Saturday, 11 March 2017

अमित शाह भाजपा के चाणक्य!

जब शाह को भाजपा का अध्यक्ष चुना गया था तो मैंने अपने ब्लॉग में 25 जनवरी,2016 को लिखा था,"मेरा मानना बिल्कुल ही अलग है,इस बार शाह को साहस और क्षमता का इनाम मिला है। राजनीति में हार-जीत का सिलसिला तो चलते रहता है। ऐसा बात नहीं है कि शाह की रणनीतियाँ कुंद हो चली है,जैसा कि आलोचक कह रहे हैं। शाह को मालूम है कि पार्टी को असली चुनौती उत्तर-प्रदेश,उत्तराखंड,पंजाब और गुजरात में मिलेगी,जहां इनका संगठन क्षमता एक बार फिर दाव पर होगी। उल्लेखनीय है कि सफलता के समय लोग डुगडुगी बजाना शुरू कर देते हैं और असफलता के वक्त अपने भी चेहरा मोड़ लेते हैं। तो भविष्य बताएगा कि इतने सारे अनुभव लेने के बाद शाह की रणनीति आगामी चुनाव में कहाँ टिकती है?"

भाजपा को विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक दल बनाने वाले अमित शाह को पार्टी ने एक बार फिर अपना अध्यक्ष चुन लिया था। इस मौके पर नरेंद्र मोदी ने कहा था,"अमित भाई के पास जमीनी स्तर पर काम करने के अलावा संगठन का भी अपार अनुभव है। पार्टी को इसका बहुत ज्यादा लाभ मिलेगा।"

अमित शाह को तीन साल के लिए पार्टी की कमान सौंपी गयी है हालांकि औपचारिक रूप से यह उनका पहला कार्यकाल है। अब तब वे राजनाथ सिंह के बचे हुए कार्यकाल का जिम्मेवारी संभाल रहे थे। ऐसा संभावना है कि अगले कार्यकाल के लिए भी इनका दरवाजा खुल गया है क्योंकि वर्तमान कार्यकाल जनवरी 2019 तक होगा और उसी साल लोकसभा चुनाव होंगे। सामान्यतः चुनाव के वक्त अध्यक्ष नहीं बदला जाता।

भाजपा के अध्यक्ष चुनाव के दौरान वरिष्ट नेता दूर रहे थे। ये इससे पहले बिहार चुनाव के दौरान भी अपनी नाराजगी जताए थे। कहा जा रहा है कि शाह का चुनाव निर्विरोध हुआ है,लेकिन मार्गदर्शक मंडल के सदस्यों को न शामिल होना प्रश्न-चिह्न लगा देता ही है?

अगर सारी बहसों को हटाकर निष्पक्ष रूप से इनका विश्लेषण किया जाए तो शाह ने अपने 18 महीने के कार्यकाल में पार्टी को काफी ऊंचाइयां दी थी और आज तक वो उंच्चाई दी जिसकी कल्पना भी करना मुश्किल था।

लोकसभा चुनाव के दौरान जब शाह ने उत्तर प्रदेश में 73 सीटें जितायी तो ऐसा माना गया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नजदीकी का इनाम पहले अध्यक्ष के दौरान मिला। कुछ सच्चाई भी होगी लेकिन सफलता अपने साथ कुछ तो लाती है। यह तो जगजाहिर है।

लोकसभा चुनाव के बाद भी इनके सामने कठिन चुनौतियां थी। महाराष्ट्र,हरियाणा,जम्मू-काश्मीर और झारखंड में भाजपा का झंडा लहराकर अपनी क्षमता को फिर से साबित कर दिया था। 2015 की शुरुआत में दिल्ली में करारी हार और साल के अंत में बिहार के चुनाव में ऐतिहासिक हार के बाद इनको कई आलोचनाओं सामना भी करना पड़ा क्योंकि बिहार चुनाव भाजपा और मोदी के प्रतिष्ठा का विषय था और साथ ही माइक्रो स्तर से तैयारी और बागडोर इन्होंने अपने हाथों में लिया था।

अब अमित शाह के रणनीति को सही ठहराने का वक्त आ गया है,जब उत्तर प्रदेश,मणिपुर,उत्तराखंड और गोआ में सम्मा नजनक स्कोर पाकर विरोधियों को चारों खाने चित कर दिया। आज हर जगह शाह की शह की डुगडुगी जोरों से बजाई जा रही है।