Wednesday, 29 March 2017

मेरी यादें - जातिगत भेदभाव का उपजना और शुद्ध खून की अवधारणा का मस्तिष्क के एक कोने में प्रवेश! -2

समाज से अपने को अलग-थलग रखना,रहन-सहन में अंतर और उतने गंदे जानवर को खाने के कारण मेरे अंदर की सहानुभूति धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। ऐसा आप पिछले आलेख में पढ़ चुके हैं। शहर से गाँव वापस आ गया हूँ और यहां का समाज मुझे शहर से ज्यादा जातियों में कठोरता से बँटा हुआ नजर आ रहा है,जिसे मैं आभास कर रहा था। आखिर किस तरह मेरे अंदर ऐसे भावना घर करते चले गए कि हम श्रेष्ठ हैं और शुद्ध खून का वारिस हैं,इसका मुझे एक नहीं कई कारण नजर आते हैं जिसे मैं चौथी से लेकर दसवीं तक महसूस करता रहा हूँ।

पहले आलेख में आप सभी पढ़ चुके हैं,"जब मैं पहली और दूसरी कक्षा में था तो जाति-व्यवस्था के लिए आज की तरह किसी तरह का भेदभाव मेरे मन में नहीं था। चुकी मेरा अधिकांश समय स्कूल के बाद घर की चार-दीवारी में ही गुजरता था,शायद यहीं कारण हो लेकिन मैं यह खुद नहीं समझ पाया कि कब मेरे मन में जातिगत-भेदभाव घर कर गए और दसवीं तक अपने को एक ऊंच,आर्य और शुद्ध खून का वारिस मानने लगे। उन कक्षाओं के दौरान मुझे याद है कि मेरे पसंदीदा दोस्तों में कम से कम दो तो 'चमार' समुदाय से थे जो मेरे साथ ही बैठकर पढ़ा करते थे। उससमय बेंच और कुर्सी की व्यवस्था तो थी नहीं इसलिए नीचे बोरे की चाट पर हम एक-दूसरे के लिए जगह लूटने का काम रोजाना किया करते थे। चौथी के बाद मैं संघ के स्कूलों में आ गया और वे सरकारी स्कूलों में,दसवीं तक तो कभी-कभार बात होती रही लेकिन उसके बाद कभी मुलाक़ात भी नहीं हुई। शायद उनमें से एक तो आगे बढ़ा होगा क्योंकि उसकी आर्थिक पृष्टभूमि अच्छी थी लेकिन दूसरा जिसका परीक्षा में अंक मेरे जितना ही आया करते थे या तो वह मेरे बाद सेकंड या थर्ड आता था,वह दिहाड़ी मजदूर हो गया।"

चौथी कक्षा में मैं संघ के स्कूल में चला गया। धीरे-धीरे उम्र के बढ़ने के साथ समाज के लोगों से मिलना शुरू हुआ और घर की चारदीवारी छोटी पड़ने लगी। छोटे स्तर पर विमर्श का दौर शुरू हो गया। संघ द्वारा नियंत्रित और इसके एक अनुषंगी संस्था विद्या भारती द्वारा संचालित स्कूल 'सरस्वती शिशु मंदिर' ने मेरे व्यक्तित्व का बहुमुखीयकरण करना शुरू कर दिया। इस स्कूल में किसी के बारे में मैं कभी नहीं जान पाया कि कौन किस जाति और समुदाय से ताल्लुकात रखता है,इसका कारण था आपस में सभी को भैया-बहन जैसे संबोधनों से बुलाना। इस संबोधन के इस्तेमाल करने में किसी को कोई झिझक नहीं होती थी क्योंकि सभी आचार्यजी द्वारा भी ऐसा किया जाता था।

संघ के स्कूल का समाज समरसतापूर्ण था। भोजन मंत्र के बाद हम कई दिन आपस में ही गोलबंद होकर खाना खाते थे। भले ही स्कूल में संस्था द्वारा जातिगत भेदभाव को मिटाने का कठोर प्रयास किया जा रहा था लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि छात्रों के आतंरिक मन में कुछ भेदभाव तो था ही,पर इसे संस्था में किसी द्वारा खुलकर स्वीकार नहीं किया जाता था,बस केवल आपस का मसला था। इसे नकारा नहीं जा सकता था क्योंकि यहां आने वाले छात्रों का संबंध कई गांवों के भिन्न समाजों से था।

मेरे मन में पहली बार अश्पृश्यता का भाव नहीं,भेदभाव का भाव नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से भिन्न मत एक ऐसे मौके पर आया जब मेरे गाँव के मुखिया चुनाव में एक ब्राह्मण उम्मीदवार को एक दलित उम्मीदवार ने मात्र 12 मतों से हरा दिया। इतने कम वोट से हारने के बाद विपक्षी कभी भी इसे स्वीकार नहीं कर सकते वो भी तक जब ऐसा मानकर चला जा रहा था कि ये ब्राह्मण उम्मीदवार आसानी से जीत जाएंगे। ऐसे में ये सारे कानूनी तरीकों का इस्तेमाल तो किये लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ और पांच साल गुजर गए।

जब मैं पाँचवी में था तो मुझे सबसे ज्यादा दुःख और हताशा तब हुआ जब जीत का जश्न मनाने को लेकर दलित समुदाय द्वारा जुलुस निकाला गया,मुझे ऐसा लगा जैसे मानो पूरा का पूरा दलित समुदाय ही गाँव के कच्ची सड़कों पर उतर आया हो। गाँव की शाम काले और अर्द्ध नग्न लोगों के जयकारों से पाट दी गयी। यह सब तो ठीक था,कोई भी करता लेकिन जीत के नशे में राजपूत-ब्राह्मण के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल किया गया और फब्तियां कसी गयी,वह मेरे लिए नागवार गुजरा और सीधे-सीधे बचपन का मन समाज को दो खेमों में देखने लगा।

हमेशा की तरह मेरे द्वार पर लोगों का जमवाड़ा लगता रहा। बढ़ती उम्र ने मेरी भी दिलचस्पी इनलोगों के बातों को सुनने में बढ़ा दी। मैं रोजाना शाम को लालटेन की रोशनी में पढ़ने के क्रम में उनकी बातों को भी सुनता रहा। जाहिर सी बात थी जिसमें शामिल होने वाले लोग सभी के सभी सवर्ण थे और बात को एकतरफा तथा पूर्वाग्रह पीड़ित होकर किया करते थे। और अपने द्वारा कहे बातों को दैवीय इच्छा तथा पुनर्जन्म के सिद्धांत पर सही ठहरा देते थे। धीरे-धीरे मुझे गर्व होने लगा कि कथित बड़े घराने में मेरा जन्म ईश्वर की इच्छा से हुआ है। ऐसा होना लाजिमी भी था क्योंकि इन एकतरफा बातों को संतुलित करने के लिए दलितों का बात रखने वाला और उनकी समस्याओं को बताने वाला वहाँ कोई भी दलित मौजूद नहीं रहता था। हर रोज शाम को हमारी महानता की बातें होती थी,समाज और युद्ध तथा संकट के दिनों में किये गए कारनामों की बात होती थी जिससे शुद्ध खून की अवधारणा का विकास मेरे जेहन में धीरे-धीरे होने लगा।

वह एक ऐसा दौर था जब रास्ते से कोई भी दलित गुजरता था तो किसी का हिम्मत नहीं था कि वह किसी सवर्ण पर आँख उठाकर भी देख दे। नजरें नीचे हमेशा झुकी रहती थी। बात करना तो दूर की बात थी। इसी स्थिति में मेरी परवरिश हुयी।

जिसतरह सवर्ण के साथ कोई भी दलित अपने पक्ष को नहीं रख पाता था,ठीक उसीतरह दलित समुदाय भी जब आपस में बातें करते होंगे तो उनके बीच सवर्णों का पक्ष रखने वाला कोई नहीं रहता होगा और वे अपने दुःख,दर्द,समस्याओं और परेशानियों का ही चर्चा हमेशा किया करते होंगे जिससे उनसभी के मन में नकारात्मकता का प्रसार हो जाता है,यह क्रम सदियों से चलता आ रहा है जिसकारण यह एक जटिल आनुवांशिक समस्या हो गयी है। यहीं वह कारण है कि ये अपने को समाज के अन्य वर्णों से नहीं जोड़ पाते और अपनी एक अलग दुनिया बसाकर अलग मोहल्ला स्थापित कर लेते हैं तो विमर्श कहाँ से होगा?

बचपन के दिनों में मैं कभी भी उनके वास्तविक समस्या को नहीं समझ पाया। अपनी महानता और त्याग की कथा सुनते-सुनते,दैवीय इच्छा के कारण मैं अपने को शुद्ध खून का वारिस समझने लगा।

मुझे याद आता है कि किसतरह जब मैं पांचवीं-छठी कक्षा के दौरान कभी-कभी दलित मोहल्ले से गुजरता था तो वे सभी मुझे ऐसे देखते थे जैसे कभी कोई इंसान देखे ही नहीं है। उनकी दशा बद से बदतर होती थी,गंदगी चारों तरफ फ़ैली रहती थी और अपने यहां आने वाले रास्ते पर ही सुबह रोजाना नित्यक्रिया से निपटा करते थे। यह दूसरा वजह था जिस कारण मैं और गाँव के अन्य लोग दलित मोहल्ला में कदम नहीं रखते थे। वजह जो भी हो लेकिन उनकी मजबूरी थी कि उनके पास जमीन ही नहीं है,इसकारण वे दुसरे के खेतों में डर के कारण नहीं जाते थे।

मेरे गाँव के दलितों का जुड़ाव भाकपा(माले) से धीरे-धीरे गहरा होता गया था। गाँव में हथियारों का सप्लाई बढ़ गयी थी।और ये कभी भी एकजूट होकर झगड़ा करने को उतावले हो जाते थे। यह वह दौर था जब मैं आठवीं में था। यह हवा जोरो से चल रही थी कि अगर कोई भी सवर्ण अपने खेतों में फसल को अपने मेहनत से उगा रहा होगा तो पार्टी वाले आएंगे और लाल झंडा गाड़कर सारे फसल को काटकर ले चले जाएंगे जिसमें इन दलितों का हाथ भी होगा। यह अन्य वजह रहा जो नफरत के भाव को बढ़ाता रहा क्योंकि यह मेरे नजर में एक ढबे समुदाय द्वारा बाहरी शक्तियों के कारण सवर्णों पर ज्यादती थी। जिसे कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता था। इसीकारण सवर्णों ने रणवीर सेना जैसे कुख्यात संगठन को तहे दिल से स्वीकार किया। हालांकि मेरी वैचारिक मतभेद ही रही।