Saturday, 25 February 2017

ABVP के गुंडे नहीं बल्कि वास्तविक देशभक्त हैं!

जिंदा वहीं रहता है जो मरने के साथ-साथ मारना भी जानता हो,यहीं कारण है कि हमारी संस्कृति हमें एक हाथ में 'शास्त्र' और दूसरे हाथ में 'शस्त्र' को धारण करने को कहती है।

जरा सोचिए - "आज वामपंथियों का मसीहा कौन है?"
जवाब आसान है - "वह जो माओवादियों से सहानूभूति रखता हो,आतंकवादियों को मंच देता हो,काश्मीर के पत्थरबाजों को अभिव्यक्ति के अधिकार के तहत सही ठहराता हो,अपनी सभ्यता तथा संस्कृति की बात करने वालों को सांप्रदायिक कहता हो और तो और देश-विरोधी नारा लगाने वालों को योद्धा समझता हो।"

इसी तरह की मानसिकता का उपज हैं,"JNU का एक पूर्व छात्र नेता जो अध्यक्ष रह चुका था,कभी इतिहासकार रामशरण शर्मा को वामपंथ का दीप्तिस्तंभ समझा जाता था और आज यहीं छात्र नेता वामपंथ चेहरों का मसीहा हो गया है;जिस व्यक्ति को रामजस कॉलेज आमंत्रित किया गया था,वह भी इसी कतार में है और देश विरोधी हरकत करके मामूली ही सही लेकिन सतही लोकप्रियता हासिल कर चुका है। पर ये भूल जाते हैं कि 'चार दिन की चाँदनी और फिर अंधेरी रात' को लागू होते हुए हम रोज देखते हैं।"

आज वामपंथियों को आतंकवादियों से सहानुभूति क्यों है? क्यों ये अकसर कसाब,अफजल आदि जैसों की मानवाधिकार की बातें करते हैं? कभी सोचा है आपने?

अगर संदीप देव( Sandeep Deo ) के किताब 'कहानी कम्युनिस्टों की' के अनुसार इसका उत्तर ढूंढने का प्रयास किया जाए तो कहा जा सकता है,"भारतीय कम्युनिस्टों ने कभी भी भारत को राष्ट्र नहीं माना इसीकारण सीपीआई ने मजहब के आधार वाली अलग देश की मुस्लिम लीग की मांग का समर्थन किया। दुनिया में कहीं भी मार्क्सवादी लोग इस्लाम के प्रति इतने सदस्य नहीं रहे जितने भारत में। इसका रहस्य यह है कि इस्लाम और मार्क्सवाद,दोनों साम्राज्यवादी राजनीतिक विचारधाराएं हैं।"(पेज-124-125)

आप असहज हो सकते हैं,जब आपको मालूम चलेगा कि काश्मीर में पत्थर चलाने वालों को 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के आधार पर सही ठहराया जाता है,देश-विरोधी नारों को इसी 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के आधार पर 'असहमति का हक करार दिया जाता है,पवित्र गाय खाने पर एक मुसलमान के वध के कारण भारत असहिष्णु हो जाता है और संस्कृति की बात करने वाला संघी एजेंट हो जाता है।

है न अजीब?
      यदि संघ से संबंध रखने वाला कोई व्यक्ति है तो उसे सांप्रदायिकता का प्रमाण पत्र दे दिया जाता है,लेकिन जब कई विद्वानों और इतिहासकारों का संबंध किसी वामपंथी संगठन से हो तो इनका कौमार्य(वर्जिनिटी) भंग नहीं होता!

यहीं वह मर्म है,जिसकारण संघ के छात्र इकाई के सदस्य को गुंडे कहा जा रहा है क्योंकि इन्हें यह संगठन हर मोड़ पर चुनौती पेश कर रहा है और मुँहतोड़ जवाब दे रहा है। यहीं तो फितरत है इनकी!