Saturday, 25 February 2017

वामपंथी पत्रकार ही सबसे ज्यादा असहिष्णु हैं!

मैं दूसरे का नहीं,अपना ही उदाहरण दूँगा-एक समय जो मेरे ब्लॉग से प्रभावित होकर खुद ही सोशल मीडिया पर फ्रेंड बनाते हैं और अपनी लगभग हर बात पूर्वाग्रह से लिखते हैं और साथ ही भक्त,चेलों-चपाती जैसे निम्न स्तरीय भाषा का प्रयोग करते हैं।

आपको जानकार ताज्जूब तब होगा कि ये कैसे अपनी लोकप्रियता बढ़ा लेते हैं-वास्तव में ये सब अव्वल दर्जे के भाई-भतीजावादी होते हैं-इनके शोध और लेखों में वो कोई जान और मर्म नहीं होता लेकिन फिर भी अगर दिल्ली का कोई वामपंथी कुछ भी कहता है तो आँख मूँदकर बंगाल और केरल के समस्त वामपंथी उसके हाँ में हाँ मिला देते हैं और वो मामूली सा व्यक्ति अपने को महान समझने लगता है।

ये पत्रकार जो अपने वाल पर जो चाहे वो लिखते हैं,विरोधियों के आलोचना में ये इतने निम्न-स्तरीय शब्दों का प्रयोग करते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुहाई देते हैं लेकिन दूसरी विचारधारा के समर्थक जब इसी तरह के शब्दों का प्रयोग करता है तो इनकी नानी याद आने लगती है और सीधे ब्लॉक कर देते हैं। जो शुरुआत में खुद फ्रेंड बनाते हैं और जब खुद ही ब्लॉक करते हैं तो इनकी मंशा समझ सकते हैं। अभी तक कई पत्रकारों जिनका ताल्लुक इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप,टाइम्स ऑफ़ इंडिया उर हिंदुस्तान टाइम्स से रहा है अभी हाल में ही ब्लॉक कर दिए। मैं इनसभी की भाषा के स्तर और नाम को तो बता सकता हूँ लेकिन क्या मिलेगा? मेरा स्तर इनके जैसा उतना निम्नस्तरीय नहीं है कि नाम बताऊँ!

पर इनके भाई-भतीजावादी को हम एक इतिहासकार के वक्तव्य द्वारा समझाने का प्रयास करेंगे -

इसकी पुष्टि के लिए जाने-माने पत्रकार अरुण शौरी ज़ी टीवी के एक कार्यक्रम 'आपकी अदालत,आपका फैसला' का जिक्र करते हैं,जिसका संचालन मनोज रघुवंशी द्वारा किया गया था। इस चर्चा में मशहूर इतिहासकार श्री के.एम. श्रीमाली और वे खुद मौजूद रहे थे। जब श्रीमाली से रघुवंशी ने पूछा कि आपके पास क्या प्रमाण है या कहाँ लिखा है कि प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था ?(श्रीमाली,डी.एन. झा के प्रबल समर्थक थे।)

       श्रीमाली जी ने गर्व से कहा - "इस बारे में सैकड़ों लिखित प्रमाण मौजूद है।"
       "किस वेद में,किस ग्रन्थ के किस श्लोक में यह लिखा है ?" - रघुवंशी ने पूछा।
       इसपर श्रीमाली जी बोले - "मैं पुस्तकें तो नहीं लाया हूँ लेकिन हर कहीं प्रमाण मिल जाता है।"
       "लेकिन आप एक श्लोक तो बता दीजिये।" - रघुवंशी ने दोबारा पूछा।

       श्रीमाली जी एक श्लोक भी नहीं बता पाए,ग्रन्थ तो दूर।

       इसी बीच दर्शक दीर्घा से एक व्यक्ति बोला कि ये हैं,चारों वेद,इसमें कहाँ लिखा है,आप पढ़ के दिखाइये।
श्रीमाली जी ने उसे पढने से इनकार कर दिया और वे ठिठक गए।

       जाहिर सी बात थी कि ऐसी कोई प्रमाण ही नहीं है कि प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था। यह सब इन वामपंथी इतिहासकारों का अटकलवाजी और षडयंत्र था/है - हिंदुओं के खिलाफ। लेकिन यह तो स्पष्ट था कि श्रीमाली अच्छा प्रभाव नहीं छोड़ पाए।

ठीक ऐसा ही टीवी के एक पत्रकार के साथ भी हो रहा है!

जरा ध्यान दें-जब एक पत्रकार दुनिया की हर एक चीज को बारीकी से दिखाने का दावा करता हो,अपने को निष्पक्ष कहता हो और संतुलित खबर कहकर समाज में अपनी पैठ जमाने की प्रयास करता हो तो केवल इतना कहने भर से आप आँख मूँदकर इसपर विश्वास कर सकते हैं?

आप सोंचे अभी 'रामजस कॉलेज' का मामला प्रकाश में आया कि इस पत्रकार ने इसपर ही प्राइम टाइम नामक शो कर डाला,लेकिन अपने भाई जिसपर बलात्कार और सेक्स रैकेट चलाने का गंभीर आरोप लगा हो खामोश हो गया।

जब आप इस कार्यक्रम को देखेंगे तो कहीं भी आपको उन नारों को देखने को नहीं मिलेगा जिसमें 'बस्तर और काश्मीर के आजादी के नारे' लगे हैं लेकिन वो हर चीज देखने को मिलेगी ताकि जिससे संघ के छात्र इकाई के बहाने भाजपा-संघ को घेरा जा सके। क्या इसे आप संतुलित पत्रकारिता कहेंगे? हरगिज नहीं! तो दावा किस आधार पर किया गया है?

कुछ दिनों से मीडिया(खासकर न्यूज चैनल वाले) अपने आप को काफी शक्तिशाली समझ बैठे थे और मामूली खबर को भी इनके द्वारा राष्ट्रीय खबर बना दिया जाता था। बीते कुछ दिनों से हम देख ही रहे हैं - दिल्ली के कुछ लफंगों द्वारा किया गया चर्च पर हमला को असहिष्णुता के रूप में,पानसरे आदि की हत्या को एक विशेष संगठन से जोड़ कर पेश किया गया और सबसे बड़ी बात यह कि अखलाख-वध को इतना बढ़ाया गया कि इसपर पैसों की बरसात ही हो गयी। यह सब ऐसे ही अव्वल दर्जे के दलाल पत्रकारों के बदौलत हुआ है।

इसलिए अब वक्त आ गया है ऐसे पत्रकारों को सबक सिखाने का!