Monday, 8 May 2017

International/global issues - फ्रांस में दक्षिणपंथ की हार : एक भिन्न नजरिया!

        आज नहीं बल्कि भारत में मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवारी मिलने और आम चुनाव में जीत के बाद से सुन रहा हूँ,"बेरोजगारी,आतंकवाद और राष्ट्रवाद आदि वो मुख्य वजहें हैं जो राष्ट्रवाद की उभार में सहायक होती है।" इन वजहों को भारत लोकसभा चुनाव,अमेरिका में ट्रंप की जीत,ब्रिटेन का ईयू से अलग होना और हॉलैंड तथा फ्रांस में दक्षिणपंथी रुझान की बढ़ती लोकप्रियता को आधार मानकर कुछ स्वयंभू पत्रकारों और पूर्वाग्रहग्रस्त इलीट द्वारा प्रमाणित भी कर दिया गया। लेकिन......

         इस सवाल का जवाब देने की जोहमत किसी ने नहीं दिखाई कि अगर दक्षिणपंथ के उभार की वजहें उपर्युक्त साधन है तो वामपंथ के लिए क्या है? यहीं पर संतुलित और निष्पक्ष पत्रकारिता की पोल खुल जाती है।

         कल एक हिंदी चैनल(स्क्रीन काला करने वाला) के प्राइम टाइम का इंट्रो सुनने के बाद ऐसा लगा कि भारत में हिंदी टीवी पत्रकारों के बुद्धि का स्तर क्या है?(1) धारा के साथ सामंजस्य बैठाने की एक कबाड़ प्रवृति का विकास तेजी से ऐसे पत्रकारों में हो चला है। दूसरे का नाम देकर,संदर्भित करके अपने मन की बात को उजागर करने का नायाब तरीका ईजाद कर लिया गया है। खैर.......

         फ्रांस में मैक्रों की जीत भारत के केजरीवाल जैसा तो नहीं!

         कहा जा रहा है कि महज कुछ ही वर्षों में फ्रांस की राजनीति में आये इस बैंकर ने अपने उदार-मध्यमार्गी छवि से अपनी साख बना ली और नेपोलियन के बाद सबसे कम उम्र में फ्रांसीसी गणराज्य के नए शासक के रूप में काबिज हो गए। यह कुछ ऐसा ही हुआ जैसा कुछ साल पहले हम दिल्ली में राजस्व अधिकारी से नेता बने केजरीवाल में देख चुके हैं। दिल्ली तो इस बात की भी गवाही है कि महान सपनों का आंदोलन किसतरह एक धोखा में परिवर्तित होकर रह गया है। फ्रांसीसी गणराज्य को कौन भूल सकता है जहां राब्स्पियर जैसा चरित्र भी पनपा था,जिसने फ्रांस की क्रांति (1789) के ओट में इतना कहर बरपाया था जिसमें उसने सबसे पहले अपने साथियों को निशाना बनाया,फिर खुद बर्बाद हुआ और मारा गया। महान सपनों की क्रांति पहले आतंक और फ़िर तानाशाही में बदली थी।(2)

          इमैनुअल मैक्रों के जीत के कारण!

          मैक्रों को चुनाव में 66.06 फ़ीसदी वोट मिले और उनकी धुर दक्षिणपंथी प्रतिद्वंद्वी मरी ल पेन को 33.94 फ़ीसदी वोटों से ही संतोष करना पड़ा है। इनके जीत के पांच कारण को बीबीसी अपने एक रिपोर्ट में इस प्रकार बताता है-1.किस्मत का कमाल,2.चतुराई,3.फ्रांस में एक नई शुरुआत की,4.सकारात्मक संदेश,5.वो मरी ल पेन के ख़िलाफ़ खड़े थे जिनमें नकारात्मकता झलका रहीं थी। वो अप्रवासन, यूरोपीय संघ और सिस्टम के ख़िलाफ़ खड़ी थीं। (3)

          पर इनके जीत के कारण के मुख्य वजह को नजरअंदाज कर दिया गया जो कई नकारात्मक संदेश धाफ़ं किये हुए है। द हिंदू में छपे एक आलेख में कहा गया है कि मैक्रों के विचारों पर वास्तव में गहराई से चर्चा नहीं किया गया।(4)(5) यहीं वह मुख्य वजह है! इसे नजरअंदाज करना फ्रांस में भी दिल्ली के विधानसभा चुनाव वाली गलती को दोहराना होगा।

          दक्षिणपंथी रुझान वाली मरी ल पेन की उपलब्धि!

          इनकी पार्टी नेशनल फ्रंट की शुरुआत 1972 में छोटे स्तर से हुयी थी। कई वर्षों तक तीखी आलोचना को नजरअंदाज करने के बाद इनको वास्तविक सफलता तब मिली जब यह राष्ट्रीय बहस को प्रभाव डालना शुरू कर दिया। 2002 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में पेन के जीत के उम्मीद को उस समय धक्का लगा जब तथाकथित रिपब्लिकन फ्रंट जो मुख्य धारा के पार्टियों का एक महागठबंधन था इनके खिलाफ लामबंद हो गए।

         पर पंद्रह साल बाद पेन ने उस फ्रंट को नेस्तानाबूद कर डाली और फ्रांस के इतिहास में दक्षिणपंथी रुझान वाले किसी भी संगठन द्वारा 30 प्रतिशत से ज्यादा मत पाकर मुकाम हासिल कर ली और अपने लक्ष्य की तरह एक और कदम बढ़ा दिया। फ्रांस में यह दक्षिणपंथ की हार नहीं बल्कि अमेरिका और भारत के बाद एक ऐसा प्रयोगशाला है है जिसका भविष्य उज्जवलमयी है।(6)

          इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी अगर फिर से लिबरल,लेफ्ट,छद्म सेकुलर और कठमुल्ला जमात हिटलर को विमर्श में वापसी करा दें और दक्षिणपंथ को बदनाम करने का सतही प्रमाणों को पेश करना शुरू कर दे। पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इतिहास ने जितना अन्याय हिटलर के साथ किया है उतना किसी भी राष्ट्रावादी के साथ नहीं। खैर....(7)

         इसलिए आप सावधान हो जाइये! राष्ट्रवाद समाज और व्यक्ति की आत्मा है और दक्षिणपंथ आपके भावनाओं का क़द्र करता है। भले ही चुनावी राजनीति में सीटों के लिहाज से यह पिछड़ता नजर आये लेकिन हर शख्स के दिलो-दिमाग पर यह राज करता है और साथ ही अपनी उपस्थिति हर जगह दर्ज कराता है!

संदर्भ -

1. NDTV प्राइम टाइम का इंट्रो
2. ब्लॉग
3. बीबीसी हिंदी
4. द हिंदू
5. द हिंदू(the centre holds)
6. Same
7. ब्लॉग
8. The guardian

Thursday, 4 May 2017

My diary - मोरल पुलसिंग अवश्यंभावी नजर आ रहा है!

ऐश्वर्या राय,सलमान खान और अजय देवगन की एक फिल्म का संवाद कि ये तो साबित हो गया कि ये सीढियां नीचे से ऊपर जाती है लेकिन इससे यह मालूम नहीं चलता कि यहीं सीढियां ऊपर से नीचे भी आती है! यह वकालती तर्क नहीं बल्कि कुतर्क था जिसे स्वीकार कभी भी नहीं किया जा सकता। सार्वभौमिक वक्तव्यों और तथ्यों को शब्दों के जाल में उलझाया नहीं जा सकता।

माहौल में तेजी से परिवर्तन आ रहा है और प्यार तथा आजादी के नाम पर अश्लीलता का नंगा नाच किया जा रहा है। पटना का 'इको पार्क' तो अभी उस अधोगति को नहीं पाया है जितना दिल्ली में मेट्रो स्टेशनों और कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क या अन्य पार्कों में देखने को मिल जाता है।

अभी मैं दिल्ली के सेंट्रल पार्क में अकेले दोपहर में एक छोटे पेड़ के छाँव में बमुश्किल पांच मिनट ही बैठा होगा कि एक लगभग बदसूरत सी दिखने वाली ठिगनी लड़की एक अपने से लंबे लड़के के साथ मेरे साथ लगे पेड़ की छाँव में बैठ गयी। मिनट भी नहीं गुजरा होगा,शर्म का कोई भाव तो था ही नहीं,बेहयाई तो चरम पर था-लड़का लड़की के पैरों पर सर करके लेट जाता है और लड़की उसके शरीर पर झुक जाती है-सभी के सामने ही वे निर्लज्जता उदाहरण पेश करने लगते हैं। कपड़े के ऊपर से ही चरित्रहीन लड़का उस चरित्रहीन लड़की के स्तन को मुंह में लेकर सारी हदें पार कर देता है। कई जन वहाँ से गुजरते रहते हैं लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता है और अंत में मुझे ही वहाँ से बाहर निकलना पड़ता है।

मुझे ताज्जूब तब होती है जब मैं देखता हूँ कि ऐसे घिनौने काम करने वालों में वह अकेला नहीं था बल्कि कई जोड़े इस काम में मशगूल थे और अपने परिवार और समाज की इज्जत का धज्जियाँ उड़ा रहे थे। पीछे में अपने माता-पिता को शर्मसार कर रहे थे और पश्चिमीकरण का आधुनिकता के रूप में सांकेतिक बखान कर सांस्कृतिक पतन का मिसाल पेश कर रहे थे।

जाहिर है ऐसे उदाहरण न केवल भारत के पतन का नींव खोद रहे हैं बल्कि नैतिकता रूपी महानता को भी धता बता रहे हैं!

"क्या 'मनमर्जी','स्वेक्षा','आजादी' और प्यार के नाम पर किसी भी परिप्रेक्ष्य और नजरिये से सही ठहराया जा सकता है?"

"नहीं!"

तो नारी अधिकारों की बात करने वाले क्यों नहीं पनप रही इस सड़ांध भरी मानसिकता के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं? सामाजिक कार्यकर्त्ता वास्तव में कर क्या रहे हैं? ये सामने क्यों नहीं आते जब इनकी असल में जरुरत होती है? क्या 'एंटी रोमियो स्क्वार्ड' की जरूरत दिल्ली और अन्य शहरों में भी महसूस हो रही है?

जवाब बिल्कुल 'हाँ' है क्योंकि सिविल सोसाइटी अपना काम अच्छा से नहीं कर रहा है तो क़ानून में बदौलत समाज के पतन को रोका जा सकता है। नैतिकता स्थापित की जा सकती है।

यह सब केवल और केवल एक ही तरीके से होगा और वह है - 'मोरल पुलसिंग'।

मोरल पुलसिंग को भारत में नैतिकता को लागू करने के संबंध परिभाषित किया जाता है। यह अनैतिक कार्यों और भारतीय संस्कृति के खिलाफ किये गए हरकत को निशाना बनाता है। पार्क में यहीं सब तो किया जा रहा है।

आप तय कर लें कि क्या ऐसे हरकतों को कभी भारत जैसे पवित्र भूमि पर स्वीकार किया जा सकता है? सभी की अपनी एक सीमा है। सभी प्रकार के कार्यों के लिए भारत में समय और नियत स्थान तय किये गए हैं तो हम आखिर क्यों अपने मूल्यों को भूलते जा रहे हैं?

कारण एक नहीं अनेक है लेकिन इसमें सबसे महत्वपूर्ण कारण 'व्यक्ति की परवरिश' की है। आपकी हरकतें वास्तव में बता देती है कि आप किस समाज से उठकर आये हैं और और आपके पारिवारिक मूल्यों का स्तर क्या है? भले ही कुछ अपवाद हो सकते हैं लेकिन मूल्य विकास एक अहम किरदार अदा करता है।

इसलिए हमें बहस मूल्य विकास,नैतिक उत्थान और सांस्कृतिक रक्षा जैसे साधनों पर करना चाहिए जिससे व्यक्ति के साध्य को आसानी से पाया जा सके!

संदेश साफ़ है कि हम संकट में जकड़ते जा रहे हैं - सांस्कृतिक संकट की जकड़न!

Sunday, 30 April 2017

जन चर्चा में आज बेबाक नजरिया - दलित छात्रों का टॉपर होना!

          हालांकि छात्रों को खेमों में बांटने का एक खतरनाक षडयंत्र कुछ दलित चिंतकों और कई वामपंथी लोगों द्वारा किया जा रहा है खासकर तब जब दलित छात्र मेहनत से प्रतिष्ठित परीक्षाओं में अव्वल आ रहे हैं। हाल में ही आये एक खबर के मुताबिक राजस्थान के 17 साल के एक दलित छात्र ने आईआईटी जेईई के मेन्स में पहला स्थान पाया है।

          दलित चिंतक कांचा इलैया ने इसे देश की अहम परीक्षाओं में हाशिए के समुदाय के छात्रों के टॉप आने पर कहा कि आने वाले वक़्त में ओबीसी और दलित समुदाय के छात्र ब्राह्मणों और बनियों के बच्चों पर भारी पड़ने वाले हैं। इन्होंने आगे कहा,"दलित और ओबीसी छात्रों में समझ का स्तर सवर्णों से कहीं ज़्यादा है। उनका दृष्टिकोण ज़्यादा गहरा होता है। इन्हें मौका मिला तो वे सवर्णों की बराबरी नहीं बल्कि उन्हें पीछे छोड़ देंगे। वह वक़्त दूर नहीं जब किसी दलित को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।"

          ऐसे बयान क्या हैं? इसका मूल मकसद वामपंथियों की सोच की तरह खेमों में बांटकर आपस में समाज को लड़ाना है। आखिर आपने कभी सोचा है कि दलितों का रुझान वामपंथी षडयंत्र के साथ कदमताल मिलाकर क्यों चल रहा है? कभी सोचा है आपने कि एक पाकिस्तानी ने इस्लाम,वामपंथी और दलित एकता की बात किया था,उसी को सही साबित तो नहीं किया जा रहा है?

           अभी कुछ साल पहले आईएएस परीक्षा में भी एक लड़की टॉपरों में से एक थी और वे भी दलित समुदाय से ही हैं। और भूषण अहीर नामक व्यक्ति भी महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग की परीक्षा में टॉप आए थे जो भी दलित समुदाय से ही हैं।

            लेकिन आखिर क्या कारण है कि इनमें से एक अपने समाज को छोड़कर गैर-धर्म से निकाह करने वाली है। यह क्या है? यहीं तो 'लव जिहाद' है! जो दलित विचारक उस दिन चीख-चीखकर हल्ला मचा रहे थे कि एक दलित लड़की ने पहली बार सिविल सेवा परीक्षा टॉप की और गर्व महसूस कर रहे थे लेकिन ताज्जूब तब हो गयी जब यहीं दलित समाज इन्हें एक अच्छा लड़का नहीं दे पाया! शायद समाज को उम्मीद है कि बाकी टॉपर को इस समस्या से नहीं जूझना पड़ेगा और दलित समाज उस घटना से कुछ सीख हासिल कर पाएगा!

             छात्र केवल छात्र होते हैं जिन्हें जातियों में बांटना तो घठिया सोच का परिचायक है। इनलोगों को समझना चाहिए कि ऐसी बातें आपको ही समाज से हासिये पर कर सकता है लेकिन अब वक्त आ गया है और समय की भी मांग है कि ऐसे दलित छात्र जिनकी आर्थिक हैसियत काफी सुदृढ़ हो उनके आरक्षण का विरोध इन दलितों द्वारा ही किया जाना चाहिए ताकि इसका फायदा उनके ही गरीब बच्चों को मिल सके और अंत में आरक्षण विरोधी मुहीम में शामिल होकर समरस समाज के निर्माण में योगदान देकर जीवन को सार्थक बना सकें।

Friday, 28 April 2017

Political commentary - दिल्ली MCD चुनाव में भाजपा की जीत : जुदा नजरिये!

मैं इस बात पर चर्चा बिल्कुल नहीं करूँगा कि किसको कितना सीट और कितना वोट मिले। एक पार्टी की जीत और दूसरे की हार तो लोकतंत्र के चुनावी खेल में चलते रहते हैं। सियासी पंडित अपना विश्लेषण पेश करते रहते हैं। यह सब तो ठीक है लेकिन इस चुनाव में भाजपा की जीत ने कुछ लोगों में गजब की बेचैनी पैदा कर दिया है। अपूर्वानंद अपने एक लेख में लिखते हैं,"अब हम पटना या जयपुर या जबलपुर जैसे शहर में नहीं रहते, हमेशा भारत नामक राष्ट्र में रहते हैं। बुधवार को दिल्ली के म्यूनिसिपैलिटी के चुनाव नतीजों से यह बात साफ़ हो गई है। यह कि भारत में कम से कम आज के दिन कुछ भी स्थानीय नहीं रहा, हर कुछ राष्ट्रीय हो चुका है।"

मैं हमेशा से अवगत कराते रहा हूँ कि भारत में एक ख़ास विचारधारा के लिए आदर्श का मतलब तभी तक है जब तक उनकी हित पूर्ति होते रहे। दादरी में एक मुसलमान का वध और दिल्ली में कुछ लफंगों द्वारा चर्च पर पत्थर फेंका जाना आदि वास्तव में कोई विचारधारात्मक मामला था ही नहीं बल्कि कानूनी मामला था,इस तरह के स्थानीय मामलों से कानून के बदौलत आसानी से निपटा जा सकता था लेकिन बीते घटनाक्रम गवाह है कि किस तरह इसे सियासी रंग देकर उस मुसलमान पर पैसों की बरसात कर दी गयी और छद्म सेकुलरिज्म का नमूना पेश कर घटना को राष्ट्रीय बना दिया गया। उस समय पुरस्कार वापसी गैंग काफी सक्रिय हो गया था। उनके निजी हित आकांक्षा का अंदाजा सस्ती लोकप्रियता पाने की घटिया चाहत से ही लगाया जा सकता है कि जिन मामलों का असहिष्णुता से कोई मतलब ही नहीं था उसे इतना हवा दिया गया कि उस दौरान हुए मसलन दो चुनावों में एक पार्टी को भारी खामियाजा भुगतना पड़ा। हम मान लेते उसमें सच्चाई था जब बिहार चुनाव के बाद वह क्रम जारी रहता लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

आज जब ऐसे लोगों की राजनीतिक हित पूर्ति करने वाले किसी दल की चुनावी जंग में हार नसीब हो रही है तो उन्हें हर चीज में राष्ट्रीयता ही दिखाई दे रही है। यहीं इनकी सोच की विकृति है जो इनके बौखलाहट को स्पष्ट करती है।

यहीं आगे लिखते हैं," इसलिए दिल्ली के 10 साल के नकारेपन के कचरे और गंदगी के बीच अगर कमल खिला है तो यह एक धोखाधड़ी से भरे राष्ट्रवादी प्रचार की जीत है और यह बात सबसे पहले कही जानी चाहिए। राष्ट्रवाद आक्रामक विजयपथ पर है, लेकिन इस रास्ते इस राष्ट्र की पराजय निश्चित है, यह चेतावनी देने में क्यों हमारा गला रुँध रहा है?"

इसतरह के घड़ियाली आँसू बहाने वाले सुविधा के विश्लेषक होते हैं। वास्तव में वामपंथी भारत को कोई राष्ट्र नहीं बल्कि किताब 'कहानी कम्युनिस्टों की' के अनुसार 'राष्ट्रों का राष्ट्र' मानते हैं और जब वे यह कहते हैं कि इस रास्ते भारत राष्ट्र की पराजय निश्चित है तो किसी को भी हंसी आना लाजमी ही हो जाता है। जिन लोगों को 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' के नारे 'असहमति का हक' नजर आता है वे भारत राष्ट्र की बात न ही करें तो बेहतर होगा!

इनदिनों ऐसे ही कई आलेख छपे हैं जिसमें कहा गया है कि यह भाजपा की जीत वास्तव में फर्जी राष्ट्रवाद की जीत है। पर ये भी सच्चाई है कि आज केजरीवाल की 'नई राजनीति' हारी हुई दिखाई पड़ रही है। साल 2015 में उसे सिर पर बिठाने वाली दिल्ली ने इस बार उसे धूल चटा दी है। जैसी ऐतिहासिक वो जीत थी वैसी ही ऐतिहासिक ये हार भी है। दरअसल 'आप' से वोटर का मोहभंग हुआ है क्योंकि पार्टी जिस स्वच्छ छवि और 'नैतिक आभा मंडल' के साथ दिल्ली में जीतकर आई थी, वही उसपर भारी पड़ा। नैतिकता और शुचिता की जो अपेक्षाएं वोटर ने उससे रखीं, वो पूरी नहीं हो पाईं। उसका दिल्ली से बाहर निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में तेजी से हस्तक्षेप करना भी बचकाना साबित हुआ। वोटर उसे अलग रंगो-रूप की पार्टी मानकर चल रहा था। उसका मोहभंग हुआ है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा की जीत का मूल वजहों में से एक है उत्तर प्रदेश में हाल में मिली जीत जिसने कार्यकर्ताओं के उत्साह को बढ़ाया। बीजेपी ने शहर की साज-सफाई, कूड़े के ढेर और नगर निगम के दफ्तरों में भ्रष्टाचार पर से ध्यान हटाकर वोटर को राजनीति के ज़्यादा बड़े सवालों से जोड़ा। इसमें मोदी के नाम ने काम किया। वस्तुतः यह चुनाव नगरपालिका के चुनाव जैसा लगा ही नहीं। जैसा कि अपूर्वानंद जिस नकारात्मक तरीके से राष्ट्रीयता को व्यक्त किये हैं वो तो है ही नहीं भले ही यह चुनाव अपने केंद्र में राष्ट्रीय चरित्र को धारण किया हुआ था! रहे भी क्यों नहीं? दिल्ली की गलियां जो राष्ट्र को संदेश देती है और पूरे भारत समेत दुनिया की नजर दिल्ली की राजनीति पर बारीकी से रहती है। ऐसे भी मुकाबला त्रिकोणीय होना बीजेपी के हक में गया। बीजेपी के विरोधी वोट कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच बँटे। इस तिकोने संग्राम में बीएसपी और जेडीयू जैसी पार्टियाँ लगभग गायब हो गईं।

वहीं वृंदा करात जो माकपा पोलित के ब्यूरो सदस्य हैं लिखती हैं,"पहले कई राज्यों के स्थानीय और नगर निगम के चुनाव, फिर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में पूर्ण बहुमत की जीत और अब दिल्ली नगर निगम चुनाव में बीजेपी को मिली भारी जीत ने भारत के सामने आज़ादी के बाद के शुरुआती दशकों वाले एक पार्टी शासन जैसी हालत पैदा कर दी है।"

ये रजनी कोठारी के उस शोध को दोहराती नजर आ रही है जो आजादी के शुरुआती वर्षों में एक पार्टी शासन व्यवस्था को लोकतंत्र में स्थापित कर दिया था। जब कोई वामपंथी कुछ कहे या लिखे तो वे संघ का नाम लिए बगैर कैसे रह सकते हैं,"फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि आज़ादी के बाद के शुरुआती दशकों में कांग्रेस ने अपने सभी राजनीतिक विरोधियों को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया था, लेकिन आज बीजेपी सत्ता में ज़रुर है लेकिन वो शासन करने वाली अकेली पार्टी नहीं है। उसके साथ आरएसएस भी है, जिसके प्रचारक प्रधानमंत्री हैं जिन राज्यों में बीजेपी जीती है वहां मुख्यमंत्री भी आरएसएस के मनोनीत लोग हैं। ये आरएसएस और बीजेपी की जोड़ी है, जो मिलकर इस देश का भाग्य तय कर रहे है।"

जो भी हो! भारत के भविष्य को जिस रूप में भी पेश किया जाए लेकिन यह तय है कि भारत पहले की तुलना में और मजबूत ही होगा और अतीत के गौरव को स्थापित किया जा सकेगा। हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारत तभी तक है जब तक भारतीय वैदिक संस्कृति जिंदा है।

भले ही कई लोग इस दौर को भाजपा का स्वर्णिम काल बता रहे हों लेकिन वर्तमान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के अनुसार,"भाजपा का स्वर्णिम काल आना अभी बाकी है।"

संदर्भ -
1. वृंदा करात,माकपा पोलित ब्यूरो सदस्य का लेख
2. प्रमोद जोशी,वरिष्ठ पत्रकार का लेख
3. भाजपा का स्वर्णिम काल आना बाकी
4. अपूर्वानंद का लेख
5. कहानी कम्युनिस्टों की - संदीप देव
6. भारत में राजनीति - रजनी कोठारी

Thursday, 27 April 2017

जन चर्चा में आज केजरीवाल के लिए लल्लन मियाँ का सुझाव! - 8/2

"लल्लन मिया! केजरीवाल का चुनावी राजनीति में पतन हो रहा है ठीक उसी तरह जिस तरह किसी ने एक ब्लॉग में आप द्वारा कुछ नेताओं को पार्टी से निकाले जाने के बाद लिखा था,"यह लगने लगा है कि केजरिवाल में राब्स्पियर जैसा चरित्र पनपने लगा है,जिसने फ्रांस की क्रांति (1789) के ओट में इतना कहर बरपाया था जिसमें उसमें सबसे पहले अपने साथियों को निशाना बनाया,फिर खुद बर्बाद हुआ और मारा गया। महान सपनों की क्रांति पहले आतंक और फ़िर तानाशाही में बदली।""

"हमरा नाम है लल्लन मिया! जब मैं कहता हूँ तो लोग कहते हैं ऐसा कह रहा है। आपसभी जानते ही होंगे इसी ब्लॉग में उस समय एक सवाल उठाया गया था कि आम आदमी पार्टी का प्रयोग तो राजनीतिक विचारधाराओं को तिलांजलि देकर पनपा है जहां राइट-लेफ्ट सोच है ही नहीं। तो फिर केजरिवाल अपना घर शुध्द रुप से ठीक करने के लिये क्यों सोच रहे है? केजरिवाल की सोच कैसे पूर्व की सत्ता से अलग होती है इसका इंतजार और फ़ैसला तो वाकई अब 2020 में ही होना है। लेकिन इसकी आहट तो हमसभी अभी तक के घटनाक्रमों में ही देख लिए कि लोकसभा,पंजाब,गोआ और दिल्ली MCD में क्या हश्र हुआ?"

"लल्लन मिया! आखिर क्या हो जाता है कि नैतिकता की बात करने वाले और आंदोलन से निकले तथा सामाजिक कार्यकर्त्ता से राजनेता बने राजनीतिक जीवन में असफल हो जाते हैं,परंतु केजरीवाल सरीखे कुछ लोग इत्तेफाक से सफल भी हो जाते हैं तो उसे बनाये नहीं रख पाते?"

"एक वास्तविक राजनेता वास्तव में राजनीतिक रूप से परिपक्व हो जाता है और शब्दों पर संयम रखता है। केजरीवाल सरीखों,इरोम शर्मिला और अन्य सामाजिक कार्यकर्त्ता को तत्काल नहीं तो कुछ अंतराल पर अधोगति होने का एक ही कारण है - ऐसा नहीं है कि एक सामाजिक कार्यकर्त्ता अन्य क्षेत्रों मसलन डॉक्टर,सिविल सेवा,शिक्षक,राजनेता आदि में कैरियर नहीं बना सकते लेकिन उनके द्वारा सामाजिक कार्यकर्त्ता बनने का निर्णय काफी सोच-समझकर लिया गया उसका व्यक्तिगत निर्णय होता है। समाज में सेवा की एक अलग छवि स्थापित हो जाती है और जब वो राजनीतिक रूप से सक्रियता दिखाने लगता है तो लोग पचा नहीं पाते कि इसके सामाजिक सेवा में एक महत्वाकांक्षा भी छिपा हुआ था जिसकी पूर्ती के लिए वह हमें बरगलाता रहा। पर यह तर्क केजरीवाल पर सही नहीं बैठा था और एक बार ऐतिहासिक जीत नसीब हुई थी लेकिन इनके द्वारा चलाया गया राजनीतिक मुहीम(आरोप-प्रत्यारोप) सही पैमाना स्थापित नहीं कर पाया और साथ ही अन्य राज्यों के लिए राजनीतिक महत्वाकांक्षा किसी से छुपा भी नहीं रहा।"

"कई मौकों पर केजरीवाल पर स्याही फेंका गया। एक ब्लॉग इस घटना को इनका करनी का फल बताता है। जब राजनीति का मतलब व्यक्तिगत हित साधना हो जाए तो राजनीतिक पार्टी अपने आंतरिक संस्थाओं को नेस्तानबुद कर देती है। आप में यहीं सब देखने को मिला।
यह जगजाहिर है कि 'आम आदमी पार्टी' के जन्म का आधार अन्ना आंदोलन में खोजा जा सकता है,जब देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कई आवाजें एक साथ बुलंद हुयी थी। 'आप' एक ऐसी पार्टी बनकर उभरी जिसमें बुद्धिजीवियों का एक जमावड़ा था चाहे वे योगेन्द्र यादव हों या प्रोफ़ेसर आनंद कुमार। लेकिन समय ने ऐसी पलटी मारी कि इस पार्टी से लगभग बुद्धिजीवियों का नाता तो टूट ही गया और जो लोग राजनीति को साफ़-सुथरा करने और नैतिकता की कसौटी पर कसने आये थे,साथ ही अपने लिए आप को एक बेहतरीन मंच मानते थे अपने को अलग कर लिया तो इस हार के बाद लल्लन मिया शायद अब इनको कुछ सद्बुद्धि आये!"

"हमरा नाम है लल्लन मिया! जब मैं कहता हूँ तो लोग कहते हैं ऐसा कह रहा है। यहीं तो मेरा सुझाव है - सही ही कहा गया है जब व्यक्ति की हैसियत बदलती है तो उसके कार्य करने के ढंग भी बदल जाना चाहिए नहीं तो हर स्तर पर किरकिरी होने लगती है। जब आप राजनीतिक सुधार के लिए आंदोलन कर रहे होते हैं तो आरोप लगाना एक सही विकल्प रहता है लेकिन जब आपकी हैसियत बदली और सत्ता मिली तो आपको अपने तरीके बदल लेने चाहिए थे। कोई बात नहीं अभी भी देर नहीं हुई है सत्ता के जरिये किस प्रकार सामाजिक सरोकार और विकास के काम किये जा सकते हैं,कई उदाहरण आपके सामने है उसी को विकल्प बनाइये ज्यादा फायदेमंद रहेगा।
        दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी या संगठन अपने सक्रिय कार्यकर्ताओं की तुलना में बैकग्राउंड में स्थित विचारधारात्मक समर्थन से ज्यादा धारदार और मजबूत होती है। आपने तो इस रीढ़ को ही तोड़ डाला जब विचारों के स्तर पर मुहीम चलाने वालों को बेइज्जती कर निकाल दिए तो पार्टी बिना उसूल के कैसे रह सकती है वो भी तब जब मुखौटा हटाकर असली चेहरा जनता के सामने परोस दिया गया। यह सब काम सत्ता की भीनी-भीनी खुशबु और वोटों के लिए तुष्टिकरण की नीति ने किया।"