Friday, 31 March 2017

मेरी यादें - जातिगत भेदभाव के उपजने का एक अन्य कारण और निदान का एक उपाय!

मैं अपने अनुभव से दावे के साथ कह सकता हूँ कि जिन वजहों को मैंने महसूस किया,उनमें से अधिकांश को कइयों द्वारा आभास किया गया होगा और यहीं अनजान परंपरा सवर्ण और दलितों के बीच धीरे-धीरे नफरत और अस्पृश्यता की गंभीर समस्या बनती चली गयी।

मुझे याद है कि गाँव का ही एक दलित मेरे घर का नौकर हुआ करते थे और बचपन का मेरा समय इन्हीं के साथ गुजरता था। वो घर के अपने काम को कर लेने के बाद हमेशा मुझे खेलाया करते थे। मुझे यह याद नहीं है कि उनके द्वारा खिलाया गया तिलवा(भुजा हुआ चावल जिसे पिघले गुड़ में बांधकर गोलाकार बनाया जाता है) मेरे घर का ही रहता था या वे अपने घर से लाते थे। पर उस समय किसी तरह का कोई दिक्कत वाली बात नहीं थी क्योंकि मेरा दिमाग आज की भांति खांचों में नहीं बँटा था। लेकिन आज परिस्थितियां बदल गयी है,आधुनिकता इस कदर हावी हो गयी है कि कुछ दिनों तक उनके बेटे द्वारा मेरे घर में नौकर रूपी सहायक के तौर पर काम करने के बाद तब छोड़ दी गयी जब एक दलित मुखिया का चुनाव जीत गया और तबतक मेरे घर का कृषि वाला माहौल भी बदल गया था - गाय-भैसों का पालना बंद हो गया था और घर से पिताजी के प्रवासन(फ़ौज में) के कारण खेती का काम भी रुक गया।

पर एक बात जो लगभग आजतक नहीं बदली है - विशेष प्रयोजन पर एक खास दलित(चमार) का घर आना,अनवरत जारी है। न जाने कब से यह परंपरा चली आ रही है,लगभग हर सवर्ण परिवार के लिए गाँव का एक चमार आरक्षित है,जिसकी माँ या पत्नि या बेटी मेरे घर भी मेरे परिवार की महिलाओं का पूरे शरीर को दबाने और जब कोई घर में संतान का जन्म होता था तब साफ़-सफाई के लिए आया करती थी। एक प्रथा चली आ रही है कि जन्म देने वाली माता घर से कई दिनों तक बाहर नहीं निकल सकती है और वो अपने नित्यक्रिया संबंधी सारे कार्य घर में ही एक घड़े में कर लिया करती है जिसे वो दलित महिला जिसे देहातों में चमइन कहा जाता है,रोजाना फेंका करती हैं। पर ये बेकार का प्रथा आज धीरे-धीरे टूट रही है। जो दलित महिला कभी गर्व से कहती थी कि सभी सवर्ण इंसानों को मैंने पहली बार छुआ है वो आज मुझसे भेदभाव रख रहा है,यह सही भी है क्योंकि जन्म देने वाली माता तो उस दौरान बेहोश हो जाया करती है और सृष्टि में किसी भी सवर्ण को उसी दलित महिला द्वारा पहला स्पर्श मिलता है,लेकिन इस आत्मीय भरे संबंध को समाज में सही से आजतक उकेरा नहीं जा सका। आज स्थिति तो काफी बदल गयी है,जिस काम को देहातों में दलित महिलायें बखूबी कर देती थी,आज उसका स्थान अस्पतालों ने ले लिया है भले ही सुरक्षा के नाम पर आज अस्पतालों की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता लेकिन मेरा जन्म तो उसी दलित महिला के प्रयासों से हुआ है और पहला स्पर्श उसी का है जिसे नकारा नहीं जा सकता।

पर समाज या परिवार ने इस रहस्य को मुझे नहीं बताया। दलितों और सवर्णों के संतानों के बीच के इस आत्मीय संबंध को कभी भी फर्श पर नहीं लाया गया,दलितों के इस महत्व को नहीं बताया गया जिसकारण दोनों समुदायों के बीच खाई दिन-प्रतिदिन बढ़ती गयी।

आज दोनों के बीच विमर्श ही वह माध्यम है जिसके बदौलत समरस समाज का निर्माण हो सकता है। जबतक वे अपने घरों में महानता की बातें नहीं करेंगे,गरिमापूर्ण जीवन की चाह नहीं रखेंगे तबतक समाज में बराबरी का माहौल बन ही नहीं सकता। कितने भी कोशिश कर लिया जाए,क़ानून को कितना ही कठोर बना लिया जाए,सब बेकार ही साबित होगी। यह आपको कानूनी समानता तो दे सकती है लेकिन व्यावहारिक नहीं बल्कि ऐसा प्रयास नफरत को ही बढ़ाएगा,जिसे आप देख रहे हैं। ज़रा गौर कीजिए! जिस समाज में उन दलित समुदाय को रहना है,उसी समाज में सवर्णों को भी,इसकारण दोनों द्वारा दोनों को मान्यता देने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बनता क्योंकि दलितों का अस्तित्व तभी है जब वह महान हिंदू समाज का अंग है,इसके इतर वह देख चुका है कि इस्लाम और ईसाई अपनाने के बाद भी उन्हें दोयम दर्जे की स्थिति प्राप्त है। बौद्ध धर्म अपनाने के बाद भी आरक्षण की जरुरत पड़ रही है लेकिन बदला हुआ धर्म भी उनकी भेदभाव वाली स्थिति को बदल नहीं पाया। जब हर जगह उन्हें एक जैसा ही बरतावों का सामना करना पड़ रहा है तो बेहतर किसके लिए नहीं होगा कि हम अपने धर्म और अपने समुदाय में रहते हुए अपने अधिकारों की मांग करें?

आज के दौर में दलित समुदाय का अपनी साख बचाने का महान अवसर है जिसे गंवाना नहीं चाहिए,वो भी तब जब संघ जैसा मजबूत संगठन हिंदू समाज की एकता का बात करता हो। आज का माहौल तो सोने पर सुहागा जैसा है जिसे दलित समाज द्वारा भुला नहीं जाना चाहिए।

हमें यह भी भूलना नहीं चाहिए कि हिंदू तभी तक हैं,जबतक आपस में सूत्रबद्ध हैं। खाँचों में बंटी इस हिंदू समाज से जातियों का लोप कर 'वर्ण-व्यवस्था' को फिर से लाने जा वक्त आ गया है। जन्म आधारित जातिगत कट्टरता जो आज घर कर गयी है,उसे तोड़ने का वास्तविक वक्त है और दलितों को फिर से अपनी पूरी ताकत वर्ण-व्यवस्था को लागू करने में झोंक देना चाहिए ताकि वे अपनी बुद्धिमता और कौशल से ब्राह्मण या अन्य मनचाहा वर्ण स्वीकार कर सकें। जो परंपरा सैकड़ों वर्षों से रुक गयी है उसे फिर से सुचारू रूप से चलाना होगा ताकि जो सवर्ण आज वास्तव में दलित और पिछड़ा चरित्र को धारण कर लिए हैं तथा मांस और मदिरा का भक्षण करने लगे हैं,उन्हें दलितों के श्रेणी में रखा जाए। यह सब काम ग्रामीण स्तर पर,समुदाय स्तर पर हर वर्ण(वर्तमान जाति) से आया व्यक्ति करे और यह सुनिश्चित करे कि 'दलित रुपी ब्राह्मण'(ऐसा ब्राह्मण जो अपने कर्मों से दलित बन चूका है लेकिन फिर भी ब्राह्मण ही बने रहने को मजबूर है) हिंदू के लिए खतरा है और 'ब्राह्मण रुपी दलित'(अपने कर्मों से ब्राह्मण बन चूका है लेकिन फिर भी दलित बनकर रह रहा है) सशक्त हिन्दू समाज का परिचायक है।