Monday, 27 March 2017

मेरी यादें - जातिगत भेदभाव का उपजना और शुद्ध खून की अवधारणा का मस्तिष्क के एक कोने में प्रवेश! -1

"'सुरेश',वह चमार है!"
"कैसे मालूम चला? मुझे तो लग नहीं रहा है।"
"लगने से क्या होता है,मुझे मालूम है।"

यह संवाद है झारखंड के एक शहर जमशेदपुर का! जब मैं वहाँ दूसरी कक्षा के दौरान मात्र छः महीने के लिए गया था और मेरे क्वाटर के ऊपर वाले क्वाटर में एक शख्स रहते थे जिन्होंने मुझे उस लड़की का परिचय इसी रूप में दिया हुआ था। ताज्जूब की बात है कि बिना पूछे! शायद उन्हें मालूम चल गया होगा कि हमलोग ब्राह्मण है। लेकिन एक बात तय है कि वह बिल्डिंग सामाजिक समरसता का एक मिसाल था जिसमें लगभग हर जाति और धर्म के एकाध परिवार रहते थे।

उस पूरे कॉलोनी में बहुत से परिवार रहते थे और उसी में उस लड़की का परिवार भी जिसका ताल्लुकात एक दलित परिवार से था,जिसकी जानकारी मुझे हाल में ही प्राप्त हुई थी। जाहिर है उससमय तक मेरे मन में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था भले ही गाँव की ग्रामीण पृष्टभूमि में 'चमटोली' के नाम से चर्चित दलित मोहल्ला को शायद सभी ओछी नजरों से देखा करते थे। लेकिन फिर भी मुझे विश्वास नहीं हुआ था कि वह लड़की चमार है क्योंकि उसमें और बाकियों में मुझे कोई अंतर नहीं लग रहा था। भले ही उसका रंग सांवला था लेकिन उस समय समाज में नए फैशन के रूप में आया 'बॉब कट' बाल उसकी सुंदरता को बढ़ा देता था। उसकी सुंदरता को देखने में शायद किसी को गुरेज नहीं था क्योंकि जब वह निकलती तो सबकी एकटक निगाहें उसके चेहरे पर टिक जाया करती थी। सामाजिक भेदभाव का पहला नजारा,वो भी शहर में,उस छोटी उम्र में मुझे देखने को मिल गया था!

उस परिवार के चमार होने की बात की जानकारी मिलने के बाद मैंने देखा कि वह किस प्रकार हमसे भिन्न है। परिणाम बहुत ही आश्चर्यचकित करने वाले थे।

उस बिल्डिंग के बाहर बहुत ही बड़ा खुला क्षेत्र था जो छोटे-छोटे पत्थरों से भरा हुआ था और कहीं-कहीं बालू भी दिखाई दिया करते थे और हमारे सामने लगभग 150 मीटर को दूरी पर ऐसे ही संगठित तरीके से दूसरा बिल्डिंग था,कुल मिलाकर शहरीकरण का विकास नियमानुसार ऐसा किया गया था कि सभी को पर्याप्त हवा,धूप और पानी मिल जाए!

उस लड़की,जिसका नाम मुझे नहीं मालूम क्योंकि मैं कभी बात नहीं किया,जिसकी सुंदरता से लगभग सारा कॉलोनी प्रभावित था,मुझे लगा कि ये(दलित) अपनी सामाजिक स्थिति के लिए खुद ही जिम्मेवार है। पत्थरों से भरे उस खुले क्षेत्र में कॉलोनी के सारे लोग निकलकर बाहर ही ब्रश से अपने दाँतों को साफ़ किया करते थे,सभी लगभग आपस में बात किया करते थे लेकिन वह लड़की और उसका परिवार किसी से नहीं! देखने से पहली नजर में ही लगता था कि वे अलग-थलग हैं। आर्थिक स्थिति हमसभी के बराबर होने के बाद भी वे अपनी मानसिकता को नहीं बदल पाए थे कि हममें और किसी में कोई अंतर नहीं है,हर मनुष्य की बराबर गरिमा है,पर वे शायद अपने को नीच मानकर वहाँ मौजूद समाज से कटे रहे। यहीं वह मूल कमी है जो सदियों से उनको सामाजिक रूप से हाशिये पर कर दिया। यह जगजाहिर तथ्य है कि अगर आप अपनी बात अन्यों के पास नहीं पहुंचाएंगे तो स्वतः हाशिये पर चले जाएंगे,जिसकी झलक आपसभी आज के राजनीतिक परिदृश्यों में देखते होंगे!

एक बार मेरी नजर उस लड़की के पिताजी पर चली गयी जो कभी-कभार ही घर से बाहर निकला करते थे,शहरों में रहने के बावजूद भी न कोई अच्छा पहनावा था और न ही अपने को डूसरे के समकक्ष ला खड़े करने की ललक! हद तो तब हो जाती थी जब सुबह सभी के सामने लूंगी लपेट कर ही आकर मुँह धोने लगते थे। काला चिपचिपा शरीर बहुत ही बकवास लगते थे। उनसभी(दलित समुदाय) को सामाजिक रूप से कटने का यह दूसरा कारण हो सकता है।

मुझे याद आ रहा है,जब पूरे कॉलोनी में एक बात फैल गयी कि आज उसके घर 'पोर्क'(सुअर का मांस) पकाया जा रहा है। आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि इस स्थिति में इतने गंदे जानवर को खाने वाले से समाज का अन्य तबका उनसे ताल्लुकात रखेगा? इस घटना के बाद तो मेरे मन में जो सहानूभूति उनलोगों के प्रति थी वो धूमिल होती चली गयी।

इस घटना के कुछ दिनों बाद ही मैं वापस गाँव आ गया और फिर कभी भी वहाँ नहीं जा पाया। लेकिन एक बात तय थी कि उस समुदाय के प्रति मामूली सी ही गलत धारणा मेरे मन में घर कर गयी थी।

अन्य कई वजहें रही जो किसी-न-किसी रूप में मेरे मानसिकता को उनके प्रति बदलती रही जिसका अनुभव मुझे गाँव में मिला। जिसे आपसभी अगले आलेख में पढ़ सकते हैं!