Saturday, 18 March 2017

My diary - जब मोदी मार्गदर्शक मंडल का सदस्य और योगी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होंगे!

योगी आदित्यनाथ भारतीय संस्कृति का वो नमूना हैं जिनके रगों में क्षत्रीय खून दौड़ रहा है और इस ओजस्वी खून को ब्राह्मण बुद्धि ने सींचा है और परिपक्व बनाया है। यहीं तो वर्ण-व्यवस्था की खुबसूरती है जिसमें एक क्षत्रीय,ब्राह्मण के सारे कर्तव्यों को करते हुए,गेरुआ वस्त्र धारण करकर भी शासन की बागडोर को संभाल सकता है। व्यक्ति की यहीं तो वह आजादी है कि एक वर्ण से दूसरे में स्वेक्षा से परिवर्तित हो सकता है। यहीं तो महर्षि मनु के धर्मशास्त्र की महानता है। मनुस्मृति कोई आलोचना की वस्तु नहीं बल्कि अपने समय की धरोहर है जिसे फिर से स्थापित करके वैदिक स्वर्णयुग को स्थापित किया जाएगा।



'यूपी में रहना होगा तो 'योगी-योगी' कहना होगा' - योगी आदित्यनाथ के समर्थकों के बीच इस तरह के नारे काफी उत्तेजना से लगाए जाते हैं। एक 2014 का दौर था जो आज भी चल रहा है जब 'नमो-नमो' और 'हर-हर मोदी,घर-घर मोदी' के नारों से जनमानस छाया हुआ था। राजनीति में दौर आया करते हैं और बदल जाते हैं। मोदी का संबंध जिस पार्टी से है वास्तव में वह व्यक्ति विशेष की पार्टी नहीं है बल्कि इसका एक मजबूत संगठनात्मक आधार है,भले ही एक समय में कोई व्यक्ति इस संगठन पर हावी हो जाए लेकिन वह हमेशा रहेगा यह कहना बचकाना ही होगा। एक समय वाजपेयी-आडवाणी काफी ताकतवर बताये जाते थे लेकिन आज के दिन में मोदी के उभार ने उनके व्यक्तित्व को कुछ हद तक धूमिल कर दिया है। इसकारण मोदी युग भी बदलेगा और इसका स्थान भी कोई लेगा,यह सार्वभौमिक सत्य है!

यूपी में मिली जबरजस्त जीत ने यह आशंका और बलवती कर दी है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा फिर से अपना झंडा लहरा देगी और 2022 के यूपी चुनाव में योगी के नेतृत्व में भगवा ध्वज पुनः अपना परचम स्थापित करेगा। अगर ऐसा हुआ तो 2024 तक प्रधानमंत्री मोदी 75 साल की सीमा पार कर जाएंगे और मार्गदर्शक मंडल का सदस्य बनकर रह जाएंगे। यहीं वह वक्त होगा जब योगी के उग्र हिंदुत्ववादी चेहरे को संघ गुजरात के बाद अपने एजेंडे के दूसरे प्रयोगशाला के रूप में देख रहा है - अगर राम मंदिर जैसे मुद्दे यूपी की धरती पर सुलझ जाते हैं तो योगी एक कद्दावर नेता के रूप में उभरेंगे और 2024 तक इनके समर्थक ''भारत में रहना होगा तो 'योगी-योगी' कहना होगा'' के नारों से भारत भूमि को पाट देंगे! और योगी को प्रधानमंत्री के तौर पर भारत के जनता के सामने लाया जाएगा।

यह शान की बात होगी! हिंदुत्व की जीत होगी! साथ ही भारतीय संस्कृति की वास्तविक जीत होगी कि एक गेरुआ वस्त्रधारी देश की बागडोर को संभाल रहा है। कुछ ऐसा ही होने वाला है जिसकी आभास समय की चक्र की भांति लगभग सभी को दिखाई दे रही है।

वास्तव में यह हिंदुत्व की जीत है! यह एक सच्चाई है कि कई मध्यवर्गीय परिवारों में अब धर्मनिरपेक्षता को जनतंत्र का एक महत्वपूर्ण मूल्य नहीं बल्कि कांग्रेसियों और 'फ़ैशनेबल कम्युनिस्टों' का ढकोसला समझा जाने लगा है। राजेश जोशी लिखते हैं,"अब संघ-बीजेपी को उनकी परवाह कहां है क्योंकि इस शब्द पर से भारतीयों का विश्वास उठाने की जो मुहिम बीस-पच्चीस साल पहले लालकृष्ण आडवाणी ने शुरू की थी उसका असर अब महसूस किया जाने लगा है।"

आडवाणी के असर को हम सभी भारतवासी आज महसूस कर रहे हैं। ठीक इसी तरह मोदी के असर को हम आने वाले भावी 'योगी युग' में देखेंगे और स्थापित होते महसूस करेंगे। तभी मोदी के विकासवादी एजेंडे और योगी-संघ के हिंदुत्व के बदौलत 'स्वर्णिम वैदिक युग' को स्थापित किया जा सकेगा!