Sunday, 18 December 2016

राष्ट्रगान और सुप्रीम कोर्ट का तत्कालिक फैसला -

मुझे नहीं लगता कि कोर्ट के उस फैसले के सभी बिंदुओं को किसी ने पढ़ा हो? नकारात्मक मीडिया हमारे दिलों दिमाग पर इस कदर हावी हो गयी है कि किसी खबर/मुद्दे/घटना के मूल में जाने की हमारी प्रवृत्ति ही खत्म हो रही है। इंडियन एक्सप्रेस के संपादक के शब्दों में कहा जा सकता है," ऐसा है कि बुरी पत्रकारिता पाँच सालों की तुलना में आज ज्यादा शोर(हल्ला) मचाते हैं।" ( It is that bad journalism makes a lot more noise than it used to do five years ago.)
कोर्ट द्वारा दिए गए सात आदेशों में केवल एक पर ज्यादा चर्चा और मजाक बनाया गया,कारण कि कुछ दिन पहले तक ऐसी घटना आ चुकी थी कि सिनेमा घर में राष्ट्रगान बजते समय कुछ लोग खड़े नहीं हुए तो उन्हें अन्य लोगों द्वारा पिट दिया गया। अपने इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट कहता है," सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बजने से पहले वहाँ घुसने और वहाँ से निकलने के रास्ते बंद होने चाहिए ताकि कोई किसी तरह का व्यवधान पैदा न कर सके जो राष्ट्रगान का अपमान करने के समान होगा। राष्ट्रगान के समाप्त होने के बाद दरवाज़े खोले जा सकते हैं।"
अन्य आदेश जैसे कि राष्ट्रगान का किसी तरह का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं हो सकता, प्रत्यक्ष या परोक्ष से राष्ट्रगान का कोई नाटकीय इस्तेमाल नहीं किया जा सकता या उसे किसी मनोरंजन कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता, राष्ट्रगान या उसका कोई हिस्सा किसी वस्तु पर नहीं छापा जा सकता, या उस तरह या उन जगहों पर प्रदर्शित नहीं किया जा सकता जहाँ उसका असम्मान होने की आशंका हो आदि पर कोई ध्यान नहीं दिया गया?
क्या आपको नहीं लगता कि आलोचकों का यह विरोध किसी ख़ास मकसद को धारण किये हुए था। आज भारत का वातावरण ऐसा बन गया है कि 'देशभक्ति बनाम देशद्रोही' का बहस परवान चढ़ा हुआ है। एकतरफ इस फैसले को दक्षिणपंथी विचार रखने वाले लोगों द्वारा स्वागत किया गया तो दूसरी तरफ एक अन्य विचार रखने वाले व्यक्तियों द्वारा मजाक बनाया गया और आलोचना किया गया।
राष्ट्रगान पर सम्मान की बात करना आलोचना का विषय हो सकता है? ये आप खुद सोचें।
एक अन्य सवाल जिसे काफी उछाला गया,वह कि राष्ट्रभक्ति को क़ानून से बाँधना सही है?
जहाँ तक मैंने पाया है,भारत अभी परिपक्व राष्ट्र की श्रेणी में नहीं आता। क़ानून को मानना स्वेक्षा पर आधारित न होकर अधिकाँश मामलों में डर पर आधारित है। ट्रैफिक पुलिस का डर ही हमें बत्तियों के इशारों पर चलने को मज़बूर करता है। आये दिनों ऐसी तमाम घटनाएं घटित हो रही है जिससे भारत राष्ट्र के सामने चुनौतियाँ उत्पन्न हो गयी है। देश विरोधी नारे लगाकर,असहमति का हक करार दिया जा रहा है,सेना जिसके बदौलत हम अपनी बातों को कहने का हिम्मत रखते हैं पर तरह-तरह का लांछन लगा दिया जाता है। ऐसी परिस्तिथि में राष्ट्रवाद की बुनियाद को मजबूत करने का एक ही मार्ग नजर आता है - कानून का डर।
इसकारण सुप्रीम कोर्ट का फैसला स्वागतयोग्य है।