Friday, 17 March 2017

FAQ - EVM का मायाजाल! - 7/1

हारने वाले राजनीतिक पार्टियों का आरोप कि EVM में छेड़छाड़ किया गया था इसलिए हम हार गए,कितना उचित है?
यह एक आश्चर्यचकित कर देने वाला बयान है। इस कतार में एक ऐसी भी पार्टी है जो इसी EVM से दिल्ली में ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। आपको सोचना चाहिए कि अगर वर्तमान विधान सभा चुनाव के हालिये परिणाम पर नजर देंगे तो यूपी में जितने वाली पार्टी अन्य राज्यों में हारना क्यों चाहेगी जबकि वह EVM प्रभावित कर सकती है।

जाहिर है ऐसे ही आरोप आडवाणी द्वारा भी 2009 में लगाए गए थे। शायद हार का हताशा हो या इस मशीन को आजमाया जाना बाकी हो। आज के दिन में कई राज्यों के चुनाव के बाद प्रमाणित किया जा चुका है कि इसमें कोई गड़बड़ी नहीं की जा सकती। इसे बकायदा चुनाव आयोग भी मान चुका है।

क्या EVM की जगह परम्परागत मतपत्रों की वापसी पर सोचना चाहिए?
अगर किसी के पास प्रमाण है कि EVM पारदर्शी चुनाव कराने में सक्षम नहीं है और इससे चुनावी प्रक्रिया,मतगणना आदि को प्रभावित किया जा सकता है तो जरूर! लेकिन अगर नहीं तो केवल भावनात्मक आधार पर मतपत्रों को अपनाना एक बेवकूफीपूर्ण कदम होगा क्योंकि हम शायद फिर से बूथ कैप्चरिंग, चुनावी प्रक्रिया के अपराधीकरण जैसे अपराधों से पीड़ित हो जाएं। इस तकनीक से काफी हद तक अंकुश लगाने में मदद मिली है।

उदाहरण दिया जा रहा है कि अमेरिका,जर्मनी,नीदरलैंड आदि जैसे कई देशों में EVM को प्रतिबंधित कर दिया गया,इसलिए भारत में भी किया जाना चाहिए। इस तरह का तुलना कहाँ तक उचित है?
इस सवाल के जवाब को जानने से पहले हम सोंचे कि क्या हम नकलची बनना चाहते हैं? शायद किसी का जवाब 'हाँ' में नहीं होगा। तो हम बार-बार उन देशों का उदाहरण क्यों देते हैं कि वो हमसे विकसित हैं और फिर भी EVM का इस्तेमाल नहीं कर रहे है?

हर समाज और राष्ट्र-राज्य की परिस्थति अलग-अलग होती है। यहीं कारण है कि हर जगह के चुनावी प्रक्रिया,क़ानून और व्यवस्था में भिन्नता पाई जाती है। आज जिस अमेरिका का उदाहरण दिया जा रहा है वहीं अमेरिका महिलाओं को वोट देने का अधिकार अपने आजादी के कई दशक बाद दिया लेकिन भारत संविधान लागू होने के साथ ही तो फिर क्या हम अमेरिका से इस मामले में बेहतर नहीं हुए? निश्चित रूप से हाँ! तो फिर क्या हम पूरी दूनिया को चुनावी प्रक्रिया के इतिहास में EVM के सही और टिकाऊ प्रयोग को करकर सीखा नहीं सकते? बिल्कुल! यह इसी का हिस्सा है। भारत की अपनी परिस्थिति है,अपने क़ानून हैं और अपनी व्यवस्था है,इसलिए हमें दूसरे से तुलना की क्या जरुरत? हम मिसाल कायम करेंगे कि भारत का EVM दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है और वे हमारे यहां से आयात कर सकते हैं।

जिन यूरोपीय देशों(डेनमार्क,नीदरलैंड आदि) में EVM को प्रतिबंधित कर मतदान पत्र को फिर से अपनाया गया है,उसका कारण यह है कि वे सभी कम्यूटर/इंटरनेट से जुड़े हुए थे और इनको एक ही कंपनी द्वारा बनाया जाता था। जिसे हैक और टेम्पर करना आसान था। एक भारतीय चुनाव आयुक्त के अनुसार जर्मनी का संविधान EVM के इस्तेमाल का अधिकार इस आधार पर नहीं देता है कि इसमें पारदर्शिता नहीं है। वहां का कोर्ट इसके तकनीक पर कोई टिप्पणी नहीं करता है। इसलिए यह सभी तुलना बेमानी हो जाती है। अगर कुछ बुद्धिजीवी भी इसके खिलाफ बहस में कुद पड़ते हैं तो इनकी मंशा पर ही सवाल उठाना लाजिमी हो जाता है।

भारतीय EVM अन्य देशों से अलग है तो कैसे?
ये जानकार आपको आश्चर्य होगा कि भारतीय EVM अपने आप में ही एक अलग मशीन है,एक का दूसरे से कोई संबंध नहीं है। चुनाव आयोग कह चुका है कि ये सारे टेम्पर्ड प्रूफ हैं और इन्हें प्रभावित नहीं किया जा सकता और चुनौती देता है कि कोई हमारे EVM को आकर प्रभावित करे!

इसमें किसी प्रकार के इंटरनेट से कोई जुड़ाव नहीं है इसलिए इसे हैक भी नहीं किया जा सकता। जब तक इसे खोला नहीं जाए तबतक ब्लूटूथ आदि से प्रभावित नहीं किया जा सकता जैसा कि आशंका जताया जा रहा है। अगर ऐसा होता भी है तो एक चुनाव में लाखों की संख्या में EVM मशीन का उपयोग किया जाता है,चुकी एक EVM एक अलग मशीन है तो आप कितने लोगों को रखकर प्रभावित करने का काम करेंगे! चुनाव आयोग यह भी कहता है कि कौन सा EVM कहां जाएगा किसी को मालूम नहीं होता,इसका वितरण रैंडमली किया जाता है। यह भी तथ्य है कि जिस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जाता है उसे केवल एक बार ही इस्तेमाल किया जा सकता है और अगर मशीन में एक बार इस्तेमाल हो गयी तो उसे निकाला नहीं जा सकता और इसके बारे में किसी को जानकारी नहीं रहता। इसके सुरक्षा के व्यापक प्रबंध भी होते हैं।

इसतरह उपर्युक्त चर्चा को देखकर आप सभी को लग गया होगा कि आरोप कितने बेबुनियाद हैं?