Saturday, 25 February 2017

वामपंथी पत्रकार ही सबसे ज्यादा असहिष्णु हैं!

मैं दूसरे का नहीं,अपना ही उदाहरण दूँगा-एक समय जो मेरे ब्लॉग से प्रभावित होकर खुद ही सोशल मीडिया पर फ्रेंड बनाते हैं और अपनी लगभग हर बात पूर्वाग्रह से लिखते हैं और साथ ही भक्त,चेलों-चपाती जैसे निम्न स्तरीय भाषा का प्रयोग करते हैं।

आपको जानकार ताज्जूब तब होगा कि ये कैसे अपनी लोकप्रियता बढ़ा लेते हैं-वास्तव में ये सब अव्वल दर्जे के भाई-भतीजावादी होते हैं-इनके शोध और लेखों में वो कोई जान और मर्म नहीं होता लेकिन फिर भी अगर दिल्ली का कोई वामपंथी कुछ भी कहता है तो आँख मूँदकर बंगाल और केरल के समस्त वामपंथी उसके हाँ में हाँ मिला देते हैं और वो मामूली सा व्यक्ति अपने को महान समझने लगता है।

ये पत्रकार जो अपने वाल पर जो चाहे वो लिखते हैं,विरोधियों के आलोचना में ये इतने निम्न-स्तरीय शब्दों का प्रयोग करते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुहाई देते हैं लेकिन दूसरी विचारधारा के समर्थक जब इसी तरह के शब्दों का प्रयोग करता है तो इनकी नानी याद आने लगती है और सीधे ब्लॉक कर देते हैं। जो शुरुआत में खुद फ्रेंड बनाते हैं और जब खुद ही ब्लॉक करते हैं तो इनकी मंशा समझ सकते हैं। अभी तक कई पत्रकारों जिनका ताल्लुक इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप,टाइम्स ऑफ़ इंडिया उर हिंदुस्तान टाइम्स से रहा है अभी हाल में ही ब्लॉक कर दिए। मैं इनसभी की भाषा के स्तर और नाम को तो बता सकता हूँ लेकिन क्या मिलेगा? मेरा स्तर इनके जैसा उतना निम्नस्तरीय नहीं है कि नाम बताऊँ!

पर इनके भाई-भतीजावादी को हम एक इतिहासकार के वक्तव्य द्वारा समझाने का प्रयास करेंगे -

इसकी पुष्टि के लिए जाने-माने पत्रकार अरुण शौरी ज़ी टीवी के एक कार्यक्रम 'आपकी अदालत,आपका फैसला' का जिक्र करते हैं,जिसका संचालन मनोज रघुवंशी द्वारा किया गया था। इस चर्चा में मशहूर इतिहासकार श्री के.एम. श्रीमाली और वे खुद मौजूद रहे थे। जब श्रीमाली से रघुवंशी ने पूछा कि आपके पास क्या प्रमाण है या कहाँ लिखा है कि प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था ?(श्रीमाली,डी.एन. झा के प्रबल समर्थक थे।)

       श्रीमाली जी ने गर्व से कहा - "इस बारे में सैकड़ों लिखित प्रमाण मौजूद है।"
       "किस वेद में,किस ग्रन्थ के किस श्लोक में यह लिखा है ?" - रघुवंशी ने पूछा।
       इसपर श्रीमाली जी बोले - "मैं पुस्तकें तो नहीं लाया हूँ लेकिन हर कहीं प्रमाण मिल जाता है।"
       "लेकिन आप एक श्लोक तो बता दीजिये।" - रघुवंशी ने दोबारा पूछा।

       श्रीमाली जी एक श्लोक भी नहीं बता पाए,ग्रन्थ तो दूर।

       इसी बीच दर्शक दीर्घा से एक व्यक्ति बोला कि ये हैं,चारों वेद,इसमें कहाँ लिखा है,आप पढ़ के दिखाइये।
श्रीमाली जी ने उसे पढने से इनकार कर दिया और वे ठिठक गए।

       जाहिर सी बात थी कि ऐसी कोई प्रमाण ही नहीं है कि प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था। यह सब इन वामपंथी इतिहासकारों का अटकलवाजी और षडयंत्र था/है - हिंदुओं के खिलाफ। लेकिन यह तो स्पष्ट था कि श्रीमाली अच्छा प्रभाव नहीं छोड़ पाए।

ठीक ऐसा ही टीवी के एक पत्रकार के साथ भी हो रहा है!

जरा ध्यान दें-जब एक पत्रकार दुनिया की हर एक चीज को बारीकी से दिखाने का दावा करता हो,अपने को निष्पक्ष कहता हो और संतुलित खबर कहकर समाज में अपनी पैठ जमाने की प्रयास करता हो तो केवल इतना कहने भर से आप आँख मूँदकर इसपर विश्वास कर सकते हैं?

आप सोंचे अभी 'रामजस कॉलेज' का मामला प्रकाश में आया कि इस पत्रकार ने इसपर ही प्राइम टाइम नामक शो कर डाला,लेकिन अपने भाई जिसपर बलात्कार और सेक्स रैकेट चलाने का गंभीर आरोप लगा हो खामोश हो गया।

जब आप इस कार्यक्रम को देखेंगे तो कहीं भी आपको उन नारों को देखने को नहीं मिलेगा जिसमें 'बस्तर और काश्मीर के आजादी के नारे' लगे हैं लेकिन वो हर चीज देखने को मिलेगी ताकि जिससे संघ के छात्र इकाई के बहाने भाजपा-संघ को घेरा जा सके। क्या इसे आप संतुलित पत्रकारिता कहेंगे? हरगिज नहीं! तो दावा किस आधार पर किया गया है?

कुछ दिनों से मीडिया(खासकर न्यूज चैनल वाले) अपने आप को काफी शक्तिशाली समझ बैठे थे और मामूली खबर को भी इनके द्वारा राष्ट्रीय खबर बना दिया जाता था। बीते कुछ दिनों से हम देख ही रहे हैं - दिल्ली के कुछ लफंगों द्वारा किया गया चर्च पर हमला को असहिष्णुता के रूप में,पानसरे आदि की हत्या को एक विशेष संगठन से जोड़ कर पेश किया गया और सबसे बड़ी बात यह कि अखलाख-वध को इतना बढ़ाया गया कि इसपर पैसों की बरसात ही हो गयी। यह सब ऐसे ही अव्वल दर्जे के दलाल पत्रकारों के बदौलत हुआ है।

इसलिए अब वक्त आ गया है ऐसे पत्रकारों को सबक सिखाने का!

ABVP के गुंडे नहीं बल्कि वास्तविक देशभक्त हैं!

जिंदा वहीं रहता है जो मरने के साथ-साथ मारना भी जानता हो,यहीं कारण है कि हमारी संस्कृति हमें एक हाथ में 'शास्त्र' और दूसरे हाथ में 'शस्त्र' को धारण करने को कहती है।

जरा सोचिए - "आज वामपंथियों का मसीहा कौन है?"
जवाब आसान है - "वह जो माओवादियों से सहानूभूति रखता हो,आतंकवादियों को मंच देता हो,काश्मीर के पत्थरबाजों को अभिव्यक्ति के अधिकार के तहत सही ठहराता हो,अपनी सभ्यता तथा संस्कृति की बात करने वालों को सांप्रदायिक कहता हो और तो और देश-विरोधी नारा लगाने वालों को योद्धा समझता हो।"

इसी तरह की मानसिकता का उपज हैं,"JNU का एक पूर्व छात्र नेता जो अध्यक्ष रह चुका था,कभी इतिहासकार रामशरण शर्मा को वामपंथ का दीप्तिस्तंभ समझा जाता था और आज यहीं छात्र नेता वामपंथ चेहरों का मसीहा हो गया है;जिस व्यक्ति को रामजस कॉलेज आमंत्रित किया गया था,वह भी इसी कतार में है और देश विरोधी हरकत करके मामूली ही सही लेकिन सतही लोकप्रियता हासिल कर चुका है। पर ये भूल जाते हैं कि 'चार दिन की चाँदनी और फिर अंधेरी रात' को लागू होते हुए हम रोज देखते हैं।"

आज वामपंथियों को आतंकवादियों से सहानुभूति क्यों है? क्यों ये अकसर कसाब,अफजल आदि जैसों की मानवाधिकार की बातें करते हैं? कभी सोचा है आपने?

अगर संदीप देव( Sandeep Deo ) के किताब 'कहानी कम्युनिस्टों की' के अनुसार इसका उत्तर ढूंढने का प्रयास किया जाए तो कहा जा सकता है,"भारतीय कम्युनिस्टों ने कभी भी भारत को राष्ट्र नहीं माना इसीकारण सीपीआई ने मजहब के आधार वाली अलग देश की मुस्लिम लीग की मांग का समर्थन किया। दुनिया में कहीं भी मार्क्सवादी लोग इस्लाम के प्रति इतने सदस्य नहीं रहे जितने भारत में। इसका रहस्य यह है कि इस्लाम और मार्क्सवाद,दोनों साम्राज्यवादी राजनीतिक विचारधाराएं हैं।"(पेज-124-125)

आप असहज हो सकते हैं,जब आपको मालूम चलेगा कि काश्मीर में पत्थर चलाने वालों को 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के आधार पर सही ठहराया जाता है,देश-विरोधी नारों को इसी 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के आधार पर 'असहमति का हक करार दिया जाता है,पवित्र गाय खाने पर एक मुसलमान के वध के कारण भारत असहिष्णु हो जाता है और संस्कृति की बात करने वाला संघी एजेंट हो जाता है।

है न अजीब?
      यदि संघ से संबंध रखने वाला कोई व्यक्ति है तो उसे सांप्रदायिकता का प्रमाण पत्र दे दिया जाता है,लेकिन जब कई विद्वानों और इतिहासकारों का संबंध किसी वामपंथी संगठन से हो तो इनका कौमार्य(वर्जिनिटी) भंग नहीं होता!

यहीं वह मर्म है,जिसकारण संघ के छात्र इकाई के सदस्य को गुंडे कहा जा रहा है क्योंकि इन्हें यह संगठन हर मोड़ पर चुनौती पेश कर रहा है और मुँहतोड़ जवाब दे रहा है। यहीं तो फितरत है इनकी!

Wednesday, 22 February 2017

NDTV का एक पत्रकार जिसे स्क्रीन काला करने का शौक रहा है,अब खुद में कालिख लगाकर स्टूडियो में बैठ जाना चाहिये


(इस आलेख में प्रयुक्त नाम से लेखक का कोई सरोकार नहीं है,यह उन लोगों का वक्तव्य है जो इस पत्रकार के पक्ष या विपक्ष में टिप्पणी लिखें है और उनका ही संदर्भ लिया गया है।)

(एक पत्रकार का भाई बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का आरोपी और उस पत्रकार की चुप्पी।)

इंडिया टीवी के एडिटर अभिषेक उपाध्याय व्यंग्य करते हुए अपने फेसबूक पेज पर लिखते हैं,"ज़बरदस्ती में भाई लोग एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय के पीछे पड़ गए हैं। अरे भई, हाँ। रवीश कुमार। अब खानदानी नाम रवीश पांडेय है तो क्या हुआ? सेक्युलर हैं। सर्वहारा समाज के प्रतिनिधि हैं। रवीश कुमार ही सूट करता है। अब क्या हो गया जो इन्ही रवीश पांडेय, माफ़ कीजिएगा रवीश कुमार के बड़े भाई ब्रजेश पांडेय बलात्कार के मुकदमे में हैं। पीड़ित भी कौन? एक दलित लड़की! वो भी नाबालिग? ज़िला मोतिहारी। बिहार। सेक्स रैकेट चलाने का मामला अलग से है!"

व्यंग्य को आगे बढ़ाते हुए लिखते हैं,"अब ये कौन सी बात हुई कि बिहार में तो नितीश कुमार की पुलिस है? भाई साज़िश मत करो रवीश कुमार के खिलाफ। कौन हैं ये नितीश कुमार। बोलो। कौन हैं? अबे, ये बीजेपी के एजेंट हैं। और क्या! रवीश कुमार के ख़िलाफ़ जो भी एक लफ्ज़ बोलेगा, वो बीजेपी का ही एजेंट होगा। जाओ, निकलवाए लो उस दलित लड़की की भी जनम कुंडली। बाप नही तो दादा। दादा नही तो परदादा। या उनके भी दादे। कोई न कोई बीजेपी से सटा रहा होगा। अब बीजेपी तब नही थी तो क्या हुआ!! तुम निकलवाए लो कुंडली। सावरकर और गोलवलकर के साथ कभी घूमे होंगें। इनके दादे-परदादे।"

क्या अच्छा नारा गढ़ा है इन्होंने,आप नीचे पढ़ सकते हैं-

“ब्रजेश पांडेय को बचाना है
और
उस दलित लड़की को
झूठा साबित करके दिखाना है।”
अब ये कौन साला आ गया है जो तेज़ आवाज़ में लाउडस्पीकर पर बल्ली सिंह चीमा की कविता बजाए जा रहा है? रवीश कुमार को सुनाए जा रहा है-
“तय करो किस और हो तुम
आदमी के पक्ष में हो
या फिर कि आदमखोर हो तुम।”
भगाओ…मारो….साले को… चुप कराओ… यहां नैतिकता का इकलौता ठेकेदार पत्रकार जीवित है!!! वो भी नही देखा जा रहा है इनसे!!!!

           
        वहीं बचाव में पत्रकार ओम थानवी 'मीडिया खबर' नामक एक वेबसाइट पर लिखे हैं," लेकिन महज़ आरोपों के बीच सोशल मीडिया पर रवीश कुमार पर कीचड़ उछालना क्या ज़ाहिर करता है? निश्चय ही अपने आप में यह निहायत अन्याय भरा काम है। आरोप उछले रिश्तेदार पर और निशाने पर हों रवीश कुमार? इसलिए कि उनकी काली स्क्रीन कुछ लोगों के काले कारनामों को सामने लाती रहती है?

ज़ाहिर है, यह हमला रवीश पर नहीं, इस दौर में भी आलोचना का साहस रखने वाली पत्रकारिता पर है। पहले एनडीटीवी पर “बैन” का सीधा सरकारी हमला हो चुका है। अब चेले-चौंपटे फिर सक्रिय हैं। इन ओछी हरकतों में उन्हें सफलता नहीं मिलती, पर लगता है अपनी कोशिशों में ख़ुश ज़रूर हो लेते हैं। अजीब लोग हैं।"

सच ही कहा गया है,इन वामपंथियों के लिए किसी भी चीज की अहमियत तभी तक है जबतक वह उनका भला करे,चाहे अभिव्यक्ति की आजादी हो या सोशल मीडिया!

अभी कुछ दिन पहले ही जब सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खेलवाड़ किये जाने के बाद इसी चैनल पर एकदिन का प्रतिबंध लगाया गया तो सोशल मीडिया के बदौलत ही पक्ष में मुहीम चलाया गया और कई पेज और ग्रुप बनाये गए,उस समय इसकी महत्ता का पूल बाँध दिया गया था और तुलना अरब स्प्रिंग से किया जाने लगा था लेकिन आज इन पत्रकारों के मुखारबिंद पूरा का पूरा 180 डिग्री घूम गया है।

वहीं पुस्तक 'कहानी कम्युनिस्टों के' लेखक संदीप देव अपने फेसबुक पेज पर लिखते हैं," छोटा भाई पत्रकारिता में दलाल है और बड़ा भाई औरतों का दलाल! वाह रवीश बाबू 'बागों में बहार' है!

छोटा भाई पत्रकारिता में दलाल है और बड़ा भाई( बिहार का कांग्रेसी नेता ब्रजेश पांडे) लड़कियों का! वाह रवीश बाबू खानदानी मुंह काला करने वालों में से हो, तभी टीवी का स्क्रीन काला करने का आइडिया तुम्हें ही सूझा! और हां, तभी नौकरी के लिए तुमने सबसे बड़े दलाल चैनल का चुनाव किया था और दशकों से वहीं पड़े हो! आखिर दलाली के धंधे में टिकाऊ होना जरूरी जो है!

अब यह मत कहना कि तुम दलाल नहीं हो! दलाल नहीं होते तो लड़कियों की दलाली करने वाले अपने भाई को पत्रकारिता के बल पर सबसे बड़ी दलाल पार्टी कांग्रेस में सेट नहीं कर पाते!

सही पत्रकारिता करने वाले पत्रकार बिहार और यूपी में गोली खा रहे हैं, और दिल्ली में पत्रकारिता को बेचने वाले अपने और अपने परिवार को राजनीति में सेट करने में लगे हैं! यह फर्क है असली पत्रकार और दलाल पत्रकार में! 'बागों में बहार' तुम जैसों के लिए है रवीश बाबू, असली पत्रकार तो आज भी दो जून की रोटी में ही पिस रहा है!"

मैंने चैनल पर लगे प्रतिबंध दौरान लिखा था," NDTV का एक पत्रकार(एंकर) अपनी मूढ़ता को पा गया है!"

इसमें कोई संदेह नहीं कि 4 नवंबर का प्राइम टाइम शो सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा भेजे गए नोटिस का एक प्रतिक्रिया था। यह अपने आप को न जाने क्या समझ बैठा है और देश के कुछ नासमझ लोगों को बरगलाने का प्रयास कर रहा है और चैनल पर नौटंकी करके बरगला भी देगा। सरकार द्वारा चैनल पर प्रतिबंध सरकार से सवाल पूछने को लेकर नहीं बल्कि सैन्य जानकारियों का नाजायज रिपोर्टिंग करने को लेकर लगाया गया है लेकिन इस शो में यह मुद्दा नदारद रहा। इस महत्वपूर्ण बात को समझना बहुत ही जरूरी है।

NDTV को शहीद घोषित करने की कवायद भी शुरू कर दी गयी है कि आपातकाल की शुरुआत इस चैनल को एक दिन के लिए प्रतिबंधित करके कर दी गयी है।

जरा सोचिए!
क्या व्यंग्य पत्रकारिता हो सकती है?
बिल्कुल नहीं!
यह पत्रकारिता का मजाक है और पत्रकारिता के इतिहास में काले अध्याय का शुरुआत है। यह व्यक्ति इतना बौखला गया है कि बार-बार दोहराते नजर आता है,अगर हम सवाल पूछेंगे तो नोटिस भेज देंगे तो!
मान लीजिए यह नोटिस खत्म हो जाए तो क्या धान बेचेंगे?

इतना घठियापन तो एक वेश्या भी नहीं करती है जो डंके के चोट पर अपने शरीर का व्यापार करती है। एक चैनल जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपनी रिपोर्टिंग से खतरा उत्पन्न कर रहा है और पहले तो चोरी करके ऊपर से धौंस जमाने का प्रयास कर रहा है और वहीं कुछ नासमझ लोग हैं जो एक सड़-गल चुकी विचारधारा से गहरे प्रभावित होकर इसका समर्थन कर रहे हैं।

खैर,जिन दो लड़कों को चुना और ओठलाली लगाकर स्टूडियो में बैठाया गया था,वहीं इस चैनल के लिए शर्म की बात है, अगर चुना लगे लड़कों के चेहरे पर जगह-जगह काला टीका लगा दिया जाता तो NDTV के शर्मिंदगी में चार चाँद लग जाता।

अब वो वक्त आ गया है कि ऐसे पत्रकारों के मुँह पर जबरजस्ती कालिख पोतने का ताकि देश को पूर्वाग्रहशीलता और निष्पक्षता का ढोंग रचाने वालों से देश को मुक्ति मिल सके।

Wednesday, 15 February 2017

वैवाहिक बलात्कार (marital rape)

भारत में वैवाहिक बलात्कार की अवधारणा को लागू नहीं किया जा सकता जहाँ शादी को पवित्र बंधन माना जाता है।

इस पर अब विचार करने का वक्त आ गया है कि क्या भारत में वैवाहिक बलात्कार को अपराध माना जाये?

16दिसंबर की बहुचर्चित बलात्कार कांड के बाद गठित 'जेएस वर्मा समिति' वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाने की सिफ़ारिश कर चुकी है लेकिन सरकार ने उस वक्त स्वीकार नहीं किया था।

इस मुद्दे पर समाज और विद्वान बंटे हुये हैं - कुछेक का मानना है," कानून से छेड़छाड़ करने की कोई जरुरत नहीं है क्योंकि इसका दुरुपयोग हो सकता है।"
आज महिलाओं द्वारा पतियों और ससुराल के लोगों को झूठा फंसाये जाने के काफ़ी अधिक उदाहरण सामने आ रहे हैं। यह सामाजिक स्थिरिता के लिये खतरनाक होगा। आज दहेज के रोकथाम के लिए बनाया गया कानून कुख्यात रूप धारण कर चुका है और परिवार जैसी संस्था के लिए ही समस्या पैदा कर दिया है जो आज टूटने के कगार पर है।

जबकि इसका समर्थन करने वाले UNO के एक रिपोर्ट " The 2011 Progress of the world's woman : The persuate of justice " का हवाला देकर कहते नजर आते हैं कि अमेरिका,आस्ट्रेलिया सहित दुनिया के 52 देशों में 'वैवाहिक बलात्कार' अपराध है तो भारत में क्यों नहीं हो सकता? जब घरेलू हिंसा से महिलाओं को बचाने के लिये कानून है तो वैवाहिक बलात्कार के लिये क्यों नहीं होना चाहिये?

बिल्कुल होना चाहिए लेकिन क्या किसी बाहरी समाज का तुलना भारतीय समाज के परिप्रेक्ष्य में किया जा सकता है जो कई मायनों में काफी अलग है। यह बहस का ज्वलंत विषय है।

पर सबसे बड़ा सवाल जो उभरकर आता है,"यह कैसे साबित होगा या किया जाएगा कि यौन संबंध बनाते समय किसी महिला की सहमति थी या नहीं?" इस मामले में तो पूरा का पूरा एकाधिकार महिलाओं पर आ जाता है और पुरुष के लिए कुछ बचता ही नहीं है। चूकि कानून तो सभी को बराबरी का अधिकार देता है लेकिन इस परिप्रेक्ष्य में तो क़ानून के मूल उद्देश्य का पूर्ति ही नहीं होता इसकारण कोई औचित्य ही नहीं बनता कि वैवाहिक बलात्कार को कानूनी रूप से अपराध बनाया जाए।

अगर कोई महिला इस तरह का आरोप लगा रही है कि उसका पति उसके मना करने के बाद भी वैवाहिक बलात्कार जैसी हरकत कर रहा है तो उससे तलाक लेने का पूरा का पूरा अधिकार महिला को है।

ऐसे भी यह किसी वैवाहिक दंपती का निजी मसला है,इसे सार्वजनिक करने से क्या फ़ायदा?
लेकिन सवाल यहाँ फिर से खड़ा हो जाता है,"केवल महिलाओं से संबंधित मुद्दों को ही दुरुपयोग के लिये संवेदनशील के रुप में क्यों देखा जाता है? महिलाओं को इसका अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिये?

अगर झूठे फँसाये जाने और दुरूपयोग का हवाला देकर विरोध करते हैं तो हमारी व्यवस्था को दुरुपयोग से निपटने में सक्षम होना चाहिये,अगर ऐसा नहीं हो सकता है तो यह व्यवस्था की विफलता है। फिर महिलाओं पर दुरूपयोग का दोषारोपण कैसे लगाया जा सकता है?

अगर इसके कानूनी प्रावधान को देखा जाए तो आईपीसी(IPC) की धारा 375 जो बलात्कार(rape) को परिभाषित करता है,यह वैवाहिक बलात्कार के मामले में एक अपवाद प्रदान करती है,"किसी व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी,जिसकी उम्र 15 साल से कम न हो यौन संबंध बनाना बलात्कार नहीं है।"
जेएस वर्मा कमिटि ने इसी प्रावधान में संशोधन की बात कही थी। आज महिला संगठन और कुछ NGO जो महिला अधिकार की रक्षा का बात करते हैं वे इसी को बदलने की बात कह रहे हैं।
                   
अगर वैवाहिक बलात्कार को अपराध बना दिया जाता है तो इसके कई दूरगामी परिणाम देखने को मिलेंगे जो खतरनाक भी हो सकते हैं -
a)भारत की अधिकांश महिलायें जीवन पर्यंत अपने पति पर आश्रित रहती है,अगर वह किसी सामाजिक कार्यकर्ता और अन्य के कहने पर इस मामले को लेकर अदालत जाती हैं तो कोई भी पति इसे बर्दास्त नहीं करेगा,दोनों के बीच तलाक होना निश्चित हो जायेगा। जिसकारण निम्न प्रभाव उत्पन्न होंगे - पहली,सामाजिक अस्थिरता होने का डर हमेशा सताते रहेगा और दूसरी,महिला का जीवन और गर्त में चला जायेगा क्योंकि भारतीय समाज अभी उतना परिपक्व नहीं हुआ है कि वह किसी अकेली शादीशुदा महिला पर चारित्रिक लांछन नहीं लगाये।

b)शादी एक संस्था है जिसे सामाजिक मान्यता प्राप्त होती है अगर पति को वैवाहिक बलात्कार के मामले में अपराधी बनाने की कोशिश पत्नि द्वारा की जायेगी तो हम तेजी से उस समाज की ओर अग्रसर होंगे जो पश्चिमी सभ्यता की देन है। अगर ऐसा हो गया तो हमारी बुनियाद ही हिल जायेगी जिसे हम सदियों से संजोकर रखे हुये है।

अंत में,
एक व्यावहारिक अनुभव है - शादी के बाद पति और पत्नि एक दूसरे से इस कदर जुड़ जाते हैं कि उनमें एक सामान्य(comman) समझदारी पनप जाती है,ये एक-दूसरे की इच्छा और अनिच्छा का इज्जत करने लगते हैं। जिस कारण उनके बीच वैवाहिक बलात्कार जैसी कोई भी घटना होने की संभावना कम है।

Tuesday, 14 February 2017

चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन और दैनिक जागरण

दैनिक जागरण पर आरोप लगाया गया है कि इसके वेबसाइट पर यूपी चुनाव के पहले चरण के बाद ही एग्जिट पोल दे दिया गया। जागरण के स्पष्टीकरण के बाद भी आयोग अपने रुख पर कायम रहा।

चुनाव आयोग का यह फैसला बहुत ही सही है,इसपर अंगुली नहीं उठाया जा सकता। आने वाले दिनों में जाँच के बाद बहुत जल्द ही स्पष्ट हो जाएगा कि यह भूल थी या जानबूझकर किया गया था। अगर जानबूझकर किया गया तो किसके कहने पर किया गया? क्या इस प्रक्रिया में किसी पार्टी विशेष से पैसा भी लिया गया?

ये सभी अनजाने सवालों के उत्तर अभी पर्दे के पीछे हैं। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह कि जिस पार्टी को बड़ी पार्टी के रूप में जागरण द्वारा बताया गया था क्या उस पार्टी की मिलीभगत मीडिया संस्थानों से तो नहीं ताकि चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित किया जा सके। अगर है और जाँच में पाया जाता है तो यह बहुत ही खतरनाक है।

कानून स्पष्ट है," जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 ए के मुताबिक यूपी चुनाव पर कोई भी व्यक्ति, 4 फरवरी की सुबह 7 बजे से लेकर 8 मार्च के शाम साढ़े 5 बजे तक कोई एग्जिट पोल नहीं कर सकता या इनके नतीजों को प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर प्रकाशित नहीं कर सकता। दोषी पाए जाने पर दो साल की कैद या जुर्माना या दोनों ही सजा का प्रावधान है।"(व्याख्या करके लिखा गया है।)

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में जिस मीडिया को जाना जाता था,उसके पतन को रोकने का एकही तरीका है कि मामूली गलती पर भी कानून के मुताबिक कठोर दंड दिया जाए।

मामले को सतह पर आने के बाद चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के 15 जिले के चुनाव अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे दैनिक जागरण के खिलाफ चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में संपादकीय विभाग के मीडिया हेड के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज करायें और इसके बाद दैनिक जागरण के  प्रबंध संपादक, संपादक और एग्जिट पोल कराने वाली संस्था रिसोर्स डेवलपमेंट इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड यानि आरडीआई के खिलाफ जिला चुनाव अधिकारियों द्वारा केस दर्ज कराया गया।

केस दर्ज कराने के बाद जागरण डॉट कॉम के संपादक शेखर त्रिपाठी और अन्य अधिकारियों तथा संपादकों को गाजियाबाद पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया है।

हालांकि जागरण की ओर से कहा गया है,"डिजिटल इंग्लिश प्लेटफॉर्म के अलावा एग्जिट पोल से संबंधित खबर दैनिक जागरण अखबार में नहीं छापी गयी। इंग्लिश वेबसाइट पर एग्जिट पोल से जुड़ी एक खबर अनजाने में डाली गयी थी, इस भूल को फौरन सुधार लिया गया और संज्ञान में आते ही वरिष्ठ अधिकारियों की तरफ से संबंधित न्यूज रिपोर्ट को तुरंत हटा दिया गया था।’’

फिर भी चुनाव आयोग अपने आदेश पर कायम रहा। बहुत जल्द ही सच्चाई निकलकर सामने आ जाएगी।