Friday, 31 March 2017

मेरी यादें - जातिगत भेदभाव के उपजने का एक अन्य कारण और निदान का एक उपाय!

मैं अपने अनुभव से दावे के साथ कह सकता हूँ कि जिन वजहों को मैंने महसूस किया,उनमें से अधिकांश को कइयों द्वारा आभास किया गया होगा और यहीं अनजान परंपरा सवर्ण और दलितों के बीच धीरे-धीरे नफरत और अस्पृश्यता की गंभीर समस्या बनती चली गयी।

मुझे याद है कि गाँव का ही एक दलित मेरे घर का नौकर हुआ करते थे और बचपन का मेरा समय इन्हीं के साथ गुजरता था। वो घर के अपने काम को कर लेने के बाद हमेशा मुझे खेलाया करते थे। मुझे यह याद नहीं है कि उनके द्वारा खिलाया गया तिलवा(भुजा हुआ चावल जिसे पिघले गुड़ में बांधकर गोलाकार बनाया जाता है) मेरे घर का ही रहता था या वे अपने घर से लाते थे। पर उस समय किसी तरह का कोई दिक्कत वाली बात नहीं थी क्योंकि मेरा दिमाग आज की भांति खांचों में नहीं बँटा था। लेकिन आज परिस्थितियां बदल गयी है,आधुनिकता इस कदर हावी हो गयी है कि कुछ दिनों तक उनके बेटे द्वारा मेरे घर में नौकर रूपी सहायक के तौर पर काम करने के बाद तब छोड़ दी गयी जब एक दलित मुखिया का चुनाव जीत गया और तबतक मेरे घर का कृषि वाला माहौल भी बदल गया था - गाय-भैसों का पालना बंद हो गया था और घर से पिताजी के प्रवासन(फ़ौज में) के कारण खेती का काम भी रुक गया।

पर एक बात जो लगभग आजतक नहीं बदली है - विशेष प्रयोजन पर एक खास दलित(चमार) का घर आना,अनवरत जारी है। न जाने कब से यह परंपरा चली आ रही है,लगभग हर सवर्ण परिवार के लिए गाँव का एक चमार आरक्षित है,जिसकी माँ या पत्नि या बेटी मेरे घर भी मेरे परिवार की महिलाओं का पूरे शरीर को दबाने और जब कोई घर में संतान का जन्म होता था तब साफ़-सफाई के लिए आया करती थी। एक प्रथा चली आ रही है कि जन्म देने वाली माता घर से कई दिनों तक बाहर नहीं निकल सकती है और वो अपने नित्यक्रिया संबंधी सारे कार्य घर में ही एक घड़े में कर लिया करती है जिसे वो दलित महिला जिसे देहातों में चमइन कहा जाता है,रोजाना फेंका करती हैं। पर ये बेकार का प्रथा आज धीरे-धीरे टूट रही है। जो दलित महिला कभी गर्व से कहती थी कि सभी सवर्ण इंसानों को मैंने पहली बार छुआ है वो आज मुझसे भेदभाव रख रहा है,यह सही भी है क्योंकि जन्म देने वाली माता तो उस दौरान बेहोश हो जाया करती है और सृष्टि में किसी भी सवर्ण को उसी दलित महिला द्वारा पहला स्पर्श मिलता है,लेकिन इस आत्मीय भरे संबंध को समाज में सही से आजतक उकेरा नहीं जा सका। आज स्थिति तो काफी बदल गयी है,जिस काम को देहातों में दलित महिलायें बखूबी कर देती थी,आज उसका स्थान अस्पतालों ने ले लिया है भले ही सुरक्षा के नाम पर आज अस्पतालों की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता लेकिन मेरा जन्म तो उसी दलित महिला के प्रयासों से हुआ है और पहला स्पर्श उसी का है जिसे नकारा नहीं जा सकता।

पर समाज या परिवार ने इस रहस्य को मुझे नहीं बताया। दलितों और सवर्णों के संतानों के बीच के इस आत्मीय संबंध को कभी भी फर्श पर नहीं लाया गया,दलितों के इस महत्व को नहीं बताया गया जिसकारण दोनों समुदायों के बीच खाई दिन-प्रतिदिन बढ़ती गयी।

आज दोनों के बीच विमर्श ही वह माध्यम है जिसके बदौलत समरस समाज का निर्माण हो सकता है। जबतक वे अपने घरों में महानता की बातें नहीं करेंगे,गरिमापूर्ण जीवन की चाह नहीं रखेंगे तबतक समाज में बराबरी का माहौल बन ही नहीं सकता। कितने भी कोशिश कर लिया जाए,क़ानून को कितना ही कठोर बना लिया जाए,सब बेकार ही साबित होगी। यह आपको कानूनी समानता तो दे सकती है लेकिन व्यावहारिक नहीं बल्कि ऐसा प्रयास नफरत को ही बढ़ाएगा,जिसे आप देख रहे हैं। ज़रा गौर कीजिए! जिस समाज में उन दलित समुदाय को रहना है,उसी समाज में सवर्णों को भी,इसकारण दोनों द्वारा दोनों को मान्यता देने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बनता क्योंकि दलितों का अस्तित्व तभी है जब वह महान हिंदू समाज का अंग है,इसके इतर वह देख चुका है कि इस्लाम और ईसाई अपनाने के बाद भी उन्हें दोयम दर्जे की स्थिति प्राप्त है। बौद्ध धर्म अपनाने के बाद भी आरक्षण की जरुरत पड़ रही है लेकिन बदला हुआ धर्म भी उनकी भेदभाव वाली स्थिति को बदल नहीं पाया। जब हर जगह उन्हें एक जैसा ही बरतावों का सामना करना पड़ रहा है तो बेहतर किसके लिए नहीं होगा कि हम अपने धर्म और अपने समुदाय में रहते हुए अपने अधिकारों की मांग करें?

आज के दौर में दलित समुदाय का अपनी साख बचाने का महान अवसर है जिसे गंवाना नहीं चाहिए,वो भी तब जब संघ जैसा मजबूत संगठन हिंदू समाज की एकता का बात करता हो। आज का माहौल तो सोने पर सुहागा जैसा है जिसे दलित समाज द्वारा भुला नहीं जाना चाहिए।

हमें यह भी भूलना नहीं चाहिए कि हिंदू तभी तक हैं,जबतक आपस में सूत्रबद्ध हैं। खाँचों में बंटी इस हिंदू समाज से जातियों का लोप कर 'वर्ण-व्यवस्था' को फिर से लाने जा वक्त आ गया है। जन्म आधारित जातिगत कट्टरता जो आज घर कर गयी है,उसे तोड़ने का वास्तविक वक्त है और दलितों को फिर से अपनी पूरी ताकत वर्ण-व्यवस्था को लागू करने में झोंक देना चाहिए ताकि वे अपनी बुद्धिमता और कौशल से ब्राह्मण या अन्य मनचाहा वर्ण स्वीकार कर सकें। जो परंपरा सैकड़ों वर्षों से रुक गयी है उसे फिर से सुचारू रूप से चलाना होगा ताकि जो सवर्ण आज वास्तव में दलित और पिछड़ा चरित्र को धारण कर लिए हैं तथा मांस और मदिरा का भक्षण करने लगे हैं,उन्हें दलितों के श्रेणी में रखा जाए। यह सब काम ग्रामीण स्तर पर,समुदाय स्तर पर हर वर्ण(वर्तमान जाति) से आया व्यक्ति करे और यह सुनिश्चित करे कि 'दलित रुपी ब्राह्मण'(ऐसा ब्राह्मण जो अपने कर्मों से दलित बन चूका है लेकिन फिर भी ब्राह्मण ही बने रहने को मजबूर है) हिंदू के लिए खतरा है और 'ब्राह्मण रुपी दलित'(अपने कर्मों से ब्राह्मण बन चूका है लेकिन फिर भी दलित बनकर रह रहा है) सशक्त हिन्दू समाज का परिचायक है।

Thursday, 30 March 2017

My diary - संघ प्रमुख मोहन भागवत के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनाये जाने के किसी भी वार्त्ता के विरोध में!

शिवसेना की पत्रिका सामना में संघ प्रमुख मोहन भागवत को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाए जाने के संबंध में लिखा गया,उसके बाद तो कई अटकलें लगाई जाने लगी। शिवसेना के ही सांसद संजय राउत ने कहा था कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए भागवत को सर्वोच्च पद लेना चाहिए। वह हर लिहाज से इसके लिए उपयुक्त उम्मीदवार हैं।

अगर ऐसा होता है तो बहुत ही बकवास संदेश स्वयंसेवकों और लोगों में जाएगा कि संघ के उतने बड़े पोस्ट पर बैठा व्यक्ति भी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर काबू नहीं कर पाया जो संगठन के लिए काफी ही बुरा होगा। संघ का अभी तक का इतिहास बताता है कि कोई भी सरसंघचालक मृत्यु या अस्वस्थ होने के अलावा अपने पद को नहीं छोड़ा है,अगर भागवत के मामले में ऐसा होता है तो यह न केवल संघ की परंपरा का उल्लंघन होगा बल्कि स्वयंसेवकों के साथ धोखा भी होगा कि हमें देशप्रेम को लेकर झांसे में रखा जा रहा है।

संघ जिस सांस्कृतिक कार्यों के लिए बना था और आज अगर इतने आलोचना झेलने के बाद भी बाकियों के मुकाबले मजबूती से अडिग है तो वह केवल अपने उन्हीं सांस्कृतिक कार्यों के बदौलत है। अगर इसका प्रमुख ही राजनीतिक पद को धारण कर लेगा तो कुल मिलाकर संघ को राजनीति में आने का एक जरिया समझा जाना लगेगा,जिससे स्वयंसेवकों में न केवल त्याग की भावना का लोप होगा बल्कि अन्य लोगों का जुड़ाव स्वार्थवश और लोभवश होने लगेगा जिससे संगठन निश्चित रूप से अधोगति को पा जाएगा।

लेकिन खुशी की बात यह है कि इन सब अटकलों पर संघ प्रमुख ने खुद ही विराम लगा दिया है। राष्ट्रपति बनने के सवाल पर उन्होंने कहा कि मीडिया में ऐसी खबरें सिर्फ अफवाह हैं। नागपुर के राजवाड़ा भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया में जो चल रहा है वह होने नहीं जा रहा। साथ ही उन्होनें यह भी कहा कि वह संघ के लिए ही काम करते रहना चाहते हैं। वह ऐसे किसी प्रस्ताव पर विचार भी नहीं कहेंगे। अगर प्रस्ताव आता भी है तो हम उसे स्वीकार नहीं करेंगे।

यह एक मिसाल है कि जिसतरह स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण एक नैतिक आदर्श पर होता है और उसका पालन करना सभी के लिए कर्तव्य के सामान होता है। ऐसा हर कोई करता है चाहे वह संघ के किसी भी पद पर हो और वह है - निःस्वार्थ भाव से देश सेवा और समरस समाज के निर्माण का प्रयास!

Wednesday, 29 March 2017

मेरी यादें - जातिगत भेदभाव का उपजना और शुद्ध खून की अवधारणा का मस्तिष्क के एक कोने में प्रवेश! -2

समाज से अपने को अलग-थलग रखना,रहन-सहन में अंतर और उतने गंदे जानवर को खाने के कारण मेरे अंदर की सहानुभूति धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। ऐसा आप पिछले आलेख में पढ़ चुके हैं। शहर से गाँव वापस आ गया हूँ और यहां का समाज मुझे शहर से ज्यादा जातियों में कठोरता से बँटा हुआ नजर आ रहा है,जिसे मैं आभास कर रहा था। आखिर किस तरह मेरे अंदर ऐसे भावना घर करते चले गए कि हम श्रेष्ठ हैं और शुद्ध खून का वारिस हैं,इसका मुझे एक नहीं कई कारण नजर आते हैं जिसे मैं चौथी से लेकर दसवीं तक महसूस करता रहा हूँ।

पहले आलेख में आप सभी पढ़ चुके हैं,"जब मैं पहली और दूसरी कक्षा में था तो जाति-व्यवस्था के लिए आज की तरह किसी तरह का भेदभाव मेरे मन में नहीं था। चुकी मेरा अधिकांश समय स्कूल के बाद घर की चार-दीवारी में ही गुजरता था,शायद यहीं कारण हो लेकिन मैं यह खुद नहीं समझ पाया कि कब मेरे मन में जातिगत-भेदभाव घर कर गए और दसवीं तक अपने को एक ऊंच,आर्य और शुद्ध खून का वारिस मानने लगे। उन कक्षाओं के दौरान मुझे याद है कि मेरे पसंदीदा दोस्तों में कम से कम दो तो 'चमार' समुदाय से थे जो मेरे साथ ही बैठकर पढ़ा करते थे। उससमय बेंच और कुर्सी की व्यवस्था तो थी नहीं इसलिए नीचे बोरे की चाट पर हम एक-दूसरे के लिए जगह लूटने का काम रोजाना किया करते थे। चौथी के बाद मैं संघ के स्कूलों में आ गया और वे सरकारी स्कूलों में,दसवीं तक तो कभी-कभार बात होती रही लेकिन उसके बाद कभी मुलाक़ात भी नहीं हुई। शायद उनमें से एक तो आगे बढ़ा होगा क्योंकि उसकी आर्थिक पृष्टभूमि अच्छी थी लेकिन दूसरा जिसका परीक्षा में अंक मेरे जितना ही आया करते थे या तो वह मेरे बाद सेकंड या थर्ड आता था,वह दिहाड़ी मजदूर हो गया।"

चौथी कक्षा में मैं संघ के स्कूल में चला गया। धीरे-धीरे उम्र के बढ़ने के साथ समाज के लोगों से मिलना शुरू हुआ और घर की चारदीवारी छोटी पड़ने लगी। छोटे स्तर पर विमर्श का दौर शुरू हो गया। संघ द्वारा नियंत्रित और इसके एक अनुषंगी संस्था विद्या भारती द्वारा संचालित स्कूल 'सरस्वती शिशु मंदिर' ने मेरे व्यक्तित्व का बहुमुखीयकरण करना शुरू कर दिया। इस स्कूल में किसी के बारे में मैं कभी नहीं जान पाया कि कौन किस जाति और समुदाय से ताल्लुकात रखता है,इसका कारण था आपस में सभी को भैया-बहन जैसे संबोधनों से बुलाना। इस संबोधन के इस्तेमाल करने में किसी को कोई झिझक नहीं होती थी क्योंकि सभी आचार्यजी द्वारा भी ऐसा किया जाता था।

संघ के स्कूल का समाज समरसतापूर्ण था। भोजन मंत्र के बाद हम कई दिन आपस में ही गोलबंद होकर खाना खाते थे। भले ही स्कूल में संस्था द्वारा जातिगत भेदभाव को मिटाने का कठोर प्रयास किया जा रहा था लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि छात्रों के आतंरिक मन में कुछ भेदभाव तो था ही,पर इसे संस्था में किसी द्वारा खुलकर स्वीकार नहीं किया जाता था,बस केवल आपस का मसला था। इसे नकारा नहीं जा सकता था क्योंकि यहां आने वाले छात्रों का संबंध कई गांवों के भिन्न समाजों से था।

मेरे मन में पहली बार अश्पृश्यता का भाव नहीं,भेदभाव का भाव नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से भिन्न मत एक ऐसे मौके पर आया जब मेरे गाँव के मुखिया चुनाव में एक ब्राह्मण उम्मीदवार को एक दलित उम्मीदवार ने मात्र 12 मतों से हरा दिया। इतने कम वोट से हारने के बाद विपक्षी कभी भी इसे स्वीकार नहीं कर सकते वो भी तक जब ऐसा मानकर चला जा रहा था कि ये ब्राह्मण उम्मीदवार आसानी से जीत जाएंगे। ऐसे में ये सारे कानूनी तरीकों का इस्तेमाल तो किये लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ और पांच साल गुजर गए।

जब मैं पाँचवी में था तो मुझे सबसे ज्यादा दुःख और हताशा तब हुआ जब जीत का जश्न मनाने को लेकर दलित समुदाय द्वारा जुलुस निकाला गया,मुझे ऐसा लगा जैसे मानो पूरा का पूरा दलित समुदाय ही गाँव के कच्ची सड़कों पर उतर आया हो। गाँव की शाम काले और अर्द्ध नग्न लोगों के जयकारों से पाट दी गयी। यह सब तो ठीक था,कोई भी करता लेकिन जीत के नशे में राजपूत-ब्राह्मण के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल किया गया और फब्तियां कसी गयी,वह मेरे लिए नागवार गुजरा और सीधे-सीधे बचपन का मन समाज को दो खेमों में देखने लगा।

हमेशा की तरह मेरे द्वार पर लोगों का जमवाड़ा लगता रहा। बढ़ती उम्र ने मेरी भी दिलचस्पी इनलोगों के बातों को सुनने में बढ़ा दी। मैं रोजाना शाम को लालटेन की रोशनी में पढ़ने के क्रम में उनकी बातों को भी सुनता रहा। जाहिर सी बात थी जिसमें शामिल होने वाले लोग सभी के सभी सवर्ण थे और बात को एकतरफा तथा पूर्वाग्रह पीड़ित होकर किया करते थे। और अपने द्वारा कहे बातों को दैवीय इच्छा तथा पुनर्जन्म के सिद्धांत पर सही ठहरा देते थे। धीरे-धीरे मुझे गर्व होने लगा कि कथित बड़े घराने में मेरा जन्म ईश्वर की इच्छा से हुआ है। ऐसा होना लाजिमी भी था क्योंकि इन एकतरफा बातों को संतुलित करने के लिए दलितों का बात रखने वाला और उनकी समस्याओं को बताने वाला वहाँ कोई भी दलित मौजूद नहीं रहता था। हर रोज शाम को हमारी महानता की बातें होती थी,समाज और युद्ध तथा संकट के दिनों में किये गए कारनामों की बात होती थी जिससे शुद्ध खून की अवधारणा का विकास मेरे जेहन में धीरे-धीरे होने लगा।

वह एक ऐसा दौर था जब रास्ते से कोई भी दलित गुजरता था तो किसी का हिम्मत नहीं था कि वह किसी सवर्ण पर आँख उठाकर भी देख दे। नजरें नीचे हमेशा झुकी रहती थी। बात करना तो दूर की बात थी। इसी स्थिति में मेरी परवरिश हुयी।

जिसतरह सवर्ण के साथ कोई भी दलित अपने पक्ष को नहीं रख पाता था,ठीक उसीतरह दलित समुदाय भी जब आपस में बातें करते होंगे तो उनके बीच सवर्णों का पक्ष रखने वाला कोई नहीं रहता होगा और वे अपने दुःख,दर्द,समस्याओं और परेशानियों का ही चर्चा हमेशा किया करते होंगे जिससे उनसभी के मन में नकारात्मकता का प्रसार हो जाता है,यह क्रम सदियों से चलता आ रहा है जिसकारण यह एक जटिल आनुवांशिक समस्या हो गयी है। यहीं वह कारण है कि ये अपने को समाज के अन्य वर्णों से नहीं जोड़ पाते और अपनी एक अलग दुनिया बसाकर अलग मोहल्ला स्थापित कर लेते हैं तो विमर्श कहाँ से होगा?

बचपन के दिनों में मैं कभी भी उनके वास्तविक समस्या को नहीं समझ पाया। अपनी महानता और त्याग की कथा सुनते-सुनते,दैवीय इच्छा के कारण मैं अपने को शुद्ध खून का वारिस समझने लगा।

मुझे याद आता है कि किसतरह जब मैं पांचवीं-छठी कक्षा के दौरान कभी-कभी दलित मोहल्ले से गुजरता था तो वे सभी मुझे ऐसे देखते थे जैसे कभी कोई इंसान देखे ही नहीं है। उनकी दशा बद से बदतर होती थी,गंदगी चारों तरफ फ़ैली रहती थी और अपने यहां आने वाले रास्ते पर ही सुबह रोजाना नित्यक्रिया से निपटा करते थे। यह दूसरा वजह था जिस कारण मैं और गाँव के अन्य लोग दलित मोहल्ला में कदम नहीं रखते थे। वजह जो भी हो लेकिन उनकी मजबूरी थी कि उनके पास जमीन ही नहीं है,इसकारण वे दुसरे के खेतों में डर के कारण नहीं जाते थे।

मेरे गाँव के दलितों का जुड़ाव भाकपा(माले) से धीरे-धीरे गहरा होता गया था। गाँव में हथियारों का सप्लाई बढ़ गयी थी।और ये कभी भी एकजूट होकर झगड़ा करने को उतावले हो जाते थे। यह वह दौर था जब मैं आठवीं में था। यह हवा जोरो से चल रही थी कि अगर कोई भी सवर्ण अपने खेतों में फसल को अपने मेहनत से उगा रहा होगा तो पार्टी वाले आएंगे और लाल झंडा गाड़कर सारे फसल को काटकर ले चले जाएंगे जिसमें इन दलितों का हाथ भी होगा। यह अन्य वजह रहा जो नफरत के भाव को बढ़ाता रहा क्योंकि यह मेरे नजर में एक ढबे समुदाय द्वारा बाहरी शक्तियों के कारण सवर्णों पर ज्यादती थी। जिसे कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता था। इसीकारण सवर्णों ने रणवीर सेना जैसे कुख्यात संगठन को तहे दिल से स्वीकार किया। हालांकि मेरी वैचारिक मतभेद ही रही।

Tuesday, 28 March 2017

Hindu Nation - नमो-नमो के बाद योगी-योगी : कहीं शुभ संकेत की आहट तो नहीं?

आज मीडिया का रंग बदल गया है चाहे प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक! जिस मीडिया को कभी मोदी गोधरा कांड के गुनाहगार और मुसलमानों के लिए मौत का सौदागर नजर आते थे,वे आज अपने कर्मठ व्यक्तित्व के कारण अपने को विकास का एक नायक के रूप में स्थापित कर चुके हैं। जब वाजपेयी से प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी लेकर आडवाणी को दी गयी तो यहीं मीडिया और छद्म वामपंथी-उदारवादी-कठमुल्ला जमात कहता नजर आया था कि आडवाणी संप्रदायिक हैं और वाजपेयी सेकुलर और इसी को आडवाणी-मोदी प्रकरण में दोहराया गया। 2014 कि घटना तो सभी को याद होगी कि कैसे कुछ ही दिनों में आडवाणी सेकुलर और मोदी संप्रदायिक हो गए थे। इस बात को कौन भूला होगा कि आज के दिनों में मोदी सेकुलर और योगी संप्रदायिक है। आने वाले दिनों में योगी के समकक्ष और उसी व्यक्तित्व का कोई दूसरा नेता और कार्यकर्त्ता आ जाएगा तो मुझे इस बात को सुनकर कोई ताज्जूब नहीं होगा कि मीडिया घरानों के नजर में योगी सेकुलर और नया व्यक्ति संप्रदायिक हो गया है।

योगी का चुनाव कोई अतिश्योक्ति नहीं बल्कि एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है - गोरखनाथ मठ के महंत की पहचान किसी जाति से नहीं जुड़ी है। आज जब उनके मठ से सीधे ही मीडिया रिपोर्टिंग हुयी तो लोगों को मालूम चला कि योगी कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि प्रकृति द्वारा तरासा हुआ वो नमूना हैं जो सदियों में कभी-कभार पैदा होते हैं। जिनके द्वारा दलित-आदिवासियों आदि के उत्थान के लिए चलाये गए मुहीम को देखकर लगता है कि इन्हें इतिहास में एक कुशल प्रशासक के साथ-साथ महान समाज सुधारकों जैसे-दयानंद सरस्वती,विद्यासागर आदि जैसे ही याद किया जाएगा। यहीं कारण है कि उनके खिलाफ किये गए फर्जी मुकदमों को आज चर्चा का विषय नहीं बनाया जा रहा है।

योगी बेहद लोकप्रिय हैं,लगभग 19 साल से हाशिये पर रहे इस करिश्मे को शाह ने बखूबी पहचाना। बिजनेस स्टैंडर्ड में राधिका रामशेषन लिखते हैं,"वह अविवाहित हैं और इसलिए पारिवारिक भ्रष्टाचार से मुक्त हैं, हिन्दुत्व पर कोई समझौता नहीं करते हैं, युवा और कठोर प्रशासक हैं।" 

पार्टी के एक सूत्र ने कहा,"सबसे अहम बात यह है योगी उत्तर प्रदेश में भाजपा की पुरानी परंपरा के नेताओं से पूरी तरह अलग हैं। सिन्हा, राजनाथ और कुछ हद तक मौर्य भी उसी परंपरा के हैं। अगर इनमें से कोई भी मुख्यमंत्री बनता है तो यह पुरानी व्यवस्था का ही विस्तार होता। फिर वही भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की कहानी दोहराई जाती।"

यहीं सब भाजपा को अन्य पार्टियों से अलग करती है कि यह भ्रष्टाचार के खिलाफ किस तरह काम करने को लालायित है ताकि भारत के पुराने गौरव को हासिल किया जा सके। हम केवल विकास के बदौलत इस गौरव को तो पा नहीं सकते,जब तक हिंदुत्व सरीखे भारतीय संस्कारों और जीने की कला को लोगों के जेहन में उतारकर उसे एक राष्ट्रीय पहचान हिंदू न दे दें। यह सब योगी जैसे व्यक्तित्व के बदौलत ही हो सकता है। अब वो दिन दूर नहीं होगा जब भारत की पहचान हिंदुत्व होगी और हर भारतवासी गर्व से कहेगा कि हम हिंदू हैं और यहीं मेरी राष्ट्रीयता है। इसे किया जा सकता है अगर 'घर वापसी' जैसे कार्यक्रमों को सही तरीके से चलाया जाए। यहीं तो वह 'शुभ संकेत' है जिसकी आहत सभी को सुनाई दे रही है और हिंदू राष्ट्र का सपना ज्यादा दूर नहीं है! बहुत जल्द ही पुराने गौरव की डंका को बजागर फिर से सदियों तक पूरे विश्व को गुंजायमान किया जाएगा!

Monday, 27 March 2017

मेरी यादें - जातिगत भेदभाव का उपजना और शुद्ध खून की अवधारणा का मस्तिष्क के एक कोने में प्रवेश! -1

"'सुरेश',वह चमार है!"
"कैसे मालूम चला? मुझे तो लग नहीं रहा है।"
"लगने से क्या होता है,मुझे मालूम है।"

यह संवाद है झारखंड के एक शहर जमशेदपुर का! जब मैं वहाँ दूसरी कक्षा के दौरान मात्र छः महीने के लिए गया था और मेरे क्वाटर के ऊपर वाले क्वाटर में एक शख्स रहते थे जिन्होंने मुझे उस लड़की का परिचय इसी रूप में दिया हुआ था। ताज्जूब की बात है कि बिना पूछे! शायद उन्हें मालूम चल गया होगा कि हमलोग ब्राह्मण है। लेकिन एक बात तय है कि वह बिल्डिंग सामाजिक समरसता का एक मिसाल था जिसमें लगभग हर जाति और धर्म के एकाध परिवार रहते थे।

उस पूरे कॉलोनी में बहुत से परिवार रहते थे और उसी में उस लड़की का परिवार भी जिसका ताल्लुकात एक दलित परिवार से था,जिसकी जानकारी मुझे हाल में ही प्राप्त हुई थी। जाहिर है उससमय तक मेरे मन में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था भले ही गाँव की ग्रामीण पृष्टभूमि में 'चमटोली' के नाम से चर्चित दलित मोहल्ला को शायद सभी ओछी नजरों से देखा करते थे। लेकिन फिर भी मुझे विश्वास नहीं हुआ था कि वह लड़की चमार है क्योंकि उसमें और बाकियों में मुझे कोई अंतर नहीं लग रहा था। भले ही उसका रंग सांवला था लेकिन उस समय समाज में नए फैशन के रूप में आया 'बॉब कट' बाल उसकी सुंदरता को बढ़ा देता था। उसकी सुंदरता को देखने में शायद किसी को गुरेज नहीं था क्योंकि जब वह निकलती तो सबकी एकटक निगाहें उसके चेहरे पर टिक जाया करती थी। सामाजिक भेदभाव का पहला नजारा,वो भी शहर में,उस छोटी उम्र में मुझे देखने को मिल गया था!

उस परिवार के चमार होने की बात की जानकारी मिलने के बाद मैंने देखा कि वह किस प्रकार हमसे भिन्न है। परिणाम बहुत ही आश्चर्यचकित करने वाले थे।

उस बिल्डिंग के बाहर बहुत ही बड़ा खुला क्षेत्र था जो छोटे-छोटे पत्थरों से भरा हुआ था और कहीं-कहीं बालू भी दिखाई दिया करते थे और हमारे सामने लगभग 150 मीटर को दूरी पर ऐसे ही संगठित तरीके से दूसरा बिल्डिंग था,कुल मिलाकर शहरीकरण का विकास नियमानुसार ऐसा किया गया था कि सभी को पर्याप्त हवा,धूप और पानी मिल जाए!

उस लड़की,जिसका नाम मुझे नहीं मालूम क्योंकि मैं कभी बात नहीं किया,जिसकी सुंदरता से लगभग सारा कॉलोनी प्रभावित था,मुझे लगा कि ये(दलित) अपनी सामाजिक स्थिति के लिए खुद ही जिम्मेवार है। पत्थरों से भरे उस खुले क्षेत्र में कॉलोनी के सारे लोग निकलकर बाहर ही ब्रश से अपने दाँतों को साफ़ किया करते थे,सभी लगभग आपस में बात किया करते थे लेकिन वह लड़की और उसका परिवार किसी से नहीं! देखने से पहली नजर में ही लगता था कि वे अलग-थलग हैं। आर्थिक स्थिति हमसभी के बराबर होने के बाद भी वे अपनी मानसिकता को नहीं बदल पाए थे कि हममें और किसी में कोई अंतर नहीं है,हर मनुष्य की बराबर गरिमा है,पर वे शायद अपने को नीच मानकर वहाँ मौजूद समाज से कटे रहे। यहीं वह मूल कमी है जो सदियों से उनको सामाजिक रूप से हाशिये पर कर दिया। यह जगजाहिर तथ्य है कि अगर आप अपनी बात अन्यों के पास नहीं पहुंचाएंगे तो स्वतः हाशिये पर चले जाएंगे,जिसकी झलक आपसभी आज के राजनीतिक परिदृश्यों में देखते होंगे!

एक बार मेरी नजर उस लड़की के पिताजी पर चली गयी जो कभी-कभार ही घर से बाहर निकला करते थे,शहरों में रहने के बावजूद भी न कोई अच्छा पहनावा था और न ही अपने को डूसरे के समकक्ष ला खड़े करने की ललक! हद तो तब हो जाती थी जब सुबह सभी के सामने लूंगी लपेट कर ही आकर मुँह धोने लगते थे। काला चिपचिपा शरीर बहुत ही बकवास लगते थे। उनसभी(दलित समुदाय) को सामाजिक रूप से कटने का यह दूसरा कारण हो सकता है।

मुझे याद आ रहा है,जब पूरे कॉलोनी में एक बात फैल गयी कि आज उसके घर 'पोर्क'(सुअर का मांस) पकाया जा रहा है। आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि इस स्थिति में इतने गंदे जानवर को खाने वाले से समाज का अन्य तबका उनसे ताल्लुकात रखेगा? इस घटना के बाद तो मेरे मन में जो सहानूभूति उनलोगों के प्रति थी वो धूमिल होती चली गयी।

इस घटना के कुछ दिनों बाद ही मैं वापस गाँव आ गया और फिर कभी भी वहाँ नहीं जा पाया। लेकिन एक बात तय थी कि उस समुदाय के प्रति मामूली सी ही गलत धारणा मेरे मन में घर कर गयी थी।

अन्य कई वजहें रही जो किसी-न-किसी रूप में मेरे मानसिकता को उनके प्रति बदलती रही जिसका अनुभव मुझे गाँव में मिला। जिसे आपसभी अगले आलेख में पढ़ सकते हैं!