Wednesday, 22 February 2017

NDTV का एक पत्रकार जिसे स्क्रीन काला करने का शौक रहा है,अब खुद में कालिख लगाकर स्टूडियो में बैठ जाना चाहिये


(इस आलेख में प्रयुक्त नाम से लेखक का कोई सरोकार नहीं है,यह उन लोगों का वक्तव्य है जो इस पत्रकार के पक्ष या विपक्ष में टिप्पणी लिखें है और उनका ही संदर्भ लिया गया है।)

(एक पत्रकार का भाई बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का आरोपी और उस पत्रकार की चुप्पी।)

इंडिया टीवी के एडिटर अभिषेक उपाध्याय व्यंग्य करते हुए अपने फेसबूक पेज पर लिखते हैं,"ज़बरदस्ती में भाई लोग एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय के पीछे पड़ गए हैं। अरे भई, हाँ। रवीश कुमार। अब खानदानी नाम रवीश पांडेय है तो क्या हुआ? सेक्युलर हैं। सर्वहारा समाज के प्रतिनिधि हैं। रवीश कुमार ही सूट करता है। अब क्या हो गया जो इन्ही रवीश पांडेय, माफ़ कीजिएगा रवीश कुमार के बड़े भाई ब्रजेश पांडेय बलात्कार के मुकदमे में हैं। पीड़ित भी कौन? एक दलित लड़की! वो भी नाबालिग? ज़िला मोतिहारी। बिहार। सेक्स रैकेट चलाने का मामला अलग से है!"

व्यंग्य को आगे बढ़ाते हुए लिखते हैं,"अब ये कौन सी बात हुई कि बिहार में तो नितीश कुमार की पुलिस है? भाई साज़िश मत करो रवीश कुमार के खिलाफ। कौन हैं ये नितीश कुमार। बोलो। कौन हैं? अबे, ये बीजेपी के एजेंट हैं। और क्या! रवीश कुमार के ख़िलाफ़ जो भी एक लफ्ज़ बोलेगा, वो बीजेपी का ही एजेंट होगा। जाओ, निकलवाए लो उस दलित लड़की की भी जनम कुंडली। बाप नही तो दादा। दादा नही तो परदादा। या उनके भी दादे। कोई न कोई बीजेपी से सटा रहा होगा। अब बीजेपी तब नही थी तो क्या हुआ!! तुम निकलवाए लो कुंडली। सावरकर और गोलवलकर के साथ कभी घूमे होंगें। इनके दादे-परदादे।"

क्या अच्छा नारा गढ़ा है इन्होंने,आप नीचे पढ़ सकते हैं-

“ब्रजेश पांडेय को बचाना है
और
उस दलित लड़की को
झूठा साबित करके दिखाना है।”
अब ये कौन साला आ गया है जो तेज़ आवाज़ में लाउडस्पीकर पर बल्ली सिंह चीमा की कविता बजाए जा रहा है? रवीश कुमार को सुनाए जा रहा है-
“तय करो किस और हो तुम
आदमी के पक्ष में हो
या फिर कि आदमखोर हो तुम।”
भगाओ…मारो….साले को… चुप कराओ… यहां नैतिकता का इकलौता ठेकेदार पत्रकार जीवित है!!! वो भी नही देखा जा रहा है इनसे!!!!

           
        वहीं बचाव में पत्रकार ओम थानवी 'मीडिया खबर' नामक एक वेबसाइट पर लिखे हैं," लेकिन महज़ आरोपों के बीच सोशल मीडिया पर रवीश कुमार पर कीचड़ उछालना क्या ज़ाहिर करता है? निश्चय ही अपने आप में यह निहायत अन्याय भरा काम है। आरोप उछले रिश्तेदार पर और निशाने पर हों रवीश कुमार? इसलिए कि उनकी काली स्क्रीन कुछ लोगों के काले कारनामों को सामने लाती रहती है?

ज़ाहिर है, यह हमला रवीश पर नहीं, इस दौर में भी आलोचना का साहस रखने वाली पत्रकारिता पर है। पहले एनडीटीवी पर “बैन” का सीधा सरकारी हमला हो चुका है। अब चेले-चौंपटे फिर सक्रिय हैं। इन ओछी हरकतों में उन्हें सफलता नहीं मिलती, पर लगता है अपनी कोशिशों में ख़ुश ज़रूर हो लेते हैं। अजीब लोग हैं।"

सच ही कहा गया है,इन वामपंथियों के लिए किसी भी चीज की अहमियत तभी तक है जबतक वह उनका भला करे,चाहे अभिव्यक्ति की आजादी हो या सोशल मीडिया!

अभी कुछ दिन पहले ही जब सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खेलवाड़ किये जाने के बाद इसी चैनल पर एकदिन का प्रतिबंध लगाया गया तो सोशल मीडिया के बदौलत ही पक्ष में मुहीम चलाया गया और कई पेज और ग्रुप बनाये गए,उस समय इसकी महत्ता का पूल बाँध दिया गया था और तुलना अरब स्प्रिंग से किया जाने लगा था लेकिन आज इन पत्रकारों के मुखारबिंद पूरा का पूरा 180 डिग्री घूम गया है।

वहीं पुस्तक 'कहानी कम्युनिस्टों के' लेखक संदीप देव अपने फेसबुक पेज पर लिखते हैं," छोटा भाई पत्रकारिता में दलाल है और बड़ा भाई औरतों का दलाल! वाह रवीश बाबू 'बागों में बहार' है!

छोटा भाई पत्रकारिता में दलाल है और बड़ा भाई( बिहार का कांग्रेसी नेता ब्रजेश पांडे) लड़कियों का! वाह रवीश बाबू खानदानी मुंह काला करने वालों में से हो, तभी टीवी का स्क्रीन काला करने का आइडिया तुम्हें ही सूझा! और हां, तभी नौकरी के लिए तुमने सबसे बड़े दलाल चैनल का चुनाव किया था और दशकों से वहीं पड़े हो! आखिर दलाली के धंधे में टिकाऊ होना जरूरी जो है!

अब यह मत कहना कि तुम दलाल नहीं हो! दलाल नहीं होते तो लड़कियों की दलाली करने वाले अपने भाई को पत्रकारिता के बल पर सबसे बड़ी दलाल पार्टी कांग्रेस में सेट नहीं कर पाते!

सही पत्रकारिता करने वाले पत्रकार बिहार और यूपी में गोली खा रहे हैं, और दिल्ली में पत्रकारिता को बेचने वाले अपने और अपने परिवार को राजनीति में सेट करने में लगे हैं! यह फर्क है असली पत्रकार और दलाल पत्रकार में! 'बागों में बहार' तुम जैसों के लिए है रवीश बाबू, असली पत्रकार तो आज भी दो जून की रोटी में ही पिस रहा है!"

मैंने चैनल पर लगे प्रतिबंध दौरान लिखा था," NDTV का एक पत्रकार(एंकर) अपनी मूढ़ता को पा गया है!"

इसमें कोई संदेह नहीं कि 4 नवंबर का प्राइम टाइम शो सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा भेजे गए नोटिस का एक प्रतिक्रिया था। यह अपने आप को न जाने क्या समझ बैठा है और देश के कुछ नासमझ लोगों को बरगलाने का प्रयास कर रहा है और चैनल पर नौटंकी करके बरगला भी देगा। सरकार द्वारा चैनल पर प्रतिबंध सरकार से सवाल पूछने को लेकर नहीं बल्कि सैन्य जानकारियों का नाजायज रिपोर्टिंग करने को लेकर लगाया गया है लेकिन इस शो में यह मुद्दा नदारद रहा। इस महत्वपूर्ण बात को समझना बहुत ही जरूरी है।

NDTV को शहीद घोषित करने की कवायद भी शुरू कर दी गयी है कि आपातकाल की शुरुआत इस चैनल को एक दिन के लिए प्रतिबंधित करके कर दी गयी है।

जरा सोचिए!
क्या व्यंग्य पत्रकारिता हो सकती है?
बिल्कुल नहीं!
यह पत्रकारिता का मजाक है और पत्रकारिता के इतिहास में काले अध्याय का शुरुआत है। यह व्यक्ति इतना बौखला गया है कि बार-बार दोहराते नजर आता है,अगर हम सवाल पूछेंगे तो नोटिस भेज देंगे तो!
मान लीजिए यह नोटिस खत्म हो जाए तो क्या धान बेचेंगे?

इतना घठियापन तो एक वेश्या भी नहीं करती है जो डंके के चोट पर अपने शरीर का व्यापार करती है। एक चैनल जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपनी रिपोर्टिंग से खतरा उत्पन्न कर रहा है और पहले तो चोरी करके ऊपर से धौंस जमाने का प्रयास कर रहा है और वहीं कुछ नासमझ लोग हैं जो एक सड़-गल चुकी विचारधारा से गहरे प्रभावित होकर इसका समर्थन कर रहे हैं।

खैर,जिन दो लड़कों को चुना और ओठलाली लगाकर स्टूडियो में बैठाया गया था,वहीं इस चैनल के लिए शर्म की बात है, अगर चुना लगे लड़कों के चेहरे पर जगह-जगह काला टीका लगा दिया जाता तो NDTV के शर्मिंदगी में चार चाँद लग जाता।

अब वो वक्त आ गया है कि ऐसे पत्रकारों के मुँह पर जबरजस्ती कालिख पोतने का ताकि देश को पूर्वाग्रहशीलता और निष्पक्षता का ढोंग रचाने वालों से देश को मुक्ति मिल सके।