Saturday, 18 March 2017

Book review - EVM पर आडवाणी द्वारा उठाये गए सवाल का सच!

जिस किताब "Democracy at Risk! Can we trust our Electronic Voting Machines? Copyright @ GVL Narasimha Rao 2010" के प्रस्तावना को संदर्भित किया जा रहा है कि EVM पर आडवाणी भी सवाल उठा चुके हैं,इसमें सच्चाई का थोड़ा भी अंश नहीं है। ये वे लोग हैं जो कभी कुछ पढ़ते तो हैं नहीं और बिना मतलब बहस के केंद्र में आ जाते हैं। आडवाणी अपनी प्रस्तावना में मूल रूप से EVM की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं और VVPAT जैसे एक अन्य तकनीक के इस्तेमाल पर जोर देते हैं ताकि किसी गड़बड़ी की स्थिति या शक की स्थिति में दोबारा मतपत्रों की गिनती करने समाधान निकाला जा सके।

आप सभी प्रस्तावना को नीचे पढ़ सकते हैं। वास्तव में यह किताब अंग्रेजी में जिसका हिंदी अनुवाद मैंने कर दिया है। आप सभी ऊपर हिंदी और नीचे अंग्रेजी स्क्रिफ्ट को पढ़कर आसानी से समझ सकते हैं। अगर नरसिंहा राव द्वारा कोई सवाल उठाया जाता है तो वह सिर्फ बहस का हिस्सा था,उसके बाद काफी सुधार हो चुके हैं और उस लगभग सात साल पुरानी किताब की कोई प्रासंगिकता नहीं रह गयी है। इतने दिनों में चुनाव आयोग के कई बयान और कोर्ट आदेश आकर इस किताब के महत्व को भी कम कर दिया है।


प्रस्तावना -

दुनिया के अधिकांश लोकतंत्र में EVM का मुद्दा व्यापक जन चर्चा का विषय बन चूका है। भारत में,हम पिछले दो लोकसभा और हाल में ही हुए कई विधानसभा चुनावों को इस मशीन द्वारा करा रहे हैं। लेकिन अब तक यह मशीन कितना उपयोगी है,इसपर बहुत थोड़ी ही बहस हुई है। इसलिए इस किताब के लेखक G.V. L. नरसिम्हा राव मुझसे संपर्क किये और इसकी प्रस्तावना लिखने को अनुरोध किये,मैं केवल उनके प्रस्ताव को स्वीकार ही नहीं किया,बल्कि सारे तथ्यों के संकलन के उनके प्रयास के लिए उन्हें बधाई दी ताकि वह इस विषय पर विमर्श की एक पहल कर सकें। इस किताब का नाम निश्चित रूप से उत्तेजक है।

चुनाव-सुधार साठ के दशक के मध्य से मेरे अध्ययन का पसंदीदा विषय रहा है। जब मैं 1970 में राज्यसभा के लिए चुना गया,मैंने श्री वाजपेयी से इस विषय पर चर्चा किया जो उस समय लोकसभा सदस्य थे। वे निचली सदन में इस मुद्दे को उठाने और इसपर अध्ययन के लिए JPC गठित करने के प्रयास के लिए राजी हो गए। उनदिनों दल-बदल का मुद्दा,चुनाव के दौरान सरकारी साख के गलत इस्तेमाल और चुनाव में पैसों का नाजायज इस्तेमाल का चलन जैसे तीन बुराइयाँ भारतीय लोकतंत्र के सेहत और सभी जनता से संबंधित मूल कारण बने हुए थे। यह वाजपेयी का ही पहल था कि 1970 में चुनावी सुधार के लिए JPC का गठन हुआ। वे और मैं,दोनों इस समिति के सदस्य रहे। यह समिति कुछ कम साबित हुई क्योंकि 1971 में लोकसभा को भंग कर दिया गया।

1971 के लोकसभा चुनाव के बाद,श्री वाजपेयी एक बार फिर उस मुद्दे को उठाये और इसे नयी गठित हुयी कमिटी में देखा। इस कमिटी ने कई सिफारिसों के साथ अपनी रिपोर्ट 1972 में दिया,जिनमें से कुछ को स्वीकार लिया गया। वाजपेयी ने जो पहल की थी वो वहाँ अंत नहीं हुई। तब से कई कमिटियां बनाई गयी हैं,सभी मतदान प्रक्रिया में सुधार पर ध्यान केंद्रित की हैं। मेरी पार्टी इस तरह के सभी प्रयासों - तारकुंडे समिति(1974) या दिनेश गोस्वामी समिति(1990) या इंद्रजीत गुप्ता समिति(1998) के बनाने में सक्रियता से सहयोग करती रही है। श्री वाजपेयी के नेतृत्व वाली NDA सरकार ने भी कई पहले की। लेकिन मुझे यह स्वीकार करना होगा कि चुनाव की लागत में बढ़ोतरी और बढ़ रही है भ्रष्टाचार,जो देखा जा रहा है अत्यंत ही चिंताजनक है।

मैं समझता हूँ कि अगले महीने के कुछ समय बाद चुनाव आयोग मतदान सुधार से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा के लिए राजनीतिक पार्टियों के एक सम्मिलित मीटिंग का प्रस्ताव करेगा। मुझे खुद से ही एक अवसर पर मुख्य चुनाव आयुक्त से बात करने और 'पेड न्यूज', मीडिया के एक भ्रष्ट रूप, की बुराई पर अपना ध्यान आकर्षित करने का मौका मिल चुका है जो हाल के चुनावों को घेर लिया है। मैं समझता हूँ कि यह मुद्दा मीटिंग में चर्चा के लिए जाएगा। मैं सुझाव देता हूँ कि EVM के सवाल भी उठाये जाएंगे।

मैं व्यक्तिगत तौर पर यह समझता हूँ कि जर्मनी,तकनीकी रूप से,दुनिया के उन्नत देशों में से एक है,EVM से इतनी सावधानी बरती हैं कि उनका इस्तेमाल पूरी तरह से प्रतिबंधित हो। USA के कई राज्य अनिवार्य कर दिए हैं कि EVM केवल तभी इस्तेमाल किया जा सकता है जब इसके पास पेपर बैक अप हो। इसलिए अमेरिका में EVM के विनिर्माणकार्त्ता VVPAT जैसे तकनीक का विकास कर चुके हैं। प्रत्येक मतदाता जो EVM से अपना वोट देता है,वह एक प्रिंट मतपेटी में पाता है ताकि अगर मशीन में कोई विसंगति गैर-कामकाज(रखे हुए) की वजह से या किसी के शैतानी से हो तो मतपत्रों को गिना जाए।

आज अमेरिका के 50 में से 32 राज्यों ने वोटिंग मशीन के साथ VVPAT की अनिवार्यता के लिए क़ानून बना दिए हैं। अमेरिकी कांग्रेस के पास पहले से ही राज्यों के जैसा एक संघीय क़ानून लंबित है। मैं सोचता हूँ चुनाव आयोग लोकतंत्र को मजबूत करेगा अगर यह भारतीय संसद द्वारा भी समान कानून का विचार करता है।

जनवरी 26,2010
L. K. आडवानी

-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

Foreword -

In many democracies of the world the issue of electronic voting
machines has become a matter of wide-spread public
discussion. In India we have been conducting our elections
through this device for the last two Lok Sabha elections and
also in various Assembly elections held recently. But as yet
there has been little debate on how useful these machines have
proved. So when the author of this book G.V.L. Narasimha Rao
approached me and requested me to write its Foreword, I not
only accepted his plea, but complimented him for his efforts to
compile all the facts he could on the subject and initiate a
debate. The title of the book is certainly provocative.

Electoral Reforms has been my favourite subject of study since
the mid sixties. When I was elected to Rajya Sabha in 1970, I
discussed the matter with Shri Vajpayee who was at that time
a member of Lok Sabha. He agreed to raise the issue in the
Lower House, and try to have a JPC set up to study the
question. Those days the issue of defections, abuse of
governmental power in polls and growing misuse of money
power in elections were three evils causing concern to everyone
concerned with the health of Indian democracy. It was at the
initiative of Shri Vajpayee that in 1970 a Joint Parliamentary
Committee for Electoral Reforms was set up. Both he as well
as I served on this Committee. This Committee proved short
lived because the Lok Sabha was dissolved in 1971.

After the 1971 general elections, Shri Vajpayee raised the issue
once again and saw to it that a new JPC was constituted. This
Committee which gave its report in 1972 made several
important recommendations some of which were accepted. The
initiative taken by Vajpayee did not end there. Since then,
several other committees have been formed, all aimed at
reforming the poll process. My party has been proactively
cooperating with all such efforts - be it the Tarkunde Committee
(1974) or the Dinesh Goswami Committee (1990) or the Indrajit
Gupta Committee (1998). The NDA Government headed by Shri
Vajpayee also took several initiatives. But I must admit that
the phenomenal increase in the cost of elections and increasing
corruption that is being witnessed is extremely worrisome.

I understand that some time next month the Election
Commission proposes to convene a meeting of political parties
to discuss various issues relating to poll reforms. I have had
occasion to speak to the Chief Election Commissioner myself
and draw his attention to the evil of 'paid news', a form of media
corruption which has besmirched recent elections. I understand
that this issue is going to be discussed at this meeting. I suggest
that the question of EVM also be taken up.

I personally regard it significant that Germany, technologically,
one of the most advanced countries of the world, has become
so wary of EVMs as to ban their use altogether. Many states
in USA have mandated that EVMs can be used only if they have
a paper back-up. So manufacturers of electronic voting
machines in USA have developed a technology referred to as
Voter Verified Paper Audit Trail (VVPAT). Every voter who
exercises his vote on the EVM gets a print out in a ballot box
so that if there is any discrepancy in the machine either because
of mal-functioning or because of mischief the paper ballots can
be counted.

Today 32 out of 50 states in the USA have passed laws making
these VVPAT voting machines compulsory. The U.S. Congress
has pending before it a federal law similar to that of the State
laws. I think the Election Commission would be strengthening
democracy if it contemplates similar legislation by the Indian
Parliament also.

January 26, 2010
L.K. Advani