Wednesday, 15 February 2017

वैवाहिक बलात्कार (marital rape)

भारत में वैवाहिक बलात्कार की अवधारणा को लागू नहीं किया जा सकता जहाँ शादी को पवित्र बंधन माना जाता है।

इस पर अब विचार करने का वक्त आ गया है कि क्या भारत में वैवाहिक बलात्कार को अपराध माना जाये?

16दिसंबर की बहुचर्चित बलात्कार कांड के बाद गठित 'जेएस वर्मा समिति' वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाने की सिफ़ारिश कर चुकी है लेकिन सरकार ने उस वक्त स्वीकार नहीं किया था।

इस मुद्दे पर समाज और विद्वान बंटे हुये हैं - कुछेक का मानना है," कानून से छेड़छाड़ करने की कोई जरुरत नहीं है क्योंकि इसका दुरुपयोग हो सकता है।"
आज महिलाओं द्वारा पतियों और ससुराल के लोगों को झूठा फंसाये जाने के काफ़ी अधिक उदाहरण सामने आ रहे हैं। यह सामाजिक स्थिरिता के लिये खतरनाक होगा। आज दहेज के रोकथाम के लिए बनाया गया कानून कुख्यात रूप धारण कर चुका है और परिवार जैसी संस्था के लिए ही समस्या पैदा कर दिया है जो आज टूटने के कगार पर है।

जबकि इसका समर्थन करने वाले UNO के एक रिपोर्ट " The 2011 Progress of the world's woman : The persuate of justice " का हवाला देकर कहते नजर आते हैं कि अमेरिका,आस्ट्रेलिया सहित दुनिया के 52 देशों में 'वैवाहिक बलात्कार' अपराध है तो भारत में क्यों नहीं हो सकता? जब घरेलू हिंसा से महिलाओं को बचाने के लिये कानून है तो वैवाहिक बलात्कार के लिये क्यों नहीं होना चाहिये?

बिल्कुल होना चाहिए लेकिन क्या किसी बाहरी समाज का तुलना भारतीय समाज के परिप्रेक्ष्य में किया जा सकता है जो कई मायनों में काफी अलग है। यह बहस का ज्वलंत विषय है।

पर सबसे बड़ा सवाल जो उभरकर आता है,"यह कैसे साबित होगा या किया जाएगा कि यौन संबंध बनाते समय किसी महिला की सहमति थी या नहीं?" इस मामले में तो पूरा का पूरा एकाधिकार महिलाओं पर आ जाता है और पुरुष के लिए कुछ बचता ही नहीं है। चूकि कानून तो सभी को बराबरी का अधिकार देता है लेकिन इस परिप्रेक्ष्य में तो क़ानून के मूल उद्देश्य का पूर्ति ही नहीं होता इसकारण कोई औचित्य ही नहीं बनता कि वैवाहिक बलात्कार को कानूनी रूप से अपराध बनाया जाए।

अगर कोई महिला इस तरह का आरोप लगा रही है कि उसका पति उसके मना करने के बाद भी वैवाहिक बलात्कार जैसी हरकत कर रहा है तो उससे तलाक लेने का पूरा का पूरा अधिकार महिला को है।

ऐसे भी यह किसी वैवाहिक दंपती का निजी मसला है,इसे सार्वजनिक करने से क्या फ़ायदा?
लेकिन सवाल यहाँ फिर से खड़ा हो जाता है,"केवल महिलाओं से संबंधित मुद्दों को ही दुरुपयोग के लिये संवेदनशील के रुप में क्यों देखा जाता है? महिलाओं को इसका अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिये?

अगर झूठे फँसाये जाने और दुरूपयोग का हवाला देकर विरोध करते हैं तो हमारी व्यवस्था को दुरुपयोग से निपटने में सक्षम होना चाहिये,अगर ऐसा नहीं हो सकता है तो यह व्यवस्था की विफलता है। फिर महिलाओं पर दुरूपयोग का दोषारोपण कैसे लगाया जा सकता है?

अगर इसके कानूनी प्रावधान को देखा जाए तो आईपीसी(IPC) की धारा 375 जो बलात्कार(rape) को परिभाषित करता है,यह वैवाहिक बलात्कार के मामले में एक अपवाद प्रदान करती है,"किसी व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी,जिसकी उम्र 15 साल से कम न हो यौन संबंध बनाना बलात्कार नहीं है।"
जेएस वर्मा कमिटि ने इसी प्रावधान में संशोधन की बात कही थी। आज महिला संगठन और कुछ NGO जो महिला अधिकार की रक्षा का बात करते हैं वे इसी को बदलने की बात कह रहे हैं।
                   
अगर वैवाहिक बलात्कार को अपराध बना दिया जाता है तो इसके कई दूरगामी परिणाम देखने को मिलेंगे जो खतरनाक भी हो सकते हैं -
a)भारत की अधिकांश महिलायें जीवन पर्यंत अपने पति पर आश्रित रहती है,अगर वह किसी सामाजिक कार्यकर्ता और अन्य के कहने पर इस मामले को लेकर अदालत जाती हैं तो कोई भी पति इसे बर्दास्त नहीं करेगा,दोनों के बीच तलाक होना निश्चित हो जायेगा। जिसकारण निम्न प्रभाव उत्पन्न होंगे - पहली,सामाजिक अस्थिरता होने का डर हमेशा सताते रहेगा और दूसरी,महिला का जीवन और गर्त में चला जायेगा क्योंकि भारतीय समाज अभी उतना परिपक्व नहीं हुआ है कि वह किसी अकेली शादीशुदा महिला पर चारित्रिक लांछन नहीं लगाये।

b)शादी एक संस्था है जिसे सामाजिक मान्यता प्राप्त होती है अगर पति को वैवाहिक बलात्कार के मामले में अपराधी बनाने की कोशिश पत्नि द्वारा की जायेगी तो हम तेजी से उस समाज की ओर अग्रसर होंगे जो पश्चिमी सभ्यता की देन है। अगर ऐसा हो गया तो हमारी बुनियाद ही हिल जायेगी जिसे हम सदियों से संजोकर रखे हुये है।

अंत में,
एक व्यावहारिक अनुभव है - शादी के बाद पति और पत्नि एक दूसरे से इस कदर जुड़ जाते हैं कि उनमें एक सामान्य(comman) समझदारी पनप जाती है,ये एक-दूसरे की इच्छा और अनिच्छा का इज्जत करने लगते हैं। जिस कारण उनके बीच वैवाहिक बलात्कार जैसी कोई भी घटना होने की संभावना कम है।