Wednesday, 28 December 2016

मीडिया पर सेंसर लगाने का प्रयास होते रहता है,लेकिन सिविल सोसाइटी की नियत का पता चल जाता है!

हाल में ही पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा जी न्यूज के सुधीर चौधरी समेत दो पत्रकारों पर मुकदमा किया गया है,आरोप है दंगों के असंवेदनशील रिपोर्टिंग का। इस आरोप में कितना दम है,यह तो कोर्ट में ही मालूम चल पाएगा।

पर यहाँ सोचने की बात है कि जिस दंगों की रिपोर्टिंग इस जी मीडिया समूह द्वारा किया गया,उस ओर किसी अन्य मीडिया संस्थानों का ध्यान क्यों नहीं गया? कहीं कारण यह तो नहीं कि वहाँ निशाना बहुसंख्यक हिंदुओं को बनाया गया और बाकी सेकुलरिज्म और अभिव्यक्ति के झंडाबरदार शख्सियतों को मुस्लिम तुष्टिकरण का एक सुनहरा अवसर मिल गया।

यह प्रकरण एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारत का सिविल सोसाइटी अभी भी प्रौढ़ नहीं हुई है,साथ ही वह आरोप जो लगातार लगते रहे हैं कि ये फंडेड लोग हैं और मात्र फ्रेम के हिस्सा भर हैं,अधिकाँश तो भाई-भतीजावाद से पीड़ित बेकार हो चुके जमात का भाग भर है,को सही प्रतीत करता है।

हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा एक निजी चैनल पर एकदिनी प्रतिबंध लगाया गया था तो किस तरह से लॉबिंग किया गया था,सभी को मालूम है। फेसबूक पेज,ग्रुप आदि को बनाकर किसतरह मुहीम चलाया गया था,यह भी सभी को मालूम है। हद तो तब हो गयी जब स्टूडियो में दो जोकर को माइम एक्टर के रूप में लाकर बैठा दिया गया। इन सभी घटनाओं को अभिव्यक्ति की आजादी,आपातकाल की आहट आदि से जोड़कर पेश किया गया,जबकि चैनल पर जाँच कमिटी ने देश-विरोधी रिपोर्टिंग करने का आरोप तय कर दिया था।

सवाल यहीं है कि वो लोग जो उस एक निजी चैनल(स्क्रीन काला करने वाला) के पक्ष में खड़े हुए थे और चिल्ला-चिल्लाकर बार-बार यहीं कह रहे थे कि हम तो निष्पक्ष हैं,अभिव्यक्ति के आजादी के साथ हैं और मीडिया पर लगे किसी भी प्रकार के सेंसर के खिलाफ हैं,लेकिन वो आवाज आज जी न्यूज पर हुए मुकदमे के खिलाफ क्यों नहीं उठ रहे हैं? जाहिर है उनकी अपनी स्वामीभक्ति थी,उस विरोध का कोई भी किसी भी कोण से संबंध अभिव्यक्ति,सेंसर आदि से नहीं था क्योंकि निष्पक्ष आवाज किसी के लिए भी उठते हैं।

अब भारतीय जनमानस को समझ जाना चाहिए कि इन वामपंथियों बुद्धिजीवियों का विरोध चाहे हैदराबाद दलित आत्यहत्या को लेकर हो या अखलाख वध को लेकर हो या अकादमी पुरस्कार का लौटाया जाना हो,सभी के सभी बनावटी और विचारधारा से प्रेरित फर्जी और स्वामीभक्तिपूर्ण था जो मात्र विरोध के फ्रेम का हिस्सा भर था और कुछ नहीं।

इसीकारण मुकदमे के खिलाफ अपनी गुस्सा प्रकट करते हुए सुधीर चौधरी अपने फेसबूक पेज पर लिखते हैं," यह एक गिरा हुआ कदम है जो एक चुनी हुई सरकार पुलिस के जोर पर मीडिया को दबाने की कोशिश की है क्योंकि वास्तविकता और असहज तथ्यों से दूर भागना चाहती है। जब मीडिया को सम्भाल नहीं पाते तो राज्य की मशीनरी का इस्तेमाल कर अपने प्रशासन की खामियों को छुपाना चाहते है। यह एक सामंती जमींदार प्रवृति वाली असहिष्णु मुख्यमंत्री है जो राज्य पुलिस का मनचाहे ढंग से इस्तेमाल कर रही है।

मैं इस देश के खुली सोच रखने वाले सभी व्यक्तियों के कार्यों के लिए एक रास्ता के रूप में इस गलती के सकारात्मक पक्ष को देखता हूँ ताकि फासीवादी ताकतों को उनका वास्तविक स्थान दिखाये। या एक बार फिर से स्वार्थी राजनीति प्रबल होगी? यहीं मेरा डर है।"