Wednesday, 22 March 2017

Hindu Nation - वामपंथी फिर से फड़फड़ाने लगें!

अभी हाल में ही मैंने एक आलेख बीबीसी हिंदी पर पढ़ा। राम मंदिर को लेकर एक लेखक "जिनका रुझान वामपंथ से काफी प्रभावित है" के शब्दों के जरिये इनके जैसे सभी वामपंथी जमात की कमोवेश यहीं सोच है,उनकी मंशा आपके सामने आ जाएगी। ये वहीं लोग है जिन्हें आतंकवादियों के मानवाधिकार तो दिखाई देता है लेकिन काश्मीरी पंडितों का नहीं,साथ ही ये वहीं लोग हैं जिन्हें देश-विरोधी नारा असहमति का हक लगता है और इसका विरोध अभव्यक्ति का अधिकार नहीं बल्कि फासीवाद!

इनके द्वारा उठाये गए सवाल नं. -1

भले ही राम लला की मूर्ति रात के अँधेरे में रखी गई हो लेकिन मस्जिद गिराने का काम सबकी आँखों के सामने हुआ। दोनों ही मामलों में प्रशासन और सरकार की मिलीभगत साफ़ थी। यह भी दिलचस्प विडंबना है कि जिस अदालत ने सुलह-समझौते का सुझाव दिया है, वही अभी तय करने वाली है कि छह दिसंबर, 1992 को मस्जिद ध्वंस के अपराधी कौन थे और उनके साथ क्या किया जाए!

इनका जवाब - बिना इन अपराधों का फैसला हुए किसी समझौते की कल्पना कैसे की जा सकती है? दूसरे, आज के माहौल में किसी समझौते के बारे में कैसे सोचा जा सकता है जब उत्तर प्रदेश और केंद्र, दोनों जगह सरकार में वे लोग सत्तासीन हैं जिन्होंने बाबरी मस्जिद ध्वंस का अभियान चलाया था और जो अपने चुनावी वायदों में अलग-अलग तरीके से बाबरी मस्जिद वाली जगह पर ही राम मंदिर निर्माण का संकल्प व्यक्त करते रहे हैं। जाहिर है, यहाँ राज्य की मशीनरी के निष्पक्ष होने का कोई सवाल ही नहीं है।

अब जरा सोचिए - मामले की तह में जाने की जरूरत है। कई प्रमाण यह साबित कर चुके हैं कि विवादित ढाँचा कोई मस्जिद नहीं बल्कि राम मंदिर का अवशेष ही है। पहली जवाबदेही उसकी होती है जिसके द्वारा शुरुआत की जाती है,यह एक सर्वमान्य सिद्धांत है। जब विदेशी आक्रांता शांतिप्रिय हिंदुओं के भावनाओं का फायदा उठाकर भारत पर शासन करता है और मंदिर को तोड़कर मस्जिद में तब्दील करता है तो झगड़े की जड़ तो यहीं है,यहीं विवाद की जड़ है।

अगर आडवाणी आदि कारसेवा करते हैं ताकि अतीत के गौरव को फिर से पाया जा सके और करोड़ों हिंदुओं की श्रद्धा की रक्षा की जा सके तो इनके उद्देश्यों को किसी भी नजरिये से गलत नहीं ठहराया जा सकता,वो भी तब जब लक्ष्य अतीत में हिंदुओं के साथ हुए अन्याय का बदला लेने से संबंधित हो तो इनके दोषी होने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।

अदालत अपना काम कर रही है,लेकिन देर-सबेर आप जरूर देखेंगे कि ये सभी नेता जिन्हें मंदिर आंदोलन के लिए दोषी बनाया जा रहा है निर्दोष साबित होंगे। कुल मिलाकर दूसरे शब्दों में अदालती कार्यवाही की यह संसाधनों की बर्बादी ही है।

सवाल नं. - 2

सुप्रीम कोर्ट क्या इस पूरे सन्दर्भ से नावाकिफ है? या क्या यहाँ यह समझ काम कर रही है कि समझौता अलग मसला है और बाबरी मस्जिद ध्वंस के अपराध की जिम्मेदारी तय करना उससे कतई अलग है?

इनका जवाब - यह मानने को जी नहीं करता कि हमारी सबसे बड़ी अदालत को इसका अहसास नहीं है कि बाबरी मस्जिद को लेकर खड़े किए गए विवाद का निपटारा कैसे किया जाता है, इससे इस राष्ट्र की बुनियादी मान्यता, यानी धर्मनिरपेक्षता की साख जुड़ी हुई है। हमारे राजनीतिक दलों ने उसे लेकर गंभीरता का परिचय नहीं दिया है। यह भावनाओं का और धर्म का मसला कतई नहीं, किसी एक के धार्मिक स्थल से उसे बेदखल करके उस पर कब्जा करने का निहायत दुनियावी षड्यंत्र है। खुद लालकृष्ण आडवाणी कबूल कर चुके हैं कि जो आंदोलन उन्होंने चलाया था वह धार्मिक नहीं, राजनीतिक था। भारत की साख की रक्षा का कठिन दायित्व अब उसके न्यायतंत्र के हाथ है। अमरीका की अदालतों ने यह दिखा दिया है कि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा कैसे की जा सकती है। वे बहुसंख्यकों का वर्चस्व स्थापित करने के दबाव में नहीं आई है। क्या ऐसे नाज़ुक मोड़ पर भारत को उसका न्यायतंत्र निराश करेगा?

अब एक बार फिर से सोचिये - जिस धर्मनिरपेक्षता की बात की जा रही है,क्या भारत को वास्तव में धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए? इसका जवाब आपको मिल जाएगा अगर आप जब यह तथ्य जानेंगे कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता एक विदेशी अवधारणा है और 'कम्युनिस्ट नास्तिकता' के सिद्धांत का ही दूसरे शब्दों में आरोपण है। यह निहायत ही भारत के लिए खतरा है। भारतीय संविधान में इस अवधारणा को डालने के साथ ही वामपंथियों की कल्पित पहली षडयंत्र की शुरुआत हो गयी थी। इस धर्मनिरपेक्षता की आड़ में आज के समाज मि व्याख्या बेमानी होगी और सरकारी और न्याय तंत्र निरंकुश हो जाएगा क्योंकि इस नास्तिकता के कारण राज्य के तंत्रों में अध्यात्मिक आवेश पनप ही नहीं पाएगा। चूकि यह छद्म और खतरनाक धर्मनिरपेक्षता इन वामपंथियों की देन है तो इसकी दुहाई देंगे ही। इसकारण इस शब्द को ही संविधान से निकाल बाहर कर सबके प्रिय हिंदुत्व को शामिल करने की आवश्यता पर बहस करने की जरुरत है।

इसलिए ध्यान दें - भारत की भविष्य केवल और केवल 'हिंदू राष्ट्र' की स्थापना में है,यहीं वास्तव में सभी धर्मों और समुदायों का आदर कर पाएगा। इस उद्देश्य की पूर्ति केवल और केवल अयोध्या में भव्य मंदिर के निर्माण से ही हो सकती है।