Saturday, 17 December 2016

समाज का नेतृत्व 'सर्वहारा की तानाशाही' में नहीं बल्कि 'बुद्धिजीवी वर्ग की तानाशाही' में होगी!

आज के बुद्धिजीवी खासकर भारत के तो,मार्कूजे के इस उद्धरण को अपने जेहन में इस कद्र उतार चुके हैं कि यह एक छद्म बातें,कल्पना में ही सही,वामपंथी बुद्धिजीवियों के लिए यथार्थ लगने लगी है/थी। हालांकि यह बात अलग है कि मार्कूजे 'व्यक्ति के आनंद' पाने की अपनी संकल्पना के कारण साम्यवादी और पूँजीवादी दोनों तरह के व्यवस्थाओं का विरोध किया है।
'सर्वहारा की तानाशाही' और 'बुद्धिजीवी वर्ग की तानाशाही' दोनों में बेहतर कौन होगा/है? इस विवाद में मुझे नहीं पड़ना है। बस इतना ही कहूँगा कि 'सर्वहारा की तानाशाही' को तो 1917 से ही देख रहे हैं,धीरे-धीरे जब इसका मुखौटा हटने लगा तो इसके वास्तविक रूप को सभी ने देखा की किस तरह इसने एक दमनकारी राज्य का रूप अख्तियार कर लिया। 'बुद्धिजीवी वर्ग की तानाशाही' तो मुझे मिचेल्स की 'अल्पतंत्र के लौह नियम' का प्रतिबिंब ही दिखाई दे रहा है,अंतर केवल भागीदारों को लेकर है।
इसे भारत के संबंध में कुछ उदाहरणों को लेकर असानी से समझा जा सकता है - नोटबंदी और जेएनयू में लगे देश-विरोधी नारे।
ऐसे तो इन मुद्दों पर मैं बहुत कुछ लिख चुका हूँ,इसलिए यहाँ दोबारा वर्णन करना उचित नहीं है;लेकिन आपसभी को याद होगा कि इन सारे प्रकरण में किस तरह समाज को बुद्धिजीवियों(वामपंथी) द्वारा गुमराह किया गया और बरगलाया गया।
दुनिया का कोई भी राष्ट्र,राष्ट्रवाद की बुनियाद पर देश-विरोधी नारों को सहन नहीं कर सकता। लेकिन इन नारों को भारत में यहीं वामपंथी बुद्धिजीवी 'असहमति का हक' करार देकर मार्कूजे के हिंसा पर सहमति वाली विचार पर मुहर लगा दिए कि 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' और 'लड़ के लेंगे आजादी' को मार्क्स के विचारों से पाया जा सकता है।
मैं तो स्पष्ट रूप से मानता हूँ कि ये सभी जो 'असहमति का हक' करार दे रहे थे उन्होंने प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से हिंसा का समर्थन किये,ठीक उसी तरह जिसतरह ये माओवादी जो हिंसा करते रहते हैं से सहानूभूति रखते हैं और सरकार के नियंत्रण के प्रयास को दमन कहकर पुकारते हैं।
इनको निर्देश देने और समझदारी का इशारा करने के लिए एक ही बात कहूँगा,"आज राज्य के पास पहले की तुलना में किसी भी देश-विरोधी आंदोलन को कुचलने के लिए अधिक शक्ति और साधन मौजूद है।"
दूसरा मामला 'नोटबंदी' को लेकर हालिया अफवाह और विवाद है। इस परिस्थिति में तो बुद्धिजीवियों ने अपनी सारी हदें पार कर दी है। मामले को कोर्ट में पहुँचा दिया गया और समाज में बेवजह के बहसों का दौर चल रहा है,नित्यदिन नए आरोप लग रहे हैं।
जबकि कल ही सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट कहा,"अपनी आर्थिक और राजकोषीय नीतियों का सबसे अच्छा जज होने के लिए सरकार पर यह भरोसा किया।"
(The court said It trusted the government to be the best judge of its own economic and fiscal policies.)
भले ही मार्कूजे के उद्धहरण 'बुद्धिजीवी वर्ग के तानाशाही' को अपने जेहन में उतार लिए हैं,लेकिन ये सभी वामपंथी बुद्धिजीवी केंद्र में मौजूद सरकार,जिसकी प्रकृति दक्षिणपंथी है,के कारण हर मामलों का नकारात्मक प्रवक्ता(negative spokesperson) बन गए हैं।
यहीं वह वजह है कि आज इनके द्वारा की जा रही सरकारी आलोचना 'अयथार्थवादी और भावुकतापूर्ण' बनकर रह गयी है।