Sunday, 25 December 2016

   मनुस्मृति को जलाने का क्या तुक है?

        'सत्य मजबूती से अडिग रहता है,झूठ का बार-बार हमला इसमें और निखार लाता है।' ठीक ऐसा ही कुछ 'धर्मशास्त्र और हिंदुत्व' के साथ हो रहा है,यह सत्य है,विश्वव्यापी है,अमर है जिसपर झूठ के बदौलत बार-बार आघात और निखार ला रहा है,अपना परचम लहरा रहा है।

         सभी जानते हैं,किताबें अपने समय की धरोहर होती है,तत्कालीन समाज का संरचना,विशेषता और गुण-अवगुण जानने का माध्यम होती है। कोई भी किताब पूर्ण नहीं होती,उसमें खामियाँ होती है और साथ में कई विचारों का सार,नैतिकता आदि का समावेश होता है।

         अगर आपके अनुसार खामियाँ है और अगर उस किताब से परेशानी है तो उसे नहीं माने परंतु किताब को जलाकर ड्रामेवाजी क्यों कर रहे हैं? क्या दिखाना चाहते है?

         कुछ लोगों के लिये कहीं ऐसा तो नहीं हो गया है कि आंबेडकर ने जलाया था तो हमें भी करना चाहिये,उन्होंने जो कहा था क्या वह पत्थर का लकीर हो सकता है? बिल्कुल नहीं,क्योंकि बाकियों की तरह उसका समीक्षा भी हो सकता है?

         मैं बार-बार यहीं कह रहा हूँ कि किसी के विचार क्या कहता है,वह परिस्थिति और परिप्रेक्ष्य पर निर्भर करता है। आंबेडकर के साथ भी ऐसा ही है,अगर उस दौरान मंदिर में घुसने की इजाज़त दे दी गयी होती तो वे बौद्ध धर्म नहीं अपनाते और साथ ही उनका विचार आज अलग परिप्रेक्ष्य में होता। शायद हिन्दू धर्म के बड़े हिमायती होते।

अगर आंबेडकर का अछूतोंद्धार नीति और धर्म के प्रति विचार का समीक्षा करें तो कई बातें निकलकर आती है -

       दलितों के उद्धार के लिए उनका पहला विचार था एक अछूत ही अछूत का नेतृत्व कर सकता है। उस समय की समाजिक स्थिति को देखने पर भले ही यह पहली नजर में सही लग सकता है परन्तु परिणाम की वास्तविकता इसपर संशय पैदा करेगा। इनसे पहले भी कई समाज-सुधारक जैसे-दयानंद सरस्वती,विवेकानंद और महात्मा गांधी आदि द्वारा भी दलितोद्धार का प्रयास किये गए हैं,जो अछूत नहीं थे।

        मेरा मानना है कि किसी भी दबाये हुए वर्ग(महिला,समलैंगिक,दलित आदि) का उत्थान और सशक्तिकरण तब तक नहीं हो सकता जब तक कि समस्त समाज द्वारा प्रयास न किये जायें। महिला आंदोलन और महिला सशक्तिकरण जिस ऊंचाई पर आज  पहुंचा है इनके कई महिला नारीवादियों  साथ-साथ पुरुष नारीवादियों का भी प्रमुख योगदान रहा है।

        अछूत भी उसी  समाज के अंग है जिस समाज में सवर्णों द्वारा इन्हें प्रताड़ित किया गया है,अतः जब तक सवर्ण उनकी स्थिति को मान्यता नहीं देंगे तब तक ये सामाजिक रूप से सशक्त नहीं हो पाएंगे? इसकारण सवर्णों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाना चाहिए न कि इनसे अलग रहकर अलग अस्तित्व बनाने की।

         उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए आत्म-सुधार,बच्चों की शिक्षा,शराब और गोमांस का त्याग,व्यापार,हीन-भावना से ऊपर उठाने की बात कही जो पूर्णतः सही है,किसी भी समाज का विकास उन्हीं सब मूल्यों में संवृद्धि के बदौलत होता है। अगर संपूर्ण दलित समाज उनके द्वारा बताये गए इन उपायों को सही तरीके से अपने जीवन में लागू करता तो अंबेडकर के उद्देश्य को पाया जा सकता था। साथ ही समाज में प्रचलित जातिगत पूर्वाग्रह भी आज मिटने के करीब रहता।

         उनके द्वारा शासन की संस्थाओं में दलितों के लिए आरक्षण की मांग की गयी ताकि उस विषमता को दूर कर सत्ता के स्तर पर लोकतांत्रीकरण(जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व) को सृदृढ़ किया जा सके। भारत में लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है जब राजनीतिक स्तर के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर लागू हो। यह अलग बहस का विषय है कि आरक्षण से उनको क्या फ़ायदा हुआ और कितना उत्थान हुआ तथा कब तक जरुरत है? साथ ही गौर करने की बात यह भी है कि वो दलित जो बौद्ध धर्म अपना लिए हैं,वे आज 'हिंदू दलित' को मिले आरक्षण का फायदा उठा रहे हैं,लेकिन बाकी बौद्ध धर्म नहीं उठाता। इसका जवाब आप खुद सोंचे कि कथनी और करनी में कितना अंतर है?

और अंत में,

मुझे जाति-व्यवस्था में पूर्ण विश्वास है!

          आजादी के आंदोलन में महान योगदान देने वाले महात्मा गांधी कहते हैं,'वर्णाश्रम की अपनी जो खामियां हो,उसमें कोई पाप नहीं है,लेकिन छुआछूत है। इनका कहना था कि छुआछूत जाति-प्रथा के कारण नहीं,बल्कि यह तो'उच्च' और 'निम्न' के कृत्रिम बंटवारे का फल है। जातियां एक दूसरे की पूरक होकर काम करें,तो जाति-प्रथा में कोई जाति न उच्ची है,न कोई नीचा।(छुआछूत मिटाने से सभी भारतीय एक हो जाएंगे)'

            पूर्ण जाति-व्यवस्था का उन्मूलन असंभव है क्योंकि यह धीरे-धीरे समय के साथ सवर्ण के बीच भी पनप गया है और दलितों के बीच भी। अगर जातियों के बीच अपनापन विकसित किया जाये और प्राचीन वर्ण व्यवस्था का क्षैतिज क्रम स्थापित किया जाये तो उत्पन्न बुराइयों को काफ़ी हद तक दूर किया जा सकता है। बुराई छूआछूत में है,जाति-व्यवस्था में नहीं,इसलिये छूआछूत को समाप्त करने की जरुरत है।

            एक सवाल मैं उन सभी से पूछना चाहूंगा कि जो लोग कहते हैं,मैं जाति-व्यवस्था को नहीं मानता,जाति-उन्मूलन चाहता हूँ तो ये शुरुआत अपने घर से क्यों नहीं करते?
किसी दलित से शादी करके इसे खत्म करें,लेकिन नहीं करेंगे यह हम जानते हैं और वो भी जानते हैं और पूरा समाज भी कि क्यों?

            जवाब स्पष्ट है - क्योंकि समाज अभी तैयार नहीं है और कभी तैयार भी नहीं होगा। इसकी चिंता सभी को है। मेरे इतना व्यावाहारिकता बताने के बाद भी अगर कोई मुझे जातिवादी कहे तो वह उनका समझ का चूक है।

जाति-व्यवस्था समाप्त करना कोई समाधान नहीं बल्कि समाज तोड़ने जैसा है,वहीं छूआछूत उन्मूलन एक विकल्प जरूर है।