुत ही अलग करता है।

द हिंदू का सवाल - यूपी में प्रधानमंत्री की सफलता कैसे होगी जो संघ से इनके संबंध को प्रभावित करते हैं?
वाल्टर एंडरसन - RSS जीत को सुनिश्चित करने के लिए कठिन मेहनत की जो दिखा। लेकिन इस सफलता में एक बना हुआ तनाव भी है। आरएसएस अपनी सबसे अच्छी बात को खोना और भाजपा को प्रतिभाशाली नहीं बनाना चाहता है। RSS प्रमुख मोहन भागवत स्वयंसेवकों को एक खुली चेतावनी जारी कर चुके हैं कि याद रखें - वे पहले स्वयंसेवक हैं और राजनीति एक बहुत अलग व्यवसाय है - और संभवतः आरएसएस का "चरित्र-निर्माण" नैतिक रूप से बेहतर है। कोई संदेह नहीं है कि मोदी संघ परिवार में बहुत ही प्रभावशाली व्यक्ति हैं और यह निश्चित रूप से आरएसएस नेतृत्व को उनके चरित्र निर्माण और हिंदुत्व उद्यम के लिए कुछ चिंता का होना चाहिए, कई मायनों में,उनके विचार और [उनमें से] भाजपा के राजनीतिक उद्देश्यों से बहुत ही अलग(जैसे कि आरक्षण मुद्दा) है। सौभाग्य से उनके लिए,मोदी एक आदरणीय पूर्व प्रचारक हैं,जो अभी भी प्रशंसा करते है कि वे राष्ट्रवादी परियोजना के संदर्भ में क्या करने की कोशिश कर रहे हैं।

द हिंदू का सवाल - आप उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ की भाजपा की पसंद कैसे देखते हैं?
वाल्टर एंडरसन -  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के लिए योगी आदित्यनाथ का चुनाव रोचक और खतरनाक है। यह 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए हिंदुओं के संगठित होने के प्रयास को प्रदर्शित करता है,लेकिन यह पार्टी की क्षमता को कम करने के लिए बीच में फैल सकता है। शायद,सबसे महत्वपूर्ण रूप से,क्या वे शक्ति और कार्य-उत्पादकता को दूसरे में बाँट सकते हैं? वे समय-समय पर भाजपा को परेशान कर चुके हैं और संघ उनके अकेले चलने के अंदाज के लिए,एक असफलता जो उन्हें कुछ हद तक संपूर्ण संघ परिवार के मद्देनजर संदेहास्यपद बनाता है।
वे एक प्रखर वक्ता हैं और प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री मोदी के तरह एक लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध हैं। वे भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी के खिलाफ भी लड़ने को प्रतिबद्ध हैं - यूपी के लिए एक स्वागतयोग्य राहत है। हालांकि वे भड़काऊ बयान दिए हैं,व्यक्तिगत भ्रष्टाचार से मुक्त हैं। वे राम मंदिर के तत्काल निर्माण की मांग(प्राथमिक रूप से विश्व हिंदू परिषद) से भिन्न भी हो सकते हैं और संभवतः ऐसा कर भी सकते हैं। आखिरकार, कौन अपने हिंदुत्व पहचान को चुनौती दे सकता है?
कभी-कभी,दिमाग में रखना जरूरी हो जाता है कि सावरकर और हेडगेवार के तुलना में महात्मा गांधी बहुसंख्यक हिंदू के विचारों का एक बढ़िया विश्लेषक थे। महात्मा गांधी पक्के तौर पर विश्वास करते थे कि व्यक्तिगत व्यवहार में अपनी पूर्णता के माध्यम से, वह दूसरों के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। योगी आदित्यनाथ गांधी के अहिंसा के प्रति प्रतिबद्ध नहीं हो सकते हैं लेकिन लेकिन ईमानदारी पर ध्यान समान है।
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का मूल ध्येय एक भिक्षु होना था,सभी भिक्षु एक-दूसरे के लिए एक निश्चित सहानुभूति के लिए होते हैं।

After the BJP’s victory in the Uttar Pradesh Assembly polls, The Hindu interviewed Walter Andersen, Director of the South Asia Studies Programme at Johns Hopkins University and co-author of The Brotherhood in Saffron, through e-mail.

There have been comparisons between the BJP’s spread nationally and that of the Congress. Your view?
While there are still areas where the BJP is weak, it seems to be becoming what the Congress once was, the only real national party and arbitrator of local political deals. It is developing strong State party leaders that the Congress once had, while simultaneously having a strong national leader (comparable to Nehru), who seeks both to strengthen the State parties while asserting himself as the CEO of these leaders. Assisting this effort are thousands of volunteers from the Sangh Parivar, an asset seldom analysed but very real. I am told U.P. was swarming with Rashtriya Swayamsewak Sangh and Sangh Parivar workers getting people out to vote. On this, it differs very much from the Congress.

How will Prime Minister Modi’s success in U.P. affect his relationship with the RSS?
The RSS worked very hard to ensure the victory that emerged. But there is an inbuilt tension in this success. The RSS does not want to lose its best and brightest to the BJP. RSS chief Mohan Bhagwat has issued public warnings to swayamsevaks to remember that they are first swayamsevaks and that politics is a very different vocation — and presumably the RSS’s “character-building” is morally superior. There is no doubt that Mr. Modi is the most influential figure in the Sangh Parivar and that surely must be of some concern to the RSS leadership as their character-building and Hindutva enterprise is, in many respects, very different from his political objectives (e.g. the reservation issue) and [those of] the BJP. Fortunately for them, Mr. Modi is a respectful former pracharak, who still admires what they are trying to do in terms of the nationalist project.

How do you read the BJP’s choice of Yogi Adityanath as Chief Minister of Uttar Pradesh?
The selection of Yogi Adityanath as Uttar Pradesh Chief Minister is interesting and risky. It represents an effort to unite Hindus for the 2019 general elections, but it could impair the ability of the party to expand to the middle. Perhaps, most importantly, can he share power and work productively with others? He has periodically irritated the BJP and the RSS for his go-it-alone style, a failing that makes him somewhat suspect in the view of the collegially oriented Sangh Parivar.
He is a superb orator and seems committed to a mission like Prime Minister Modi. He is also committed to a fight against corruption and goondaism — a welcome relief for a State like U.P. While he has issued inflammatory statements, he seems to be free of charges of personal corruption. He can also defer the demand (primarily from the Vishwa Hindu Parishad) to immediately construct a Ram temple and can probably do so. After all, who can challenge his Hindutva credentials?
Sometimes, it is necessary to keep in mind that Mahatma Gandhi was a better analyst of views of the great mass of Hindus than, for example, was Veer Savarkar or even the first Sarsanghchalak of the RSS, K.B. Hedgewar. Mahatma Gandhi firmly believed that through his own perfection in personal behaviour, he could influence the behaviour of others. Yogi Adityanath may not be committed to Gandhi’s ahimsa, but the emphasis on incorruptibility is similar. Let us also not forget that PM Narendra Modi’s original calling was to be a monk, all leading to a certain sympathy each has for the other.

स्क्रिप्ट सौजन्य - द हिंदू
फोटो - द हिंदू
अनुवाद - सुरेश कुमार पाण्डेय