Saturday, 25 March 2017

Economics/Motivational - भारत में समस्या रोजगार की नहीं बल्कि मजदूरी और सोच की है!

यह जानकार आपको हैरानी होगी कि भारत में बेरोजगारी दर मात्र 5% है। वास्तव में काम करने की चाहत रखने वाले सभी शख्स को रोजगार मिल जाता है लेकिन वो मजदूरी नहीं मिल पाती जितनी जरुरत होती है,यहीं वह वजह है जो गरीबी जैसी चुनौतियों को जन्म देती है और स्थिति बद से बदतर होते हुए चरम तक पहुंच जाता है। इस मामूली बात को हम समझने में भूल कर देते हैं और बहस का केंद्र 'रोजगार समस्या' पर टिका देते हैं। जो निहायत ही विमर्श के लिए खतरे की घंटी है कि हम विषय को नहीं चुन पाते।

भारत में श्रम कानून की स्थिति काफी पेचीदा बना हुआ है,जब मैंने श्रम मंत्रालय के वेबसाइट पर देखा तो कुल 45 श्रम कानून थे,ये ही नहीं हर राज्य के अपने भी कई क़ानून है। जिसे लागू करना टेढ़ी खीर तो है ही,साथ ही व्यापार सुगमता को भी चोट पहुंचाने वाला है। हालांकि अब सरकारें(केंद्र और कुछ राज्य सरकारें मसलन महाराष्ट्र और राजस्थान की) इन कानूनों में बदलाव के लिए गंभीर नजर आ रही है।

भारत में रोजगार असंगठित क्षेत्रों के अपेक्षा संगठित क्षेत्रों में काफी ही सुरक्षित है चाहे वह वेतन का मामला हो या सवेतन अवकाश का या बीमारी आदि से संबंधित मसला हो लेकिन यह जानकर आपको ताज्जूब होगा कि सबसे ज्यादा रोजगार लोगों को असंगठित क्षेत्र ही दिया हुआ है।(आँकड़े गूगल आदि पर देख सकते हैं।)

मजदूरी समस्या के समाधान और कारण ढूंढने पर अगर बहस को केंद्रित किया जाता है तो काफी ज्यादा फायदेमंद रहेगा! यहीं वह वजह है जिसकारण अगर सरकारी चपरासी की भी नौकरी के लिए आवेदन मंगाए जाते हैं या सफाईकर्मी के लिए भी तो भारी संख्या में आवेदनकर्त्ता(उत्तराखंड में 30 लाख) कतार में खड़े हो जाते हैं। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि न्यूनतम शिक्षा मैट्रिक रहने के बाद भी भारी संख्या में ग्रेजुएट और पीएचडी धारक आवेदन करते हैं। इसका वजह निजी उपक्रमों में मामूली वेतन को दरकिनार कर सरकारी सम्मनजनक वेतन और सुरक्षा की भावना को पाना होता है।

यहां एक और बातें निकलकर सामने आती है कि हम व्यक्ति को क्या बनाना चाहते हैं? एक काम करने वाला मजदूर(घोड़ा) या गरिमामय व्यक्तित्व? वास्तव में कमी कहां है कि आज के दौर में अधिकांश व्यक्तियों के लिए शिक्षा का मतलब जिंदगी की खुशी नहीं बल्कि अच्छी तनख्वाह पाना है और सफलता का मतलब नौकरी लेना है?

व्यक्तियों के पास न अपने जीवन का लक्ष्य है और न ही कोई दृष्टि(vision)। हम अपने अंदर एक ऐसे व्यक्तित्व का विकास क्यों नहीं करना चाहते जो हमें इस काबिल बनाये कि हम दूसरों को अपने यहां नौकरी दे सकें!

वजह साफ़ है! आराम की आदत लगती जा रही है,संघर्ष की इंसानी प्रकृति धूमिल होती जा रही है और हम नौकरी करके कार खरीदने और परिवार को चलाने को ही संघर्ष समझ बैठे हैं।

जबतक यह धारणा हमारे दिलों दिमाग से नहीं उतरती,हम एकांत में बैठकर कोई नई सोच,नई दृष्टि,नए विचार पर चिंतन नहीं करेंगे तबतक हमारी मानसिकता बदलने वाली नहीं है।

अब वह वक्त आ गया है कि रोजगार और नौकरी की बनी-बनायी धारणा को नेस्तानाबूद कर दें और दुनिया के सामने अन्यों की भाँती मिसाल कायम करें।

इसके लिए जरुरत होगी - साहस की,आपके संघर्ष करने की क्षमता की और उस नयी सोच की जिसे या तो आपने खोज लिया है या एकांत में मनन करके खोजा जाना अभी बाकी है!

यहीं वह वक्त है जिसके बदौलत आप आने वाले शताब्दी को अन्यों की भांति अपने नाम कर सकते हैं! ऐसा भरोसा करें कि अगर तसल्ली से और नियत से करें तो कल हमारा है!