Wednesday, 15 March 2017

Motivational - JNU के एक दलित छात्र ने आत्महत्या कर ली! कारण क्या रहा होगा?

शुक्र है कि दलित और वामपंथी जमात इस छात्र को लेकर राजनीति करने का क्रम शुरू नहीं किये। जिसकी छाप हम
"हैदराबाद के एक अन्य छात्र जिसने देश विरोधी हरकतों के कारण हॉस्टल आदि से निष्कासित किये जाने के बाद आत्महत्या कर ली थी को जबरजस्ती दलित घोषित करने पर तुले हुए थे और कइयों के तो वह आदर्श भी बन गए थे" पर देखते हैं।

यह तो कुछ पुराना मामला है - उसके बाद की घटनाओं को आप याद करेंगे तो देखेंगे तो एक मुस्लिम छात्र के लापता होने और देश विरोधी नारे लगाने वालों के समर्थन में किस तरह कुछ विकृत मानसिकता वाले छात्र घिनौनी प्रकार की राजनीतिक अखाड़े में कूद पड़े थे।

हाल में जिस छात्र ने आत्महत्या की वह JNU में कई प्रयासों(पांच) के बाद नामांकन पाने में सफल हुए थे। इस दौरान मिली असफलता से वे कितने असहज हुए होंगे,इसका अनुमान तो आम लोग नहीं लगा सकते लेकिन वे जो इस क्षेत्र से जुड़े हैं और मामूली घराने से आने के बावजूद दुनिया में अपनी भी दखल मौजूद कराने को जद्दोजहद कर रहे हैं पर वर्षों से भाग्यवधू से मिलन दूर का रास्ता बना हुआ है,वे तो समझ ही सकते हैं। पर ये अडिग हैं,अपने रास्ते खुद बनाने की जुगत में है और साथ ही तमाम कठिनाइयों में से एक छोटी सी सुराख को खोजकर जो दुनिया के नजर से ओझल है,सफलता की बुलंदियों तक पहुंचने को लालायित हैं।

एक ऐसा व्यक्ति जो कई असफलताओं को अपने अंदर पचा लिया हो लेकिन फिर भी क्या कारण रहता है कि वह आत्महत्या जैसे कायरतापूर्ण हरकत कर बैठता है?

मैं ऐसे ही असफल हो रहे कई छात्रों और व्यक्तियों से बात कई वर्षों से कर रहा हूँ/किया हूँ। इसदौरान मुझे "एक जैसे कई खास बिंदु जो लगभग सभी में एक जैसी ही है दिखाई देती है" मिली जो आत्महत्या जैसे कृत्य को करने के लिए प्रेरित करती है।

"उम्मीद" - जरूरत से ज्यादा और उसके नगण्य भी न पा पाना या कुछ कमजोरियों के कारण जिसकी चाहत है उसका दूर रह जाना काफी हद तक मनुष्य को अंदर से तोड़ कर रख देता है।

पर इन उम्मीदों को वह पा सकता है! एक सर्वमान्य सिद्धांत है - "अगर एक ओर रास्ते बंद होते हैं तो दूसरी और स्वतः ही खुल जाते हैं"।

समस्याओं का सामना करने वाले हर वह व्यक्ति संघर्षशील हो जाता है,साथ ही वह उस स्वतः खुल गयी रास्तों के तलाश में लग जाता है।

पर उसकी सोच में मूल विकृति तब आ जाती है जब उसके उठाये गये कदम पर समाज(बाहरी दुनिया) ताना मारने लगता है। चुकी इतने समय में वह इनसब का आदि हो चूका होता है इसकारण प्रभाव ज्यादा नहीं पड़ता लेकिन विचलित करने के लिए काफी होता है। यह विचलित होना आग में घी का काम तब कर देता है जब अपने यानी परिवारजन और रिश्तेदार व्यक्ति की मानसिक और नैतिक समर्थन नहीं कर पाते हैं। यहीं वह कड़ी है जिसे हर किसी को समझना चाहिए। अपनों का तिरस्कार और शब्दों का चयन संघर्षशील छात्रों को तोड़ देता है,विचलित कर देता है और आत्महत्या जैसे कायरतापूर्ण कृत्यों की ओर आकर्षित करता है।

'तुम क्या पढ़ रहे हो कि तुम्हारा कुछ नहीं हो रहा है?';'कैसे पढ़ाई कर रहे हो?';'उसका कैसे हो गया और तुम्हारा नहीं हुआ?'
'तुम्हारा कुछ नहीं होगा।' आदि ऐसे ही वो तिरस्कार भरे सवाल हैं जिससे व्यक्ति का हश्र JNU के इस छात्र जैसा ही हो जाता है।

इससे बचने का एक ही तरीका है,आप ध्यान दें - "जिसतरह आप अच्छे दिनों में और सफलता के समय साथ रहते हैं और खुशी मनाते हैं उसीतरह बुरे दिनों तथा असफलता के समय भी ऐसे ही माहौल बनाएं,आप ढांढस बंधाये,मूल नियत पर ध्यान दें और ऐसे सवालों पर गौर करें कि वह कौन सा व्यक्ति होगा जो सफल होना नहीं चाहता होगा? उसके लिए सफलता के मायने क्या हैं,यह महत्वपूर्ण सवाल हो जाता है?"

आप सभी तो खुद समझदार हैं! थोड़ी सी और समझदारी दिखाकर आप कीमती भविष्य को बचा सकते हैं! आपसभी को यह जानकारी ही होगा कि 'असफलता सफलता की जननी है'। दुनिया में जितने भी महान शख्सियतें बनी है और दुनिया जिसे वर्षों से याद कर रही है और वर्षों से याद करेगी वो वास्तव में अव्वल दर्जे के असफल इंसान थे। लेकिब उनसभी ने इन असफलताओं से सीखा और अपने नाम और सफलता का सुनहरा परचम लहरा दिया।

हाल का भाजपा के उदाहरण से भी समझिए कि कैसे ये दिल्ली की असफलताओं से सीखी जब उसके पास 31 विधायक थे लेकिन वे सरकार बनाने की पहल नहीं की थी और 28 विधायक वाले आप ने कांग्रेस की सहायता से सरकार बनाकर अगले ही चुनाव में सदस्यों की संख्या 67 पहुंचा दी और वहीं भाजपा 3 पर सिमट गयी लेकिन इसबार गोआ और मणिपुर में बहुमत से काफी पीछे रहने के बावजूद सत्ता कायम कर ली!