Wednesday, 4 January 2017

Justice/court view - खेल प्रशासन सुधार

खेल से संबंधित हाल के दो अजीबोगरीब घटनाओं की बात करें तो उसमें शामिल है - BCCI से अनुराग ठाकुर और अन्य को सुप्रीम कोर्ट द्वारा हटाया जाना और भारतीय ओलंपिक महासंघ में सुरेश कलमाड़ी जैसों का आजीवन अध्यक्ष के रूप में वापसी,जबकि इनको पूर्व में भ्रष्टाचार के कारण अपना पद गंवाना पड़ा था। हालांकि कलमाड़ी ने खेल मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद पद स्वीकार नहीं किया।

यहाँ मूल रूप से कई सवाल उभरकर सामने आ रहे हैं,जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है - क्या ऐसे मामलों में अदालती और सरकारी हस्तक्षेप जरूरी है?

भारत में बहस का स्तर मेरे अनुसार तो लगभग एकतरफा और पूर्वाग्रहग्रस्त होता है और लोग एक ही धारा को पकड़ कर चलने लगते हैं। हो सकता है कुछ का मानना हो कि अदालती कार्रवाई सही है लेकिन सरकारी कार्रवाई नहीं या इसके उल्टा पर कई लोग सहमत हों और कुछ तो दोनों हस्तक्षेप चाहे अदालती हो या सरकारी को सही मानते होंगे।

पर मुद्दा यहाँ खेल खेलने को लेकर तथा उसके प्रबंधन और प्रशासन को लेकर है। खेल खेलना एक बिल्कुल अलग मसला है,खिलाड़ी अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ हो सकते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि प्रशासन का कार्य वे पेशेवर प्रशासकों और राजनेताओं की तरह कर दे।

भारत में हाल ही में हमें एक सदमा लगा है जिससे कई दशकों से चल रही उस धारणा को गहरी चोट लगी है कि शिक्षित व्यक्तियों का समूह राजनीति और सरकार को अच्छे से चलाकर समाज और देश में खुशहाली ला सकता है,लेकिन क्या हुआ? दिल्ली में। बताने की जरूरत नहीं,आप सभी को जानकारी है। आज सदियों पहले यूनानी दार्शनिक प्लेटो के 'दार्शनिक राजा' की असफलता को फिर से दोहरा दिया गया है। खैर.....

ध्यान देने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात है कि मेरे अनुसार बुद्धिजीवी और न्यायाधीश यथार्थवादी कम आदर्शवादी ज्यादा होते हैं तथा साथ ही सैद्धांतिक ज्यादा और व्यावहारिक कम होते हैं। इसीकारण लोढ़ा समिति ने तो क्रिकेट संघ में राजनेताओं को पदाधिकारी न बनने की अनुशंसा कर डाली। पर क्या यह संभव है? समाज को जितने अच्छे से राजनेता समझते हैं और संस्थाओं को चलाने का अनुभव होता है,वह शायद और लगभग किसी के पास नहीं होता। इसकारण क्यों न एक व्यापक आदर्श संहिता,आचरण संहिता और नियमावली को बनाकर ऐसे नेता रूपी प्रशासक को जवाबदेह बनाने का प्रयास करें। इससे न केवल उस बड़ी रकम को भी बचाया जा सकेगा जो किसी खिलाड़ी विशेषज्ञ को प्रशासक बनाने में खर्च किया जाएगा।

मुख्य विरोधाभास भारत के राष्ट्रीय क्रिकेट संघ की स्वायत्तता को लेकर है,जो फीफा और ओलंपिक आंदोलन की भावनाओं को व्यक्त करना चाहती है कि ये सरकारी नियंत्रण से परे होना चाहिए। हालांकि वित्तीय मदद और सुरक्षा आदि सरकार द्वारा ही मुहैया कराया जाता है। इसी विरोधाभास को दूर करना होगा!

"खेलने और एडमिनिस्ट्रेशन में काफ़ी फ़र्क होता है" इसकारण बहस का मुद्दा "टेक्नोक्रैट बनाम ब्यूरोक्रेट" होना चाहिए!

क्रिकेट बोर्ड से अनुराग ठाकुर को हटाए जाने पर मुझे तो कोई हैरानी नहीं हुई क्योंकि अदालत जैसी संस्था को अगर भारत के संदर्भ में समग्र विश्लेषणात्मक रूप में कहें तो यह पूरी तो नहीं लेकिन आंशिक रूप से कन्फ्यूज्ड है। हो सकता है,आने वाले दिनों में कुछ ऐसी ही स्थिति तैयार हो जाए।

एक टिप्पणीकार मेमन के अनुसार,"कोशिश है कि अगर आप इतना बड़ा बोर्ड चला रहे हैं, तो कुछ एक्सपर्ट वैल्यू होनी चाहिए। जो गेम खेले हैं, जो गेम समझते हैं, वो ऐसा कर सकते हैं। लेकिन अगर आप ये सोचें कि हर बोर्ड में खिलाड़ी ही अध्यक्ष बन जाए और वो उसे कामयाबी से साथ चला भी लें, ये संभव नहीं है। क्योंकि खेलने और एडमिनिस्ट्रेशन में काफ़ी फ़र्क होता है।"

उपर्युक्त बात से मैं पूरी तरह इत्तेफाक रखता हूँ,खासकर "खेलने और एडमिनिस्ट्रेशन में काफ़ी फ़र्क होता है" से। अगर आपने पंकज कपूर की फिल्म 'एक डॉक्टर की मौत' देखी होगी तो यह बात भलीभाँति समझते होंगे,"एक टेक्नोक्रैट की तुलना में एक प्रशासक" काफी बेहतर काम करता है।

बहस को "टेक्नोक्रैट बनाम ब्यूरोक्रेट" पर केंद्रित करके अहम परिणाम पा सकते हैं। भले ही ठाकुर न हों लेकिन इनके जगह इनके जैसा कोई प्रशासक ही संगठन को प्रबंधित कर सकता है। क्योंकि एक टेक्नोक्रैट के पास केवल एक विषय के बारे में बेहतर जानकारी रहती है और अन्य विषयों से लगभग अनजान रहता है,वहीं ब्यूरोक्रैट लगभग सभी विषयों पर बराबर की जानकारी रखता है और कोई भी फैसला इन सभी विषयों को ध्यान में रखकर ही लेता है कि इसका प्रभाव क्या पड़ेगा,फायदे और नुकसान क्या होंगे? लेकिन एक टेक्नोक्रैट के लिए यह संभव नहीं है।