Saturday, 4 March 2017

Discourse/social issue - क्या हम इतने परिपक्व हैं कि सेंसर बोर्ड जैसे संस्थान के बिना रह सकेंगे?

('लिपस्टिक अंडर माय बुरका' - बुर्का पहने कॉलेज गर्ल, एक जवान ब्यूटीशियन, तीन बच्चों की मां और एक 55 वर्षीय विधवा जो अपनी कामुकता को तलाश रही है और फिल्म की कहानी इन्हीं चार महिलाओं के इर्द-गिर्द घूमती है।)

कुछ वर्षों से 'फिल्म प्रमाणन बोर्ड' अर्थात सेंसर बोर्ड पर आरोप लगाया जा रहा है कि यह अभव्यक्ति की आजादी और रचनात्मकता पर आघात कर रहा है।

जेम्स बांड की एक फिल्म से जब किसिंग सीन पर कैंची चलायी गयी तो अच्छे-अच्छे विद्वान लोग सेंसर बोर्ड को कहने लगे भारत में संस्कारी जेम्स बांड चाहिए। मजाक बनाने की हद तो तब हो गयी जब पहलाज निहलानी ने 'संस्कारी' नाम से एक फिल्म बनाने का पंजीकरण अपने नाम से कराया। ऐसे ही अनुराग कश्यप की फिल्म 'उड़ता पंजाब' के कई सीन पर कैंची चलाने की बात कही गयी लेकिन वे कोर्ट द्वारा कुछ बदलाव के साथ फिल्म रिलीज कराने में सफल रहे।

इसके बाद तो पूरे फिल्म जगत के कुछ शख्सियतों और कुछ पत्रकार तथा साथ ही कुछ राजनीतिक नेता भी इस सेंसर बोर्ड के बहाने मौजूदा भाजपा नीत केंद्र सरकार और संघ को घेरने से नहीं चूके। यह विचारधारात्मक विरोध हो या कुछ और ये अलग बहस का विषय है लेकिन जो ज्वलंत सवाल उभर कर आ रहा है वह कि जब ऐसे संस्थान को लगता है - इनकी मंशा किसी धर्म,समुदाय विशेष को आघात पहुंचाने की है और यह नैतिकता की कसौटी पर खरी नहीं उतर रही है तो कुछ प्रतिबंध लगाना उचित नहीं है क्या?

ज़रा सोचिए और एक ऐसे समाज की परिकल्पना कीजिये जहां कोई रेगुलेटर नहीं हो और कोई नियंत्रणकर्त्ता नहीं हो,उस समाज की हालत क्या होगी?

लोग मनमानी करने लगेंगे और अपनी घठिया विचारों को अभव्यक्ति की दुहाई देकर सही ठहराने का प्रयास करेंगे और साथ ही देश विरोधी हरकत हो असहमति के हक़ के आधार पर जस्टिफाई करेंगे!

हाल में ही एक फिल्म को लेकर बहस परवान पर है जिसका नाम है - 'लिपस्टिक अंडर माय बुरका' जिसमें महिलाएं अपनी यौनिकता(sexuality) की तलाश कर रही है।

सेंसर बोर्ड की स्थापना 1952 में सिनेमेटोग्राफी अधिनियम के तहत किया गया है। यह 1991 के दिशानिर्देशों के आधार पर प्रमाणपत्र जारी करता है जो कहता है,

 "फिल्म को संवेदनशील और समाज के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। उसकी रचनात्मक आजादी और कलाकारों की अभिव्यक्ति को बिना वजह सीमित नहीं करना चाहिए। प्रमाणन करते समय सामाजिक बदलावों को ध्यान रखा जाना चाहिए और इसका सौंदर्यबोध कुछ ऐसा हो कि यह स्वच्छ और साफ सुथरा मनोरंजन करे।"

कुछ समय पहले श्याम बेनेगल के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया गया था जिन्होंने कहा कि सेंसर बोर्ड का काम नैतिकता तय करना नहीं है। ऐसे ही कई सिफारिश किया गया है लेकिन यह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में है। अगर आप पढ़ेंगे तो पाएंगे कि रिपोर्ट बड़े ही समझदारी से तैयार की गयी है,इसी में एक प्रावधान है कि चेतावनी जारी कर फिल्म देखने और न देखने का जिम्मा दर्शक पर छोड़ दिया जाए।

लेकिन सवाल यह है कि जब कोई फिल्म सिनेमेटोग्राफी अधिनियम का उल्लंघन करती है तो सेंसर बोर्ड को यह अधिकार बनता है कि वो फिल्म पर संज्ञान ले। 'लिपस्टिक अंडर माय बुरका' जिसका ट्रेलर 14 अक्टूबर,2014 को जारी किया गया था और टोक्यो तथा मुंबई फिल्म फेस्टिवल में इसका प्रीमियर दिखाया गया। साथ ही यह फिल्म स्पिरिट और एशिया प्राइज तथा बेस्ट फिल्म का ऑक्सफेम अवार्ड भी लिंग समानता के लिए जीत चुकी है।

लेकिन सेंसर बोर्ड ने जनवरी 2017 में इसे दिखाने का प्रमाणपत्र देने से यह कहते हुए मना कर दिया,"The story is lady oriented, their fantasy above life. There are contanious [sic] sexual scenes, abusive words, audio pornography and a bit sensitive touch about one particular section of society."
("कहानी महिला उन्मुख(आधारित) है जिसकी कल्पना जीवन के ऊपर है। वहाँ यौन दृश्यों, अपमानजनक शब्द, ऑडियो अश्लील साहित्य धारण किये हैं और समाज के एक खास वर्ग के बारे में थोड़ा संवेदनशील स्पर्श कर रहे हैं।")

विकिपीडिया इस फिल्म का आधार इस प्रकार बताता है," The film story revolves about four women - burqa-clad college girl, a young beautician, a mother of three and a 55-year-old widow who rediscovers her sexuality."
( बुर्का पहने कॉलेज गर्ल, एक जवान ब्यूटीशियन, तीन बच्चों की मां और एक 55 वर्षीय विधवा जो अपनी कामुकता को तलाश रही है और फिल्म की कहानी इन्हीं चार महिलाओं के चारों तरफ घूमती है।)

बिजनेस स्टैंडर्ड में छपी एक लेख के द्वारा वनिता कोहली कहती हैं,"मेरे अनुसार तो बहुत ही बकवास फिल्म है। जिसमें महिलाएं अपने सेक्सुअलिटी की तलाश कर रही है। ऐसे में अगर शीर्ष पर बैठे व्यक्ति को लगता है कि यह देश के तमाम दर्शकों के लिए अनैतिक है तो कहने के लिए कुछ रह ही नहीं जाता।"

इसलिए आप खुद तय कर लें कि सेंसर बोर्ड जैसे संस्था की जरुरत है या नहीं? अगर नहीं तो क्या हम इतने परिपक्व हो गए हैं?