Tuesday, 21 March 2017

Discourse - राम मंदिर विवाद को सबसे ज्यादा हवा वामपंथियों ने ही दी है!

         सुप्रीम कोर्ट के एक सुझाव के बाद रोजाना पत्र-पत्रिकाएं और टीवी डिबेट में राम मंदिर विवाद पर लेख,सुझाव,चर्चा और बहस की बाढ़ सी आ गयी है। वो जो इससे जुड़े हुए थे अब फिर से धरातल पर आकर बयानबाजी कर रहे हैं। अभी तक के वार्त्ताकारों से बस केवल कुछ ही बात निकलकर सामने आयी है जिसे देखकर लगता है कि राम मंदिर भूमि विवाद को कोर्ट के बाहर निपटाना बड़ी चुनौती साबित होगी।

          टीवी डिबेट और लेखों से कई बातें निकलकर सामने आ रही है जिसे वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी बीबीसी पर सुंदर शब्दों में इसप्रकार लिखे हैं,"पहली बात है कि ये किसी का व्यक्तिगत मुकदमा नहीं है। इसमें मुसलमानों की तरफ से शिया और सुन्नी सब शामिल हैं और हिन्दुओं की तरफ से भी सब संप्रदाय शामिल हैं। तो इसमें कोई एक व्यक्ति या एक संस्था समझौता नहीं कर सकती।

           दूसरी बात ये कि हिन्दुओं की तरफ़ से तर्क ये है कि रामजन्म भूमि को देवत्व प्राप्त है, वहां राम मंदिर हो न हो मूर्ती हो न हो वो जगह ही पूज्य है।वो जगह हट नहीं सकती।

            हालांकि कुछ लोग ये तर्क देते हैं कि कुछ मुस्लिम देशों में निर्माण कार्य के लिए मस्जिदें हटाई गईं हैं और दूसर जगह ले जाई गई हैं।

             वहीं हिन्दुस्तान के मुसलमानों का कहना है कि मस्जिद जहां एक बार बन गई तो वो क़यामत तक रहेगी, वो अल्लाह की संपत्ति है, वो किसी को दे नहीं सकते। इसलिए मुस्लिम समुदाय की तरफ से ये कहा जा रहा है कि अगर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट फ़ैसला कर दे तो हमें कोई ऐतराज़ नहीं हैं।"

              कई मुस्लिम वार्त्ताकार तो यहां तक कहते नजर आ रहे हैं कि हमने चूड़ियां नहीं पहन रखी है। मतलब स्पष्ट है किसी खतरनाक घटना की आहट सुनाई दे रही है। अभी तक कोर्ट के सुझाव के बाद हिंदू समाज की ओर से कोई आपत्तिजनक टिप्पणी नहीं की गयी है,इसे ध्यान में रखना जरूरी है और दोनों पक्षकार उग्र होने लगे तो स्थिति विस्फोटक हो सकती है।

कोर्ट के हालिया सुझाव से पहले की स्थिति कुछ इसप्रकार थी जिसे मैं काफी पहले अपने ब्लॉग में लिखा था-

      1767 में जोसेफ टीफेनथेलर ने अपने शोध में कहा कि बाबरी मस्जिद राम का जन्मस्थान है,हिन्दू रामनवमी के दिन वहाँ पूजा करने जाते थे,लेकिन औरंगजेब ने इस प्रथा को तोड़ दिया और एक अलग स्थान दिया। ब्रिटिश स्त्रोतों के अनुसार भी हिन्दू और मुस्लिम दोनों बाबरी मस्जिद परिसर में पूजा करने जाते थे। यह 1870 में लिखा गया था।

      ऐसे ही कई किताबों में यह दावा किया गया है कि बाबरी मस्जिद पहले राम मंदिर था। के.के. मोहम्मद,जिन्होंने वर्षों तक 'Archaeological Survey Of India' में काम करने के बाद अपनी किताब 'njan enna bhartiyan'(I AM INDIAN) में लिखे कि बाबरी मस्जिद राम मंदिर के अवशेष पर ही खड़ा है। लेकिन वामपंथी इतिहासकार इसे झुठलाते रहे। खासतौर पर इन्होंने इरफान हबीब और रोमिला थापर पर निशाना साधा। वह तो मात्र एक कोरा क्षेत्रीय झूठ था जिसे राष्ट्रीय झूठ बना दिया गया है।

      आखिर सच ही कहा गया है कि एक झूठ को बार-बार बोलने से वह सच हो जाता है। नाजीवादी नेता गोयबल्स की उक्ति को इन वामपंथियों ने बखूबी अपने जेहन में उतारा है। 'राष्ट्रवाद का अयोध्याकांड' नामक किताब में आशिस नंदी,जिसका अनुवाद अभय कुमार दूबे द्वारा किया गया है,ये वहीं दूबे जी हैं जो आजकल खबरिया चैनलों पर आम आदमी पार्टी का समर्थन करते रहते हैं;जैसा लिखते हैं,"अवध की संस्कृति में राम की मान्यता एक राष्ट्र-नायक के रूप में थी।" वाह-जी-वाह,बहुत खूब। ये अगले पन्ना 26 पर लिखते हैं तीस अक्टूबर 1990 को अयोध्या में एक सभा हुयी जिसमें RSS से जुड़े विभिन्न उग्र हिन्दू संगठनों(विश्व हिन्दू परिषद्,अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्,बजरंग दल) के सदस्य शामिल हुए। इन्होंने रामजन्मभूमि को मुक्त कराने की बात कही,जिसका मतलब था बाबरी मस्जिद के मौजूदा ढाँचे को गिराकर ठीक उसी जगह मंदिर बनाने के लिए कारसेवा करना,ताकि अतीत में हिंदुओं के साथ हुए अन्याय का बदला लिया जा सके।"

       यह निहायत ही सत्य है,इसे मानने में भी कोई गुरेज नहीं,लेकिन किताब में जिस उद्देश्य को बताया गया है वह शंका पैदा कर ही देता है। खैर.......

       अब एक मुख्य सवाल जो सोचने पर मजबूर करती है,वह कि संघ जिसका सरोकार कभी भी किसी मंदिर से नहीं रहा,इसने न कभी कोई मंदिर बनाया और न ही कभी प्रयास किया तो फिर कब,कैसे और क्या हो गया ?

       अयोध्या में पिछले कुछ दिनों से कारसेवकों का नारा 'रामलला हम आएँगे,मंदिर यहीं बनाएँगे' गूंजने लगा था। पुलिस का प्रतिरोध बढ़ने लगा था जिसे कम करने के लिए युवा कारसेवकों ने नया नारा लगाना शुरू कर दिया था कि 'हिन्दू-हिन्दू भाई-भाई,बीच में वर्दी कहाँ से आयी।'

      'बच्चा-बच्चा राम का,जन्मभूमि के काम का' का नारा ज्यादा खतरा प्रतीत करता नजर नहीं आ रहा था,लेकिन जब विवादित ढाँचे पर एक बंदर को देखा गया तो ऐलान कर दिया गया कि रामजी के सेवक अमर हनुमान हमारे साथ हैं। कारसेवक जो त्रिशुल और डंडे लिए हुए थे उनके पास गर्व से भर देने वाला एक संकल्प था कि हर हालात में 'राष्ट्रीय शर्म के प्रतीक' को ध्वस्त करना ही है। तब क्या था ? ओज और तेजस्वी भाषणों ने शौर्य भर दिया,न चाहते हुए भी हिन्दू एकता का प्रतीक दल कदमताल मिलाकर ढाँचे की और बढ़ने लगा। कारसेवकों के मस्जिद की तरफ उमड़ने से पूरा ट्रैफिक जाम हो गया। गिरफ्तार कारसेवकों से भरी सरकारी बसें रुक गयी। इसी समय एक पुजारी ने एक बस को हाईजैक कर लिया जिसमें कारसेवक भरे थे। यह साहसपूर्ण कार्य ने आगे का रास्ता साफ़ कर दिया। तुरंत ही खबर फ़ैल गयी कि अशोक सिंहल घायल हो गये हैं। जिस कारण आंदोलन उग्रता को धारण कर लिया।

       'पुलिस हमारा भाई है,उससे नहीं लड़ाई है' की नारा ने रास्ता को आसान कर दिया। बाद में पुलिस वालों को कहना था कि निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने का कोई तुक नहीं थी,अगर ऐसा होता तो पूरी संभावना थी कि यह एक भयंकर हत्याकांड में बदल सकता था। उसके बाद जो हुआ वो सब तो हम जानते ही हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय तो इस मामले को और पेचीदा कर दिया है अभी यह सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

      लेकिन अब उस सवाल का जवाब देने का वक्त आ गया है कि यह आंदोलन ऐसा उग्र रूप कैसे धारण कर लिया ?

      आऊटलुक नामक पत्रिका जो आजकल अपने को सेकुलर और प्रगतिशीलता का प्रवक्ता समझ रहा है,ने यह आरोप दोहराया कि जिन इतिहासकारों को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् में नियुक्त किया गया था,उन सभी ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया कि बाबरी मस्जिद बनने से पहले वहाँ राम मंदिर था। कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि यह आरोप सही था,तो इनसभी को दोबारा भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् में नियुक्त क्यों नहीं किया गया ?

      केंद्र में चंद्रशेखर की सरकार ने प्रमाणों के आधार पर मामला सुलझाने के लिए बैठकें आयोजित की थी। इन वामपंथी इतिहासकारों ने शुरू-शुरू में भाग लिया,उन्होंने दस्तावेज पेश किये। और यह जल्द ही जाहिर हो गया कि विश्व हिन्दू परिषद् ने जो ढेर सारे पुरातात्विक,ऐतिहासिक और साहित्यिक प्रमाण प्रस्तुत किये हैं,उनसे उन वामपंथी दस्तावेजों का कोई विरोध नहीं था। जिसकारण विहिप के केस की और अधिक पुष्टि हो गयी।(चंद्रशेखर जून 1991 तक प्रधानमंत्री रहे थे और ध्यान रहे बाबरी मस्जिद ध्वंस 6 दिसंबर 1992 को हुआ था)

      जब इसपर विचार करने के लिए प्रधानमंत्री ने दोबारा से बैठको को बुलाया तो ये सभी वामपंथी इतिहासकार उपस्थित ही नहीं हुए और दुम दबाकर भाग गए। इनके पीछे हटते ही सरकार की पहलकदमी नाकाम हो गयी।

       यह घटना,इस बात को प्रमाणित करने के लिए काफी है कि मस्जिद के गिराए जाने का मार्ग जितना इन इतिहासकारों के भाग खड़े होने के कारण प्रशस्त हुए उतना और किसी कारण से नहीँ। संघ परिवार के कार्यों से भी नहीं क्योंकि यह शुरू से ही शांतिपूर्ण समाधान चाहता था।

इति सिद्धम्!

सौजन्य के लिए देखें - वामपंथी इतिहासकारों का घिनौना करतूत और कपटजाल