Thursday, 29 December 2016

पत्रकारिता का इतना भद्दा मजाक शायद किसी ने नहीं देखा होगा।


(जी न्यूज सही कारणों के कारण मीडिया का साख बचाने के युद्ध के रणभूमि में अकेला पड़ता हुआ नजर आ रहा है।)

एक वेबसाइट है - मीडियाविजिल,जिसने अपना टैगलाइन दिया है," मीडियाविजिल नाम की यह वेबसाइट समाचार माध्‍यमों की विसंगतियों को सामने लाने और सही संदर्भ में सही सूचना को सामने रखने का एक सामूहिक व अलाभकारी प्रयास है।"

यह बात तो सही है कि ऐसा प्रयास होना चाहिए। हर एक के बुराइयों और अच्छाइयों के पहलू और परिप्रेक्ष्य को सलीके से उठाया जाना चाहिए। लेकिन क्या यह वेबसाइट या इसके जैसे अन्य वेबसाइट इसे सही तरीके से अंजाम दे रहे हैं?
 
ऐसे तो इसतरह के कई वेबसाइट हैं जिसकी विश्वसनीयता संदेहों के घेरे में है,जैसे कि हिंदुत्व.इंफो,जनवरी.कॉम,जनता का रिपोर्टर आदि। फिर भी मीडियाविजिल को एक अच्छा मंच माना जा सकता था कि इसके आधार तथ्यों से परिपूर्ण था,हालाँकि इसकी लोकप्रियता तो उतनी नहीं है,जो अभी मात्र 2700 के आँकड़ों को ही छू पाया है।

ज़ी न्यूज पर मैं अपनी कंमेंट्री जारी करूँ, इससे पहले आपसभी को इस वेबसाइट की कुछ ख़बरों से अवगत करा देता हूँ -  मधु किश्वर जी, तैमूर ने लाखों मुसलमानों का सिर काट कर साम्राज्य बनाया था ! नफ़रत न फैलाएँ !; BBC को किसने बताया कि सैफ़-करीना के बच्चे का नाम तैमूर लंग पर है ?; मालिक नहीं चाहते कि पत्रकार लिखें मन की बात ! BBC में भी है रोक ! आदि।

स्क्रीन काला करने वाले चैनल पर लगे प्रतिबंध के बारे में लिखता है - रवीश के श्लेष में जकड़ गया ‘पीएम 2.5’.. बाग़ों में बहार है..!(इस पूरे शो को ही अपलोड कर दिया गया है।)

अब तो आपसभी समझ ही गए होंगे कि ऐसे हजारों फर्जी वेबसाइट हैं जो किसी एक बेकार पड़ चुकी विचारधारा के अभिव्यक्ति,आपातकाल की आहट आदि के नाम पर स्वामीभक्ति के लिए फंड लेकर झंडाबरदार रहे हैं। जबकि सच्चाई सबके सामने है कि टैगलाइन कुछ और रहता है और काम बिल्कुल अलग।

ज़ी न्यूज पर हुए मुकदमे पर यह वेबसाइट लिखता है,"क्या ज़ी को सिर्फ़ इसलिए पत्रकारिता के मोर्चे का सिपाही मान लेना चाहिए क्योंकि उसके पास ख़बर दिखाने का लाइसेंस है? आज ज़ी को पत्रकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब समझ में आ रहा है, लेकिन अभी दो महीने भी नहीं हुए जब ज़ी के मालिक और बीजेपी के सांसद सुभाषचंद्रा ने एनडीटीवी पर आजीवन प्रतिबंध की वक़ालत की थी। तब यह चैनल कहाँ खड़ा था? तब वह एनडीटीवी को उसी तरह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा बता रहा था जैसे कि आज उसे सांप्रदायिक सद्भाव की राह का रोड़ा कहा जा रहा है।"

(अब इस मूढ़ को कौन समझाए कि राष्ट्रीय सुरक्षा की कोई तुलना आंतरिक मामलों की रिपोर्टिंग से नहीं की जा सकती। मतलब NDTV के समर्थन में यह खुलकर सामने आया है और जैसा को तैसा करने का वकालत कर रहा है।)

यह आगे लिखता है,"वैसे ख़ुद ज़ी के संपादक सुधीर चौधरी अपने एक संपादकीय सहयोगी के साथ तिहाड़ जेल की हवा खा चुके हैं और मसला किसी ख़बर दिखाने का नहीं, एक उद्योग समूह से सौ करोड़ से ज़्यादा की उगाही का था। ज़ी की ओर से तब भी इमरजेंसी की दुहाई दी गई थी, जैसे अब दी जा रही है।"

(ये सब इतने बेशर्म होते हैं कि अपने पर आती है तो शोर मचाकर अदालत की दुहाई देने लगते हैं कि अदालत का फैसला आना बाकी है,लेकिन सुधीर चौधरी के मामले में आरोप लगने के बाद हुए पुलिस रूटीन प्रक्रिया को ही शाश्वत सत्य मान बैठे हैं जबकि फैसला आना तो अभी बाकी है।)

जब जेएनयू को बदनाम करने के लिए फ़र्ज़ी वीडियो गढ़े गए तब भी सुधीर चौधरी को कुछ ग़लत नहीं लगा ! ज़ी के ही एक प्रोड्यूसर विश्वदीपक ने नौकरी से इस्तीफ़़ा देकर बताया था कि न्यूज़रूम का माहौल किस कदर सांप्रदायिक और घुटन भरा है। कैसे जेएनयू को बदनाम करने के लिए ख़बरों का खिलवाड़ किया गया था।

(अब इसबात का कोई मतलब ही नहीं रह गया है कि वीडियो सही थे या गलत? क्योंकि सभी वीडियो जांच में सही पाए गए हैं। जिस पत्रकार के इस्तीफे की दुहाई दी गयी है कि उसकी विश्वनीयता क्या है? हो सकता है संस्था को बदनाम करने के लिए इसे खरीद लिया गया हो। एक सच्चाई यह भी है कि ये सब वामपंथी रुझान वाले चाहे बुद्धिजीवी हो या पत्रकार या नेता सभी पहुँचे हुए अव्वल दर्जे के भाई-भतीजावादी होते है,जो अपने बेकार लेखों और हरकतों को भी एक-दूसरे से प्रशंशा करवाकर महान बन जाते हैं।)

उस दंगे के बारे में जो बात लिखा जा रहा है या लिखा गया है,वह काफी ही आधारहीन है,"यह सही है कि धूलागढ़ की घटना पर पश्चिम बंगाल या बाक़ी देश के मीडिया ने तूल नहीं दिया या कहें कि संयम दिखाया। इरादा इस आग को फैलने से रोकना था। बहरहाल ज़ी को यह हक़ था कि वह रिपोर्टिंग करे। लेकिन उसने जो दिखाया वह इसके इरादे के खोट को ज़ाहिर कर रहा था। उसने बताया कि "पश्चिम बंगाल में हिंदुओं का हाल वैसा ही है जैसे कि पाकिस्तान में है" और धूलागढ़ में हिंदुओं पर एकतरफ़ा हमला हुआ और उन्हें अपना घर छोड़कर भागना पड़ा। हक़ीक़त यह है कि वहाँ हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों ही एक दूसरे पर हमलावर हुए और दोनों ही समुदाय के लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा है।"

(यह सवाल तो भारत में हुए अन्य दंगों को लेकर भी उठाया जा सकता है,लेकिन इस सवाल का जवाब कोई भी मीडिया संस्थान नहीं देगी क्योंकि विचारधारात्मक पूर्वाग्रह तो सभी को ज्ञात है। याद रखें,अगर यहीं घटना किसी दक्षिणपंथी शासित राज्यों में हो जाता तो,आज जो तर्क दिया जा रहा है,वह दिया जाता कि मीडिया द्वारा संयम बरता गया?)

अंततः अब तो अदालत में ही अपनी बेगुनाही साबित करनी होगी,जो कठिन कार्य नहीं होगा। लेकिन यह भी याद रखें कि गुजरात दंगों के दौरान किसतरह बरखा दत्त ने कहना शुरू कर दिया था कि मुसलमानों को चुन-चुनकर मारा जा रहा है। उस खबर में और इसमें  क्या अंतर है? लेकिन फिर भी सेकुलरिज्म और अल्पसंख्यक हित के नाम पर दोनों खबरों का विभेदीकरण कर दिया जाता है और दूसरे को सही ठहराने का प्रयास किया जाता रहा है।