Sunday, 26 March 2017

मेरी यादें - संघ की ओर रुझान और जातिगत भेदभाव का मेरे अंदर न जाने कैसे उपजना!

नब्बे के दशक का अमिताभ कट फुल-पैंट 2000 ईसवी की दसवीं वर्षगाँठ पर भी मेरे जेहन में जिंदा था,जब मेरी जिंदगी नयी करवट ली थी और मैं देहाती पृष्टभूमि से अचानक ही शहर की ओर अकेले ही उन्मुख हो गया था। उस पैंट की आज भी एकाध जोड़ी मेरे पास मिल जाएगी जिसके एक पैर की मोहरी में दोनों पैर आसानी से समा सकती है। वो एक ऐसा दौर था जब हम नयी दुनिया का अवलोकन कर रहे थे और मेरे सामने था - आधुनिकता,पारंपरिकता और कुछेक मध्यकालीन सांस्कृतिक पृष्टभूमि वाले लोगों की झलक!

लगभग 15-16 बसंत गुजारने के बाद नए शहर में जिंस जो आजकल आधुनिकता का प्रतीक सा बन गया है,मेरे लिए देखना एक नयी सी अनुभव थी। 600 रुपया किराए वाले बिना खिड़की के एक छोटे से कमरे से हमने(मैं और एक अन्य जिनकी पहचान गुमनाम रख रहा हूँ) सफर शुरू कर दिये। पर शायद मेरे घर के संस्कारों का ही यह परिणाम था कि हम नयी दुनिया को यथार्थवाद से इतर आदर्शवाद के चश्मे से देखते रहे और मिल रहे नए लोगों की वास्तविक स्वभाव को न समझने की भूल कर बैठे। जिसकी भारी खामियाजा जिंदगी की एक अहम मुकाम पर साल 2014 में मुझे चुकाना पड़ा!

मुझे बचपन का एक दौर याद आ रहा है जब मैं चौथी या पाँचवी में था और संघ द्वारा संचालित स्कूल 'सरस्वती शिशु मंदिर' में अध्ययनरत था। वहीं 2004 का दौर रहा होगा। उससमय संघ के बारे में मेरी समझदारी न के बराबर थी। फिर भी वाजपेयी का दोबारा सत्ता में न आना मुझे सदमा दे गया था! मुझे ये नहीं मालूम है कि क्यों? घर के लोग अनजान रहे लेकिन यह एक रहस्य है कि मैं कई दिनों तक अच्छे से खाना नहीं खा पाया था। मुझे याद है जब भी भाजपा और संघ से संबंधित कहीं भी कुछ भी बातें होती तो मैं अपना कान ठहरा देता था। भले ही उस दौरान मैं संघ के स्कूल में पढ़ता था लेकिन यह जानकार शायद आपको ताज्जूब हो सकता है कि इसका मूल ध्येय भारतीय संस्कृति पर केंद्रित था लेकिन संघ के बारे कई शिक्षकों(आचार्यजी) को भी अच्छे से जानकारी नहीं थी! इसमें विरोधाभास हो सकती है लेकिन मैं यह निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि स्कूल में हमें संघ से संबंधित विशेष जानकारी नहीं दी जाती थी,इस बारे में हमें सुनने को तब मिलता था जब बाहर से कोई वक्ता आते थे और हमें बताते थे। संघ द्वारा प्रायोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम 'प्राथमिक शिक्षा वर्ग' करने के बाद मेरी रुची संघ के कार्यों में काफी ही ज्यादा हो गयी जब मैं वहाँ से लगभग 500-600 रूपये की संघ संबंधित साहित्य खरीद कर लाया और पढ़ा। यह सातवीं कक्षा की बात है। राष्ट्रवाद,समाज सेवा और देश प्रेम की भावना उबाल लेने लगी थी।

उसी दौर में चौथी कक्षा में पढ़ने के दौरान ही एक बार एक शिक्षक एक छात्रा से पूछ रहे थे कि पटना में कहां-कहां घूमी? पटना,जो बिहार की राजधानी है मेरे घर से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर है,मैं कभी घूमने के उद्देश्य से दसवीं तक नहीं जा पाया और दसवीं के बाद जब मैंने कदम रखा तो उद्देश्य था - पढ़ाई!
छात्रा ने जवाब देते हुए कहा - बोरिंग रोड, नाला रोड और कंकड़बाग!

इस जवाब को सुनकर मेरे दिमाग में एक ही बात आया वो भी रात में सोते समय कि ये कैसा नाम है? शायद बोरिंग रोड में बोरिंग पानी दे रहे होंगे या ये बेची जा रही होंगी,कंकड़बाग में कंकड़ होंगे और नाला रोड के पास नाला होगा। बचपन का मन काफी मजाकिया अंदाज में बहुत कुछ सोच लिया करता है लेकिन सच्चाई काफी ही अलग होती है लेकिन उस दौर के लिए वहीं सबकुछ होता है।

एक अन्य बात जिसे मैं बताना चाहूँगा - जब मैं पहली और दूसरी कक्षा में था तो जाति-व्यवस्था के लिए आज की तरह किसी तरह का भेदभाव मेरे मन में नहीं था। चुकी मेरा अधिकांश समय स्कूल के बाद घर की चार-दीवारी में ही गुजरता था,शायद यहीं कारण हो लेकिन मैं यह खुद नहीं समझ पाया कि कब मेरे मन में जातिगत-भेदभाव घर कर गए और दसवीं तक अपने को एक ऊंच,आर्य और शुद्ध खून का वारिस मानने लगे। उन कक्षाओं के दौरान मुझे याद है कि मेरे पसंदीदा दोस्तों में कम से कम दो तो 'चमार' समुदाय से थे जो मेरे साथ ही बैठकर पढ़ा करते थे। उससमय बेंच और कुर्सी की व्यवस्था तो थी नहीं इसलिए नीचे बोरे की चाट पर हम एक-दूसरे के लिए जगह लूटने का काम रोजाना किया करते थे। चौथी के बाद मैं संघ के स्कूलों में आ गया और वे सरकारी स्कूलों में,दसवीं तक तो कभी-कभार बात होती रही लेकिन उसके बाद कभी मुलाक़ात भी नहीं हुई। शायद उनमें से एक तो आगे बढ़ा होगा क्योंकि उसकी आर्थिक पृष्टभूमि अच्छी थी लेकिन दूसरा जिसका परीक्षा में अंक मेरे जितना ही आया करते थे या तो वह मेरे बाद सेकंड या थर्ड आता था,वह दिहाड़ी मजदूर हो गया। जब मैं अपने द्वार पर बैठा रहता था तो मुझे याद है मैं रोजाना देखा करता था कि उसके पिताजी आधा सेर चावल खरीद कर ले जाया करते थे।

ऐसे ही एक दिन मैं एक किताब के लिए 'चमटोली'(दलित मोहल्ला) में बने उसके घर पहुंच गया,देखा कि आंगन में कुछ सुखी पत्तलें रखी हुई है और टूटी हुई खटिया पर रखे चादर पर कुछ सुखाया जा रहा है और धूप से बचने के लिए वह अपने दरवाजे के बीच में बैठकर शायद बथुआ का साग और चावल खा रहा है। मेरे घर में जाते ही वो सब अचंभित हो उठे,शायद उनके घर कोई पहली बार ब्राह्मण ने कदम रखा हो,पर मैं इस बात पर ध्यान नहीं दिया और पूछा कि ऐसे कैसे खा रहे हो और दाल कहाँ है?
उसकी माँ बोल पड़ी,"बबुआ,दाल खईला.. त.. अरसा हो गईल.. बा..!" तब तक वह खाना बीच में छोड़कर एक हाथ से किताब ला चुका था और मैं बिना बोले ही किताब लेकर वापस आ गया।